निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए : मानव, सभ्यता से अपनी बाह्य उन्नति करता है और संस्कृति से आन्तरिक। सभ्यता वह चीज है, जो हमारे पास है किन्तु संस्कृति वह गुण है जो हममें छिपा हुआ है। हमारे पास भौतिक वस्तुएँ होती हैं। ये भौतिक वस्तुएँ हमारी सभ्यता के प्रमाण हैं, जबकि संस्कृति इतने स्थूल रूप में दिखाई नहीं देती, वह बहुत ही सूक्ष्म चीज है। वह हमारी प्रत्येक आदत और पसंद में निहित रहती है। मकान बनाना सभ्यता का काम है, लेकिन हम मकान का कौन सा नक्शा पसंद करते हैं, यह हमारी संस्कृति बतलाती है। मानव के भीतर छ: विकार — काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और मत्सर — प्रकृति प्रदत्त हैं। यदि ये विकार स्वतंत्र छोड़ दिए जाएँ तो मानव इतना गिर जाए कि उसमें और जानवर में कोई अन्तर न रह जाए, इसलिए मानव इन विकारों पर रोक लगाता है। इन विकारों पर जो मानव जितना अधिक काबू कर पाता है, उसकी संस्कृति उतनी ही ऊँची समझी जाती है। संस्कृति का मूल स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। (i) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए। (ii) मानव, सभ्यता से अपनी कौन सी उन्नति करता है ? (iii) मानव के अंदर प्रकृति प्रदत्त कितने विकार हैं ? (iv) मानव की मानवीयता किस बात में निहित है ? (v) संस्कृति का मूल स्वभाव क्या है ?
गद्यांश 9(अ) के सभी 5 प्रश्नों के उत्तर:
- (i) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक:
सभ्यता एवं संस्कृति: बाह्य विकास और आंतरिक गुण-संस्कार। - (ii) मानव, सभ्यता से अपनी कौन सी उन्नति करता है?
मानव सभ्यता के माध्यम से अपनी बाह्य एवं भौतिक उन्नति करता है, जिसके प्रमाण उसके द्वारा निर्मित भवन, वस्त्र और भौतिक साधन हैं। - (iii) मानव के अंदर प्रकृति प्रदत्त कितने विकार हैं?
मानव के भीतर प्रकृति द्वारा प्रदत्त छः (6) विकार हैं—काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और मत्सर। - (iv) मानव की मानवीयता किस बात में निहित है?
मानव की वास्तविक मानवीयता इन षड्विकारों (काम, क्रोध आदि) पर आत्म-नियंत्रण रखने, उन्हें मर्यादित करने तथा पाशविक प्रवृत्तियों से ऊपर उठने में निहित है। - (v) संस्कृति का मूल स्वभाव क्या है?
संस्कृति का मूल स्वभाव यह है कि वह परस्पर आदान-प्रदान, समन्वय, सहिष्णुता और उदारता से निरंतर पल्लवित एवं संवर्धित होती है।
In English (Question & Model Answer)
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए : मानव, सभ्यता से अपनी बाह्य उन्नति करता है और संस्कृति से आन्तरिक। सभ्यता वह चीज है, जो हमारे पास है किन्तु संस्कृति वह गुण है जो हममें छिपा हुआ है। हमारे पास भौतिक वस्तुएँ होती हैं। ये भौतिक वस्तुएँ हमारी सभ्यता के प्रमाण हैं, जबकि संस्कृति इतने स्थूल रूप में दिखाई नहीं देती, वह बहुत ही सूक्ष्म चीज है। वह हमारी प्रत्येक आदत और पसंद में निहित रहती है। मकान बनाना सभ्यता का काम है, लेकिन हम मकान का कौन सा नक्शा पसंद करते हैं, यह हमारी संस्कृति बतलाती है। मानव के भीतर छ: विकार — काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और मत्सर — प्रकृति प्रदत्त हैं। यदि ये विकार स्वतंत्र छोड़ दिए जाएँ तो मानव इतना गिर जाए कि उसमें और जानवर में कोई अन्तर न रह जाए, इसलिए मानव इन विकारों पर रोक लगाता है। इन विकारों पर जो मानव जितना अधिक काबू कर पाता है, उसकी संस्कृति उतनी ही ऊँची समझी जाती है। संस्कृति का मूल स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। (i) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए। (ii) मानव, सभ्यता से अपनी कौन सी उन्नति करता है ? (iii) मानव के अंदर प्रकृति प्रदत्त कितने विकार हैं ? (iv) मानव की मानवीयता किस बात में निहित है ? (v) संस्कृति का मूल स्वभाव क्या है ?
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.
गद्यांश 9(अ) के सभी 5 प्रश्नों के उत्तर:
- (i) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक:
सभ्यता एवं संस्कृति: बाह्य विकास और आंतरिक गुण-संस्कार। - (ii) मानव, सभ्यता से अपनी कौन सी उन्नति करता है?
मानव सभ्यता के माध्यम से अपनी बाह्य एवं भौतिक उन्नति करता है, जिसके प्रमाण उसके द्वारा निर्मित भवन, वस्त्र और भौतिक साधन हैं। - (iii) मानव के अंदर प्रकृति प्रदत्त कितने विकार हैं?
मानव के भीतर प्रकृति द्वारा प्रदत्त छः (6) विकार हैं—काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और मत्सर। - (iv) मानव की मानवीयता किस बात में निहित है?
मानव की वास्तविक मानवीयता इन षड्विकारों (काम, क्रोध आदि) पर आत्म-नियंत्रण रखने, उन्हें मर्यादित करने तथा पाशविक प्रवृत्तियों से ऊपर उठने में निहित है। - (v) संस्कृति का मूल स्वभाव क्या है?
संस्कृति का मूल स्वभाव यह है कि वह परस्पर आदान-प्रदान, समन्वय, सहिष्णुता और उदारता से निरंतर पल्लवित एवं संवर्धित होती है।