निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "महत्त्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता के सीप में पलता है"
"महत्त्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता के सीप में पलता है": जयशंकर प्रसाद का जीवन-दर्शन, ऐतिहासिक यथार्थ एवं नैतिक नेतृत्व
"महत्त्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता के सीप में पलता है; काश! मनुष्य यह समझ पाता कि विशाल लक्ष्यों की प्राप्ति में कितनी कोमल भावनाओं की आहुति देनी पड़ती है।" — महाकवि जयशंकर प्रसाद (ऐतिहासिक नाटक 'चंद्रगुप्त')
1. प्रस्तावना एवं सूक्ति का दार्शनिक भावार्थ:
छायावाद के मूर्धन्य नाटककार जयशंकर प्रसाद के अमर नाटक 'चंद्रगुप्त' का यह कालजयी कथन राजनीति और मानव मनोविज्ञान के अत्यंत कठोर यथार्थ को प्रकट करता है। जिस प्रकार एक चमकीला और मूल्यवान मोती समुद्र के भीतर 'सीप' के कठोर और बंद आवरण में ही आकार लेता है, ठीक उसी प्रकार जीवन में असाधारण पद, प्रतिष्ठा, साम्राज्य या विशाल महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने हेतु व्यक्ति को अपनी कोमल भावनाओं, पारिवारिक मोह और व्यक्तिगत सुखों को मारकर कठोर (निष्ठुर) बनना पड़ता है।
2. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य एवं राजनीति का यथार्थ:
- आचार्य चाणक्य का राष्ट्र-निर्माण: यवन आक्रांताओं से भारत की रक्षा और 'अखंड भारत' के निर्माण की विशाल महत्त्वाकांक्षा हेतु चाणक्य ने अपने व्यक्तिगत सुख, दया और रिश्तों का त्याग कर अत्यंत कठोर व निष्ठुर कूटनीति का मार्ग अपनाया।
- अंध महत्त्वाकांक्षा का विनाशकारी रूप: जब महत्त्वाकांक्षा नैतिकता और लोक-कल्याण से रहित हो जाती है, तो वह क्रूर तानाशाही (जैसे रावण, कंस, हिटलर और नेपोलियन) को जन्म देती है जो अंततः स्वयं के विनाश का कारण बनती है।
- कलिंग युद्ध एवं सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन: अशोक की साम्राज्य विस्तार की निष्ठुर महत्त्वाकांक्षा ने जब कलिंग में लाखों निर्दोषों का रक्त बहाया, तो आत्म-ग्लानि के बाद उन्होंने 'भेरीघोष' (युद्ध) को त्यागकर 'धम्मघोष' (करुणा और दया) का अमर मार्ग अपनाया।
3. आधुनिक लोक प्रशासन एवं नेतृत्व में प्रासंगिकता:
लोकतांत्रिक शासन में महत्त्वाकांक्षा 'व्यक्तिगत सत्ता' हेतु नहीं, बल्कि 'लोक-कल्याण' हेतु होनी चाहिए। एक कुशल प्रशासक (Civil Servant) को नीति और कानून के पालन में चाणक्य की भांति अपराधियों व भ्रष्टाचारियों के प्रति कठोर होना चाहिए, किन्तु गरीबों और पीड़ितों के प्रति बुद्ध व गांधी की भांति अत्यंत संवेदनशील व करुणामय होना चाहिए ("वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि")।
4. निष्कर्ष:
कठोर अनुशासन और संकल्प के बिना महान लक्ष्य प्राप्त नहीं होते, किन्तु संवेदना-शून्य महत्त्वाकांक्षा मानवता के लिए अभिशाप बन जाती है। अतः महत्त्वाकांक्षा का मोती तभी पूजनीय बनता है जब वह राष्ट्र-सेवा, सत्य और करुणा के पावन जल से सिंचित हो। ऐसी ही नैतिक व उदात्त महत्त्वाकांक्षा 'विकसित भारत @2047' के निर्माण को गति प्रदान करेगी।
In English (Question & Model Answer)
निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "महत्त्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता के सीप में पलता है"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
"महत्त्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता के सीप में पलता है": जयशंकर प्रसाद का जीवन-दर्शन, ऐतिहासिक यथार्थ एवं नैतिक नेतृत्व
"महत्त्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता के सीप में पलता है; काश! मनुष्य यह समझ पाता कि विशाल लक्ष्यों की प्राप्ति में कितनी कोमल भावनाओं की आहुति देनी पड़ती है।" — महाकवि जयशंकर प्रसाद (ऐतिहासिक नाटक 'चंद्रगुप्त')
1. प्रस्तावना एवं सूक्ति का दार्शनिक भावार्थ:
छायावाद के मूर्धन्य नाटककार जयशंकर प्रसाद के अमर नाटक 'चंद्रगुप्त' का यह कालजयी कथन राजनीति और मानव मनोविज्ञान के अत्यंत कठोर यथार्थ को प्रकट करता है। जिस प्रकार एक चमकीला और मूल्यवान मोती समुद्र के भीतर 'सीप' के कठोर और बंद आवरण में ही आकार लेता है, ठीक उसी प्रकार जीवन में असाधारण पद, प्रतिष्ठा, साम्राज्य या विशाल महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने हेतु व्यक्ति को अपनी कोमल भावनाओं, पारिवारिक मोह और व्यक्तिगत सुखों को मारकर कठोर (निष्ठुर) बनना पड़ता है।
2. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य एवं राजनीति का यथार्थ:
- आचार्य चाणक्य का राष्ट्र-निर्माण: यवन आक्रांताओं से भारत की रक्षा और 'अखंड भारत' के निर्माण की विशाल महत्त्वाकांक्षा हेतु चाणक्य ने अपने व्यक्तिगत सुख, दया और रिश्तों का त्याग कर अत्यंत कठोर व निष्ठुर कूटनीति का मार्ग अपनाया।
- अंध महत्त्वाकांक्षा का विनाशकारी रूप: जब महत्त्वाकांक्षा नैतिकता और लोक-कल्याण से रहित हो जाती है, तो वह क्रूर तानाशाही (जैसे रावण, कंस, हिटलर और नेपोलियन) को जन्म देती है जो अंततः स्वयं के विनाश का कारण बनती है।
- कलिंग युद्ध एवं सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन: अशोक की साम्राज्य विस्तार की निष्ठुर महत्त्वाकांक्षा ने जब कलिंग में लाखों निर्दोषों का रक्त बहाया, तो आत्म-ग्लानि के बाद उन्होंने 'भेरीघोष' (युद्ध) को त्यागकर 'धम्मघोष' (करुणा और दया) का अमर मार्ग अपनाया।
3. आधुनिक लोक प्रशासन एवं नेतृत्व में प्रासंगिकता:
लोकतांत्रिक शासन में महत्त्वाकांक्षा 'व्यक्तिगत सत्ता' हेतु नहीं, बल्कि 'लोक-कल्याण' हेतु होनी चाहिए। एक कुशल प्रशासक (Civil Servant) को नीति और कानून के पालन में चाणक्य की भांति अपराधियों व भ्रष्टाचारियों के प्रति कठोर होना चाहिए, किन्तु गरीबों और पीड़ितों के प्रति बुद्ध व गांधी की भांति अत्यंत संवेदनशील व करुणामय होना चाहिए ("वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि")।
4. निष्कर्ष:
कठोर अनुशासन और संकल्प के बिना महान लक्ष्य प्राप्त नहीं होते, किन्तु संवेदना-शून्य महत्त्वाकांक्षा मानवता के लिए अभिशाप बन जाती है। अतः महत्त्वाकांक्षा का मोती तभी पूजनीय बनता है जब वह राष्ट्र-सेवा, सत्य और करुणा के पावन जल से सिंचित हो। ऐसी ही नैतिक व उदात्त महत्त्वाकांक्षा 'विकसित भारत @2047' के निर्माण को गति प्रदान करेगी।