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निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "सामाजिक संस्कृति और राजनीतिक संस्कृति"

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आदर्श उत्तर

सामाजिक संस्कृति और राजनीतिक संस्कृति: पारस्परिक अंतर्संबंध, लोकतांत्रिक सहभागिता एवं संवैधानिक नैतिकता

"राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता, जब तक कि उसके मूल आधार में सामाजिक लोकतंत्र और समतामूलक नागरिक संस्कृति न हो।" — डॉ. भीमराव आंबेडकर

1. प्रस्तावना एवं दोनों अवधारणाओं का अर्थ:
'सामाजिक संस्कृति' (Social Culture) किसी समाज की सहस्रों वर्षों की जीवन-पद्धति, पारिवारिक संरचना, रीति-रिवाजों, विश्वासों और नैतिक मूल्यों का समग्र समुच्चय है। वहीं राजनीति विज्ञान में 'राजनीतिक संस्कृति' (Political Culture) से आशय राजनीतिक व्यवस्था, शासन, अधिकारों और सत्ता के प्रति नागरिकों की सामूहिक अभिवृत्तियों, दृष्टिकोण, सहभागिता और विश्वासों के ढांचे से है। ये दोनों एक-दूसरे को गहराई से प्रभावित और रूपांतरित करते हैं।

2. सामाजिक और राजनीतिक संस्कृति का गहरा अंतर्संबंध:

  • सामाजिक सहिष्णुता द्वारा लोकतंत्र का पोषण: भारत की सनातन सामाजिक संस्कृति में निहित 'वसुधैव कुटुम्बकम्', अहिंसा, संवाद और बहुलवाद के मूल्यों ने ही 1950 में स्वतंत्र भारत में एक अत्यंत सुदृढ़, बहुदलीय लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति की नींव रखी।
  • सामाजिक कुरीतियों का राजनीति पर दुष्प्रभाव: समाज में व्याप्त सामंती मानसिकता, जातिवाद, पितृसत्ता और संकीर्णताओं के कारण राजनीति में बाहुबल, जातिगत वोट-बैंक और वंशवाद जैसी विद्रूपताओं का जन्म हुआ।
  • राजनीतिक संस्कृति द्वारा समाज सुधार: संविधान के प्रगतिशील प्रावधानों (अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता उन्मूलन, आरक्षण, तथा मध्य प्रदेश में पंचायतों में महिलाओं को 50% आरक्षण) ने सदियों पुरानी सामंती सामाजिक संरचना को तोड़कर वंचितों और महिलाओं को सत्ता में भागीदारी दी।

3. निष्कर्ष:
सामाजिक संस्कृति यदि वृक्ष की जड़ है, तो राजनीतिक संस्कृति उसकी शाखाएं और फल हैं। जब सामाजिक संस्कृति से जातिगत व सामंती संकीर्णताएं समाप्त होंगी और नागरिक 'संवैधानिक नैतिकता' (Constitutional Morality) को अपने आचरण में अपनाएंगे, तभी देश में एक परिपक्व, पारदर्शी और जन-कल्याणकारी राजनीतिक संस्कृति का विकास होगा जो 'विकसित भारत @2047' के निर्माण का पथ प्रशस्त करेगी।

In English (Question & Model Answer)

निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "सामाजिक संस्कृति और राजनीतिक संस्कृति"

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

सामाजिक संस्कृति और राजनीतिक संस्कृति: पारस्परिक अंतर्संबंध, लोकतांत्रिक सहभागिता एवं संवैधानिक नैतिकता

"राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता, जब तक कि उसके मूल आधार में सामाजिक लोकतंत्र और समतामूलक नागरिक संस्कृति न हो।" — डॉ. भीमराव आंबेडकर

1. प्रस्तावना एवं दोनों अवधारणाओं का अर्थ:
'सामाजिक संस्कृति' (Social Culture) किसी समाज की सहस्रों वर्षों की जीवन-पद्धति, पारिवारिक संरचना, रीति-रिवाजों, विश्वासों और नैतिक मूल्यों का समग्र समुच्चय है। वहीं राजनीति विज्ञान में 'राजनीतिक संस्कृति' (Political Culture) से आशय राजनीतिक व्यवस्था, शासन, अधिकारों और सत्ता के प्रति नागरिकों की सामूहिक अभिवृत्तियों, दृष्टिकोण, सहभागिता और विश्वासों के ढांचे से है। ये दोनों एक-दूसरे को गहराई से प्रभावित और रूपांतरित करते हैं।

2. सामाजिक और राजनीतिक संस्कृति का गहरा अंतर्संबंध:

  • सामाजिक सहिष्णुता द्वारा लोकतंत्र का पोषण: भारत की सनातन सामाजिक संस्कृति में निहित 'वसुधैव कुटुम्बकम्', अहिंसा, संवाद और बहुलवाद के मूल्यों ने ही 1950 में स्वतंत्र भारत में एक अत्यंत सुदृढ़, बहुदलीय लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति की नींव रखी।
  • सामाजिक कुरीतियों का राजनीति पर दुष्प्रभाव: समाज में व्याप्त सामंती मानसिकता, जातिवाद, पितृसत्ता और संकीर्णताओं के कारण राजनीति में बाहुबल, जातिगत वोट-बैंक और वंशवाद जैसी विद्रूपताओं का जन्म हुआ।
  • राजनीतिक संस्कृति द्वारा समाज सुधार: संविधान के प्रगतिशील प्रावधानों (अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता उन्मूलन, आरक्षण, तथा मध्य प्रदेश में पंचायतों में महिलाओं को 50% आरक्षण) ने सदियों पुरानी सामंती सामाजिक संरचना को तोड़कर वंचितों और महिलाओं को सत्ता में भागीदारी दी।

3. निष्कर्ष:
सामाजिक संस्कृति यदि वृक्ष की जड़ है, तो राजनीतिक संस्कृति उसकी शाखाएं और फल हैं। जब सामाजिक संस्कृति से जातिगत व सामंती संकीर्णताएं समाप्त होंगी और नागरिक 'संवैधानिक नैतिकता' (Constitutional Morality) को अपने आचरण में अपनाएंगे, तभी देश में एक परिपक्व, पारदर्शी और जन-कल्याणकारी राजनीतिक संस्कृति का विकास होगा जो 'विकसित भारत @2047' के निर्माण का पथ प्रशस्त करेगी।

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