नौजवानो ! इस वक्त तुम्हारी कोई मंज़िल नहीं, क्योंकि अब तक तुम्हें मंज़िल किसी ने दिखाई ही नहीं। 'बढ़े चलो' सभी कहते रहे। कहाँ ? - यह न किसी ने बताया न किसी ने पूछा। अब पूछने की आवश्यकता भी नहीं - अपनी मंज़िल खुद तय करो ! इस मंज़िल को तय करते समय इतना ध्यान रहे कि तुम वह ही नहीं, जो नित्य नई छवियाँ धारण करते नगरों के कॉलेजों, दफ़्तरों या रास्तों में हो, तुम बर्फ़ीली चोटियों और ऊँची-नीची पथरीली राहों पर देश का भार अपनी पीठ पर लादने वालों में भी हो और तपते रेगिस्तानों में ऊँटों के काफ़िलों पर देश की प्रतिष्ठा ढोने वालों में भी ! वह तुम ही हो जो न गरजती हुई समुद्री लहरों के थपेड़ों में मछलियाँ पकड़ते हुए भयभीत होते हो और न दिन-रात मशीनों की गड़गड़ाहट सुनकर बहरे होते हो ! अपने इन सपनों को एक कर लो, तब देखो तुम कितने महान हो, कितने विशाल !
(i) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ii) आज नौजवानों को कोई मंज़िल क्यों नहीं दिखती ?
(iii) नौजवान किस-किस क्षेत्र में साधना में रत हैं ?
(iv) जीवन संघर्ष का महत्त्व क्या है ?
(v) हम कैसे महान बन सकते हैं ?
गद्यांश 9(ब) के सभी प्रश्नों के उत्तर:
- (i) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक:
युवा शक्ति, कर्म-साधना और राष्ट्र-निर्माण का संकल्प। - (ii) आज नौजवानों को कोई मंज़िल क्यों नहीं दिखती?
नौजवानों को अब तक केवल दिशाहीन रूप से 'बढ़े चलो' का नारा दिया गया, किन्तु उन्हें किसी ने वास्तविक लक्ष्य और स्पष्ट दिशा नहीं दिखाई, इसीलिए उन्हें अपनी मंजिल स्पष्ट नहीं दिखती। - (iii) नौजवान किस-किस क्षेत्र में साधना में रत हैं?
नौजवान नगरों के दफ्तरों व कॉलेजों से लेकर बर्फीली चोटियों, पथरीली राहों, तपते रेगिस्तानों, समुद्र की तूफानी लहरों तथा कल-कारखानों की मशीनों के बीच राष्ट्र-सेवा और कर्म-साधना में रत हैं। - (iv) जीवन संघर्ष का महत्त्व क्या है?
विषम परिस्थितियों और चुनौतियों से जूझते हुए राष्ट्र के गौरव और विकास को आगे बढ़ाना ही जीवन संघर्ष का सच्चा महत्व है, जो व्यक्ति को असीम क्षमता और विशालता प्रदान करता है। - (v) हम कैसे महान बन सकते हैं?
हम अपने बिखरे हुए संकल्पों, श्रम और सपनों को राष्ट्र-हित की साझी चेतना में एकाकार करके तथा विषम परिस्थितियों में निडर कर्मवीर बनकर महान बन सकते हैं।
In English (Question & Model Answer)
नौजवानो ! इस वक्त तुम्हारी कोई मंज़िल नहीं, क्योंकि अब तक तुम्हें मंज़िल किसी ने दिखाई ही नहीं। 'बढ़े चलो' सभी कहते रहे। कहाँ ? - यह न किसी ने बताया न किसी ने पूछा। अब पूछने की आवश्यकता भी नहीं - अपनी मंज़िल खुद तय करो ! इस मंज़िल को तय करते समय इतना ध्यान रहे कि तुम वह ही नहीं, जो नित्य नई छवियाँ धारण करते नगरों के कॉलेजों, दफ़्तरों या रास्तों में हो, तुम बर्फ़ीली चोटियों और ऊँची-नीची पथरीली राहों पर देश का भार अपनी पीठ पर लादने वालों में भी हो और तपते रेगिस्तानों में ऊँटों के काफ़िलों पर देश की प्रतिष्ठा ढोने वालों में भी ! वह तुम ही हो जो न गरजती हुई समुद्री लहरों के थपेड़ों में मछलियाँ पकड़ते हुए भयभीत होते हो और न दिन-रात मशीनों की गड़गड़ाहट सुनकर बहरे होते हो ! अपने इन सपनों को एक कर लो, तब देखो तुम कितने महान हो, कितने विशाल !
(i) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ii) आज नौजवानों को कोई मंज़िल क्यों नहीं दिखती ?
(iii) नौजवान किस-किस क्षेत्र में साधना में रत हैं ?
(iv) जीवन संघर्ष का महत्त्व क्या है ?
(v) हम कैसे महान बन सकते हैं ?
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.
गद्यांश 9(ब) के सभी प्रश्नों के उत्तर:
- (i) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक:
युवा शक्ति, कर्म-साधना और राष्ट्र-निर्माण का संकल्प। - (ii) आज नौजवानों को कोई मंज़िल क्यों नहीं दिखती?
नौजवानों को अब तक केवल दिशाहीन रूप से 'बढ़े चलो' का नारा दिया गया, किन्तु उन्हें किसी ने वास्तविक लक्ष्य और स्पष्ट दिशा नहीं दिखाई, इसीलिए उन्हें अपनी मंजिल स्पष्ट नहीं दिखती। - (iii) नौजवान किस-किस क्षेत्र में साधना में रत हैं?
नौजवान नगरों के दफ्तरों व कॉलेजों से लेकर बर्फीली चोटियों, पथरीली राहों, तपते रेगिस्तानों, समुद्र की तूफानी लहरों तथा कल-कारखानों की मशीनों के बीच राष्ट्र-सेवा और कर्म-साधना में रत हैं। - (iv) जीवन संघर्ष का महत्त्व क्या है?
विषम परिस्थितियों और चुनौतियों से जूझते हुए राष्ट्र के गौरव और विकास को आगे बढ़ाना ही जीवन संघर्ष का सच्चा महत्व है, जो व्यक्ति को असीम क्षमता और विशालता प्रदान करता है। - (v) हम कैसे महान बन सकते हैं?
हम अपने बिखरे हुए संकल्पों, श्रम और सपनों को राष्ट्र-हित की साझी चेतना में एकाकार करके तथा विषम परिस्थितियों में निडर कर्मवीर बनकर महान बन सकते हैं।