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निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और समाज पर उसका प्रभाव"

201850M
आदर्श उत्तर

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और समाज पर उसका प्रभाव: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, सूचना क्रांति, टीआरपी की विद्रूपता एवं नैतिक पत्रकारिता का संकल्प

"यदि मुझे यह तय करना हो कि बिना मीडिया (अखबार) की सरकार चाहिए या बिना सरकार का मीडिया, तो मैं बिना किसी हिचकिचाहट के बिना सरकार के मीडिया को चुनूँगा।" — थॉमस जेफरसन
"मीडिया लोकतंत्र का सजग प्रहरी और चतुर्थ स्तंभ है; जब मीडिया सत्ता से सच बोलने का नैतिक साहस दिखाता है तो लोकतंत्र मजबूत होता है, किन्तु जब वह सनसनी की अंधी दौड़ में शामिल होता है तो समाज बिखरने लगता है।"

1. प्रस्तावना एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अभ्युदय:
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ-साथ मीडिया को 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ' (Fourth Estate) माना गया है। 21वीं सदी में उपग्रह आधारित 24x7 टीवी समाचार चैनलों, सामुदायिक रेडियो, पॉडकास्ट्स और इंटरनेट आधारित लाइव ब्रॉडकास्टिंग ने देश में एक अप्रत्याशित 'सूचना क्रांति' को जन्म दिया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सूचनाओं को महलों और महानगरों से निकालकर देश के सुदूर गांवों और झोपड़ियों में बैठे आम नागरिक के ड्राइंग रूम और मोबाइल स्क्रीन तक पहुँचाकर जन-चेतना को अभूतपूर्व रूप से सशक्त किया है।

2. समाज पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सकारात्मक एवं कल्याणकारी प्रभाव:

  • सूचना का तात्कालिक लोकतंत्रीकरण: देश और दुनिया के कोने-कोने में घटित होने वाली घटनाओं का सीधा व सजीव प्रसारण, जिससे नागरिक सजग और जागरूक बनते हैं।
  • प्रशासनिक जवाबदेही एवं खोजी पत्रकारिता: 'स्टिंग ऑपरेशनों' और लगातार रिपोर्टिंग के माध्यम से घोटालों, भ्रष्टाचार, अवैध उत्खनन और लालफीताशाही का पर्दाफाश कर भ्रष्ट अधिकारियों व नेताओं पर नकेल कसना।
  • आपदा प्रबंधन में जीवनरक्षक भूमिका: चक्रवातों (जैसे हुदहुद, बिपरजॉय), बाढ़, भूकंप और महामारियों के समय चौबीसों घंटे सटीक चेतावनी प्रसारित कर लाखों निर्दोष नागरिकों की जान बचाना।
  • जन-आंदोलनों और जन-मुद्दों को राष्ट्रीय मंच देना: निर्भया आंदोलन, भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल आंदोलन, तथा सुदूर अंचलों में होने वाले सामाजिक अत्याचारों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाकर न्याय दिलाना।
  • शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक चेतना का विस्तार: संसद टीवी, स्वयं प्रभा तथा दूरदर्शन ज्ञान दर्शन जैसे माध्यमों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व भारतीय संस्कृति का प्रसार।

3. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की समकालीन विद्रूपताएँ एवं नकारात्मक प्रभाव:

  • टीआरपी (TRP) की अंधी एवं विषाक्त दौड़: विज्ञापन राजस्व बटोरने हेतु गंभीर समाचारों के स्थान पर सनसनीखेज खबरें (Sensationalism), अंधविश्वास, फिल्मी गॉसिप्स और टीवी स्टूडियो में चिल्लाहट भरे हिंसक डिबेट्स का आयोजन।
  • 'मीडिया ट्रायल' एवं न्याय प्रणाली का हनन: अदालत का फैसला आने से पहले ही टीवी चैनलों द्वारा किसी भी व्यक्ति को 'अपराधी' या 'निर्दोष' घोषित कर देना, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष सुनवाई व प्रतिष्ठा का अधिकार) का घोर हनन होता है।
  • सामाजिक व सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: टीआरपी बढ़ाने हेतु समाज में नफरत, उन्माद और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाले भड़काऊ विमर्शों को बढ़ावा देना।
  • कॉर्पोरेट घरानों का आधिपत्य (Crony Media): बड़े उद्योगपतियों द्वारा मीडिया घरानों के अधिग्रहण से किसानों की बदहाली, बेरोजगारी और महंगाई जैसे वास्तविक जन-मुद्दों का पूरी तरह गायब हो जाना।
  • फेक न्यूज एवं डीपफेक का प्रसार: सोशल मीडिया से बिना पुष्टि किए भ्रामक व फर्जी वीडियो प्रसारित कर समाज में दंगे और अशांति भड़काना।

4. संवैधानिक मर्यादा एवं विधिक नियमन:

  • अनुच्छेद 19(1)(क): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत प्रेस की स्वतंत्रता अंतर्निहित है।
  • अनुच्छेद 19(2): भारत की संप्रभुता, अखंडता, लोक-व्यवस्था और शालीनता के संरक्षण हेतु युक्तियुक्त निर्बंधन।
  • स्व-नियामक संस्थाएं: सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की अध्यक्षता वाली 'न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी' (NBDSA) की आचार संहिता।

5. स्थायी सुधार हेतु रणनीतिक रोडमैप (आगे की राह):

  • टीआरपी प्रणाली का पारदर्शी पुनर्गठन: टीआरपी निर्धारण में 'बार्क' (BARC) की धांधली को समाप्त कर बहु-आयामी डिजिटल ऑडिट प्रणाली लागू करना।
  • क्रॉस-मीडिया ओनरशिप पर विधिक सीमा: एक ही कॉर्पोरेट घराने द्वारा अखबार, टीवी और इंटरनेट के एकाधिकार को रोकने हेतु कड़े कानून।
  • प्रसार भारती (दूरदर्शन व आकाशवाणी) को पूर्ण स्वायत्तता: बीबीसी (BBC) की तर्ज पर सार्वजनिक प्रसारक को स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वस्तरीय बनाना।
  • नागरिकों में मीडिया साक्षरता: दर्शकों को चीखने-चिल्लाने वाले चैनलों का बहिष्कार कर तथ्यपरक और गंभीर पत्रकारिता को चुनने हेतु जागरूक करना।

6. निष्कर्ष:
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समाज का दर्पण भी है और मार्गदर्शक भी। यदि दर्पण में ही दरार आ जाए, तो समाज का चेहरा विकृत दिखने लगता है। अतः इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को टीआरपी और व्यावसायिक मुनाफे के मोहपाश से बाहर निकलकर सत्य, निष्पक्षता और राष्ट्रहित के पावन संकल्प को पुनः अंगीकार करना होगा। एक नैतिक, निर्भीक और जिम्मेदार मीडिया ही लोकतंत्र को अजेय बनाएगा और 'विकसित भारत @2047' के निर्माण का पथ प्रशस्त करेगा।

In English (Question & Model Answer)

निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और समाज पर उसका प्रभाव"

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और समाज पर उसका प्रभाव: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, सूचना क्रांति, टीआरपी की विद्रूपता एवं नैतिक पत्रकारिता का संकल्प

"यदि मुझे यह तय करना हो कि बिना मीडिया (अखबार) की सरकार चाहिए या बिना सरकार का मीडिया, तो मैं बिना किसी हिचकिचाहट के बिना सरकार के मीडिया को चुनूँगा।" — थॉमस जेफरसन
"मीडिया लोकतंत्र का सजग प्रहरी और चतुर्थ स्तंभ है; जब मीडिया सत्ता से सच बोलने का नैतिक साहस दिखाता है तो लोकतंत्र मजबूत होता है, किन्तु जब वह सनसनी की अंधी दौड़ में शामिल होता है तो समाज बिखरने लगता है।"

1. प्रस्तावना एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अभ्युदय:
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ-साथ मीडिया को 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ' (Fourth Estate) माना गया है। 21वीं सदी में उपग्रह आधारित 24x7 टीवी समाचार चैनलों, सामुदायिक रेडियो, पॉडकास्ट्स और इंटरनेट आधारित लाइव ब्रॉडकास्टिंग ने देश में एक अप्रत्याशित 'सूचना क्रांति' को जन्म दिया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सूचनाओं को महलों और महानगरों से निकालकर देश के सुदूर गांवों और झोपड़ियों में बैठे आम नागरिक के ड्राइंग रूम और मोबाइल स्क्रीन तक पहुँचाकर जन-चेतना को अभूतपूर्व रूप से सशक्त किया है।

2. समाज पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सकारात्मक एवं कल्याणकारी प्रभाव:

  • सूचना का तात्कालिक लोकतंत्रीकरण: देश और दुनिया के कोने-कोने में घटित होने वाली घटनाओं का सीधा व सजीव प्रसारण, जिससे नागरिक सजग और जागरूक बनते हैं।
  • प्रशासनिक जवाबदेही एवं खोजी पत्रकारिता: 'स्टिंग ऑपरेशनों' और लगातार रिपोर्टिंग के माध्यम से घोटालों, भ्रष्टाचार, अवैध उत्खनन और लालफीताशाही का पर्दाफाश कर भ्रष्ट अधिकारियों व नेताओं पर नकेल कसना।
  • आपदा प्रबंधन में जीवनरक्षक भूमिका: चक्रवातों (जैसे हुदहुद, बिपरजॉय), बाढ़, भूकंप और महामारियों के समय चौबीसों घंटे सटीक चेतावनी प्रसारित कर लाखों निर्दोष नागरिकों की जान बचाना।
  • जन-आंदोलनों और जन-मुद्दों को राष्ट्रीय मंच देना: निर्भया आंदोलन, भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल आंदोलन, तथा सुदूर अंचलों में होने वाले सामाजिक अत्याचारों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाकर न्याय दिलाना।
  • शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक चेतना का विस्तार: संसद टीवी, स्वयं प्रभा तथा दूरदर्शन ज्ञान दर्शन जैसे माध्यमों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व भारतीय संस्कृति का प्रसार।

3. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की समकालीन विद्रूपताएँ एवं नकारात्मक प्रभाव:

  • टीआरपी (TRP) की अंधी एवं विषाक्त दौड़: विज्ञापन राजस्व बटोरने हेतु गंभीर समाचारों के स्थान पर सनसनीखेज खबरें (Sensationalism), अंधविश्वास, फिल्मी गॉसिप्स और टीवी स्टूडियो में चिल्लाहट भरे हिंसक डिबेट्स का आयोजन।
  • 'मीडिया ट्रायल' एवं न्याय प्रणाली का हनन: अदालत का फैसला आने से पहले ही टीवी चैनलों द्वारा किसी भी व्यक्ति को 'अपराधी' या 'निर्दोष' घोषित कर देना, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष सुनवाई व प्रतिष्ठा का अधिकार) का घोर हनन होता है।
  • सामाजिक व सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: टीआरपी बढ़ाने हेतु समाज में नफरत, उन्माद और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाले भड़काऊ विमर्शों को बढ़ावा देना।
  • कॉर्पोरेट घरानों का आधिपत्य (Crony Media): बड़े उद्योगपतियों द्वारा मीडिया घरानों के अधिग्रहण से किसानों की बदहाली, बेरोजगारी और महंगाई जैसे वास्तविक जन-मुद्दों का पूरी तरह गायब हो जाना।
  • फेक न्यूज एवं डीपफेक का प्रसार: सोशल मीडिया से बिना पुष्टि किए भ्रामक व फर्जी वीडियो प्रसारित कर समाज में दंगे और अशांति भड़काना।

4. संवैधानिक मर्यादा एवं विधिक नियमन:

  • अनुच्छेद 19(1)(क): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत प्रेस की स्वतंत्रता अंतर्निहित है।
  • अनुच्छेद 19(2): भारत की संप्रभुता, अखंडता, लोक-व्यवस्था और शालीनता के संरक्षण हेतु युक्तियुक्त निर्बंधन।
  • स्व-नियामक संस्थाएं: सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की अध्यक्षता वाली 'न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी' (NBDSA) की आचार संहिता।

5. स्थायी सुधार हेतु रणनीतिक रोडमैप (आगे की राह):

  • टीआरपी प्रणाली का पारदर्शी पुनर्गठन: टीआरपी निर्धारण में 'बार्क' (BARC) की धांधली को समाप्त कर बहु-आयामी डिजिटल ऑडिट प्रणाली लागू करना।
  • क्रॉस-मीडिया ओनरशिप पर विधिक सीमा: एक ही कॉर्पोरेट घराने द्वारा अखबार, टीवी और इंटरनेट के एकाधिकार को रोकने हेतु कड़े कानून।
  • प्रसार भारती (दूरदर्शन व आकाशवाणी) को पूर्ण स्वायत्तता: बीबीसी (BBC) की तर्ज पर सार्वजनिक प्रसारक को स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वस्तरीय बनाना।
  • नागरिकों में मीडिया साक्षरता: दर्शकों को चीखने-चिल्लाने वाले चैनलों का बहिष्कार कर तथ्यपरक और गंभीर पत्रकारिता को चुनने हेतु जागरूक करना।

6. निष्कर्ष:
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समाज का दर्पण भी है और मार्गदर्शक भी। यदि दर्पण में ही दरार आ जाए, तो समाज का चेहरा विकृत दिखने लगता है। अतः इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को टीआरपी और व्यावसायिक मुनाफे के मोहपाश से बाहर निकलकर सत्य, निष्पक्षता और राष्ट्रहित के पावन संकल्प को पुनः अंगीकार करना होगा। एक नैतिक, निर्भीक और जिम्मेदार मीडिया ही लोकतंत्र को अजेय बनाएगा और 'विकसित भारत @2047' के निर्माण का पथ प्रशस्त करेगा।

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