निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्"
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन": निष्काम कर्मयोग का शाश्वत दर्शन, मनोवैज्ञानिक संतुलन एवं प्रशासनिक सत्यनिष्ठा
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥" — श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 47)
(तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं; इसलिए तू फल की वासना वाला मत बन और न ही तेरी आसक्ति अकर्मण्यता (कर्म न करने) में हो।)
1. प्रस्तावना एवं गीता का अमर संदेश:
श्रीमद्भगवद्गीता का यह अमर श्लोक भारतीय जीवन-दर्शन और नीतिशास्त्र का सर्वोच्च शिखर है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन विषाद और मोह से ग्रस्त होकर अपने क्षत्रिय कर्तव्य से विमुख हो रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने 'निष्काम कर्मयोग' का यह दिव्य उपदेश दिया। यह श्लोक मनुष्य को कर्तव्य-विमुखता और मानसिक तनाव से निकालकर पूर्ण समर्पण और निष्ठा के साथ कर्म करने की प्रेरणा देता है।
2. श्लोक में निहित चार मौलिक सिद्धांत:
- 1. कर्म करने में ही मनुष्य का अधिकार: मानव जीवन कर्मक्षेत्र है। व्यक्ति का नियंत्रण केवल अपने परिश्रम, ईमानदारी और कर्म की गुणवत्ता पर है, न कि उसके परिणाम पर।
- 2. फल की आसक्ति से मुक्ति (तनाव-मुक्ति): परिणाम (सफलता-असफलता, लाभ-हानि) की अत्यधिक चिंता मनुष्य की एकाग्रता को नष्ट कर देती है और भय व अवसाद को जन्म देती है। जब फल की चिंता छोड़ दी जाती है, तो कार्य की गुणवत्ता अपने आप उत्कृष्ट हो जाती है।
- 3. फल का हेतु न बनना: किसी स्वार्थ या व्यक्तिगत लाभ के लालच में आकर अनैतिक मार्ग न अपनाना।
- 4. अकर्मण्यता (आलस्य) का निषेध: फल की इच्छा न करने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि व्यक्ति हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाए। कर्तव्य-पालन अनिवार्य है।
3. आधुनिक युग एवं लोक प्रशासन में प्रासंगिकता:
- प्रशासनिक सत्यनिष्ठा एवं सुशासन: एक लोक सेवक (सिविल सर्वेंट) जब निष्काम भाव से कार्य करता है, तो वह रिश्वत, पक्षपात और राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर केवल संविधान और जन-कल्याण (Public Welfare) हेतु निर्णय लेता है।
- विद्यार्थी जीवन एवं मानसिक संतुलन: प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं हेतु यह श्लोक परीक्षा के तनाव और असफलता के भय से मुक्ति पाने का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संबल है।
4. निष्कर्ष:
'निष्काम कर्मयोग' कर्म से पलायन का नहीं, बल्कि कर्म में अहंकार और स्वार्थ के त्याग का नाम है। जब देश का प्रत्येक नागरिक अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण से करेगा, तभी समाज में सुख, शांति और समृद्धि का वास होगा और भारत आत्मनिर्भर बनकर 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्य को प्राप्त करेगा।
In English (Question & Model Answer)
निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन": निष्काम कर्मयोग का शाश्वत दर्शन, मनोवैज्ञानिक संतुलन एवं प्रशासनिक सत्यनिष्ठा
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥" — श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 47)
(तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं; इसलिए तू फल की वासना वाला मत बन और न ही तेरी आसक्ति अकर्मण्यता (कर्म न करने) में हो।)
1. प्रस्तावना एवं गीता का अमर संदेश:
श्रीमद्भगवद्गीता का यह अमर श्लोक भारतीय जीवन-दर्शन और नीतिशास्त्र का सर्वोच्च शिखर है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन विषाद और मोह से ग्रस्त होकर अपने क्षत्रिय कर्तव्य से विमुख हो रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने 'निष्काम कर्मयोग' का यह दिव्य उपदेश दिया। यह श्लोक मनुष्य को कर्तव्य-विमुखता और मानसिक तनाव से निकालकर पूर्ण समर्पण और निष्ठा के साथ कर्म करने की प्रेरणा देता है।
2. श्लोक में निहित चार मौलिक सिद्धांत:
- 1. कर्म करने में ही मनुष्य का अधिकार: मानव जीवन कर्मक्षेत्र है। व्यक्ति का नियंत्रण केवल अपने परिश्रम, ईमानदारी और कर्म की गुणवत्ता पर है, न कि उसके परिणाम पर।
- 2. फल की आसक्ति से मुक्ति (तनाव-मुक्ति): परिणाम (सफलता-असफलता, लाभ-हानि) की अत्यधिक चिंता मनुष्य की एकाग्रता को नष्ट कर देती है और भय व अवसाद को जन्म देती है। जब फल की चिंता छोड़ दी जाती है, तो कार्य की गुणवत्ता अपने आप उत्कृष्ट हो जाती है।
- 3. फल का हेतु न बनना: किसी स्वार्थ या व्यक्तिगत लाभ के लालच में आकर अनैतिक मार्ग न अपनाना।
- 4. अकर्मण्यता (आलस्य) का निषेध: फल की इच्छा न करने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि व्यक्ति हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाए। कर्तव्य-पालन अनिवार्य है।
3. आधुनिक युग एवं लोक प्रशासन में प्रासंगिकता:
- प्रशासनिक सत्यनिष्ठा एवं सुशासन: एक लोक सेवक (सिविल सर्वेंट) जब निष्काम भाव से कार्य करता है, तो वह रिश्वत, पक्षपात और राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर केवल संविधान और जन-कल्याण (Public Welfare) हेतु निर्णय लेता है।
- विद्यार्थी जीवन एवं मानसिक संतुलन: प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं हेतु यह श्लोक परीक्षा के तनाव और असफलता के भय से मुक्ति पाने का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संबल है।
4. निष्कर्ष:
'निष्काम कर्मयोग' कर्म से पलायन का नहीं, बल्कि कर्म में अहंकार और स्वार्थ के त्याग का नाम है। जब देश का प्रत्येक नागरिक अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण से करेगा, तभी समाज में सुख, शांति और समृद्धि का वास होगा और भारत आत्मनिर्भर बनकर 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्य को प्राप्त करेगा।