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निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "अस्पृश्यता बनाम सामाजिक दूरी"

201925M
आदर्श उत्तर

अस्पृश्यता बनाम सामाजिक दूरी: समाजशास्त्रीय अंतर, संवैधानिक दृष्टिकोण एवं मानवीय गरिमा

"अस्पृश्यता मानवता और समाज के माथे पर एक घिनौना कलंक व कानूनी अपराध है; जबकि महामारी के दौरान शारीरिक दूरी (Physical Distancing) जीवन रक्षा का एक अस्थायी वैज्ञानिक उपाय है।"

1. प्रस्तावना एवं वैचारिक द्वंद्व:
कोरोना महामारी के दौरान प्रयुक्त शब्दावली 'सोशल डिस्टेंसिंग' (सामाजिक दूरी) ने भारतीय समाज में एक गंभीर विमर्श को जन्म दिया। सतही तौर पर एक समान प्रतीत होने के बावजूद जातिगत 'अस्पृश्यता' (Untouchability) और स्वास्थ्यगत 'शारीरिक दूरी' (Physical Distancing) के मध्य जमीन-आसमान का दार्शनिक, नैतिक और वैधानिक अंतर है।

2. दोनों अवधारणाओं में मौलिक एवं संरचनात्मक अंतर:

  • उत्पत्ति एवं स्वरूप:
    • अस्पृश्यता: जन्म और जाति पर आधारित एक सामंती, अमानवीय व घृणास्पद कुरीति है, जिसका उद्देश्य सदियों तक वंचित वर्गों को अपमानित, बहिष्कृत और शोषित रखना रहा है।
    • स्वास्थ्यगत दूरी: संक्रामक महामारियों (जैसे कोविड-19) के प्रसार को रोकने हेतु चिकित्सा विज्ञान द्वारा अनुशंसित एक अस्थायी, आपातकालीन व जीवनरक्षक उपाय है।
  • समानता बनाम भेदभाव:
    • अस्पृश्यता: केवल विशिष्ट जातियों के विरुद्ध लक्षित और घृणा-प्रेरित भेदभावपूर्ण आचरण है।
    • शारीरिक दूरी: जाति, धर्म, लिंग या धन से परे होकर संपूर्ण मानव जाति (राष्ट्रपति से लेकर सामान्य नागरिक तक) पर समान रूप से लागू होने वाला सुरक्षा प्रोटोकॉल है।
  • संवैधानिक एवं विधिक स्थिति:
    • अस्पृश्यता: संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत पूर्णतः प्रतिबंधित, दंडनीय अपराध एवं नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम (1955) तथा SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम (1989) के तहत कठोर दंड का पात्र है।
    • स्वास्थ्य दूरी: संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार) तथा महामारी रोग अधिनियम, 1897 के अंतर्गत लोकहित में लागू की जाती है।

3. निष्कर्ष:
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस भ्रम को दूर करने हेतु 'सामाजिक दूरी' के स्थान पर 'शारीरिक दूरी' (Physical Distancing) शब्द के प्रयोग की अनुशंसा की। महामारी के समय शारीरिक दूरी आवश्यक हो सकती है, किन्तु समाज में भावनात्मक निकटता, बंधुत्व और समरसता का होना अनिवार्य है। अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराई का समूल विनाश और वैज्ञानिक चेतना का प्रसार ही 'विकसित भारत @2047' का सच्चा मार्ग है।

In English (Question & Model Answer)

निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "अस्पृश्यता बनाम सामाजिक दूरी"

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

अस्पृश्यता बनाम सामाजिक दूरी: समाजशास्त्रीय अंतर, संवैधानिक दृष्टिकोण एवं मानवीय गरिमा

"अस्पृश्यता मानवता और समाज के माथे पर एक घिनौना कलंक व कानूनी अपराध है; जबकि महामारी के दौरान शारीरिक दूरी (Physical Distancing) जीवन रक्षा का एक अस्थायी वैज्ञानिक उपाय है।"

1. प्रस्तावना एवं वैचारिक द्वंद्व:
कोरोना महामारी के दौरान प्रयुक्त शब्दावली 'सोशल डिस्टेंसिंग' (सामाजिक दूरी) ने भारतीय समाज में एक गंभीर विमर्श को जन्म दिया। सतही तौर पर एक समान प्रतीत होने के बावजूद जातिगत 'अस्पृश्यता' (Untouchability) और स्वास्थ्यगत 'शारीरिक दूरी' (Physical Distancing) के मध्य जमीन-आसमान का दार्शनिक, नैतिक और वैधानिक अंतर है।

2. दोनों अवधारणाओं में मौलिक एवं संरचनात्मक अंतर:

  • उत्पत्ति एवं स्वरूप:
    • अस्पृश्यता: जन्म और जाति पर आधारित एक सामंती, अमानवीय व घृणास्पद कुरीति है, जिसका उद्देश्य सदियों तक वंचित वर्गों को अपमानित, बहिष्कृत और शोषित रखना रहा है।
    • स्वास्थ्यगत दूरी: संक्रामक महामारियों (जैसे कोविड-19) के प्रसार को रोकने हेतु चिकित्सा विज्ञान द्वारा अनुशंसित एक अस्थायी, आपातकालीन व जीवनरक्षक उपाय है।
  • समानता बनाम भेदभाव:
    • अस्पृश्यता: केवल विशिष्ट जातियों के विरुद्ध लक्षित और घृणा-प्रेरित भेदभावपूर्ण आचरण है।
    • शारीरिक दूरी: जाति, धर्म, लिंग या धन से परे होकर संपूर्ण मानव जाति (राष्ट्रपति से लेकर सामान्य नागरिक तक) पर समान रूप से लागू होने वाला सुरक्षा प्रोटोकॉल है।
  • संवैधानिक एवं विधिक स्थिति:
    • अस्पृश्यता: संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत पूर्णतः प्रतिबंधित, दंडनीय अपराध एवं नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम (1955) तथा SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम (1989) के तहत कठोर दंड का पात्र है।
    • स्वास्थ्य दूरी: संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार) तथा महामारी रोग अधिनियम, 1897 के अंतर्गत लोकहित में लागू की जाती है।

3. निष्कर्ष:
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस भ्रम को दूर करने हेतु 'सामाजिक दूरी' के स्थान पर 'शारीरिक दूरी' (Physical Distancing) शब्द के प्रयोग की अनुशंसा की। महामारी के समय शारीरिक दूरी आवश्यक हो सकती है, किन्तु समाज में भावनात्मक निकटता, बंधुत्व और समरसता का होना अनिवार्य है। अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराई का समूल विनाश और वैज्ञानिक चेतना का प्रसार ही 'विकसित भारत @2047' का सच्चा मार्ग है।

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