निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण"
भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण: वैदिक पारिस्थितिक चेतना, देव-वन परंपरा एवं संधारणीय जीवन-शैली
"माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" (यह धरती हमारी माता है और हम सब इसकी संतान हैं।) — अथर्ववेद (पृथ्वी सूक्त)
"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः॥" — यजुर्वेद शांति मंत्र
1. प्रस्तावना एवं प्रकृति के प्रति आध्यात्मिक दृष्टि:
भारतीय संस्कृति प्रारंभ से ही 'प्रकृति-केंद्रित' (Ecocentric) रही है। पश्चिमी दर्शन के विपरीत, जिसने प्रकृति को केवल मानव उपभोग की वस्तु माना, भारतीय मनीषियों ने प्रकृति (पर्यावरण) को साक्षात ईश्वर और जननी के रूप में प्रतिष्ठित किया। वैदिक काल से लेकर आज तक भारतीय जीवन-शैली में वृक्ष, नदी, पर्वत, वायु और जीव-जंतुओं के साथ सह-अस्तित्व और कृतज्ञता का संबंध रहा है।
2. भारतीय परंपरा में पर्यावरण संरक्षण के प्रमुख आयाम:
- वनस्पतियों की पूजा एवं 'देव-वन' (Sacred Groves) परंपरा:
- ऑक्सीजन और औषधीय गुणों से भरपूर वृक्षों—पीपल, वटवृक्ष (बरगद), नीम, आंवला और घर-घर में तुलसी—की पूजा कर उन्हें काटने से बचाना।
- ग्रामीण व जनजातीय अंचलों में वनों के एक बड़े भाग को 'देव-स्थान' (सरना) घोषित कर वहां कुल्हाड़ी चलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना, जिससे जैव-विविधता अक्षुण्ण रही।
- जल एवं नदियों को 'लोकमाता' का सम्मान:
- नर्मदा, गंगा, यमुना, गोदावरी आदि जीवनदायिनी नदियों को माता मानकर पूजना तथा बहते जल में अपशिष्ट या गंदगी फेंकने को शास्त्रों में घोर पाप घोषित करना।
- पशु-पक्षियों का संरक्षण एवं देव-वाहन परंपरा:
- देवी-देवताओं के वाहनों के रूप में शेर (दुर्गा), मोर (कार्तिकेय), गरुड़ (विष्णु), हंस (सरस्वती) और नंदी (शिव) को जोड़कर वन्यजीवों के शिकार पर धार्मिक रोक लगाना।
- बिश्नोई समाज का अमर बलिदान: अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 ग्रामीणों द्वारा खेजड़ी के हरे वृक्षों को बचाने हेतु अपने शीश कटवा देना ("सिर सांटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण")।
3. मध्य प्रदेश की जनजातीय पर्यावरण चेतना:
बैगा और गोंड जनजातियाँ धरती को माता मानकर उस पर गहरा हल चलाने से बचती हैं तथा महुआ व साल के वृक्षों का दैवीय संरक्षण करती हैं।
4. निष्कर्ष:
भारतीय संस्कृति का यह सनातन पर्यावरण दर्शन आज के संविधान के अनुच्छेद 51A(g) (वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों की रक्षा का मौलिक कर्तव्य) तथा भारत के वैश्विक 'मिशन लाइफ' (Mission LiFE) का मूल आधार है। अपनी इस पावन परंपरा को अपनाकर ही हम पर्यावरण संकट से मुक्ति पा सकते हैं और हरित व समृद्ध 'विकसित भारत @2047' का निर्माण कर सकते हैं।
In English (Question & Model Answer)
निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण: वैदिक पारिस्थितिक चेतना, देव-वन परंपरा एवं संधारणीय जीवन-शैली
"माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" (यह धरती हमारी माता है और हम सब इसकी संतान हैं।) — अथर्ववेद (पृथ्वी सूक्त)
"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः॥" — यजुर्वेद शांति मंत्र
1. प्रस्तावना एवं प्रकृति के प्रति आध्यात्मिक दृष्टि:
भारतीय संस्कृति प्रारंभ से ही 'प्रकृति-केंद्रित' (Ecocentric) रही है। पश्चिमी दर्शन के विपरीत, जिसने प्रकृति को केवल मानव उपभोग की वस्तु माना, भारतीय मनीषियों ने प्रकृति (पर्यावरण) को साक्षात ईश्वर और जननी के रूप में प्रतिष्ठित किया। वैदिक काल से लेकर आज तक भारतीय जीवन-शैली में वृक्ष, नदी, पर्वत, वायु और जीव-जंतुओं के साथ सह-अस्तित्व और कृतज्ञता का संबंध रहा है।
2. भारतीय परंपरा में पर्यावरण संरक्षण के प्रमुख आयाम:
- वनस्पतियों की पूजा एवं 'देव-वन' (Sacred Groves) परंपरा:
- ऑक्सीजन और औषधीय गुणों से भरपूर वृक्षों—पीपल, वटवृक्ष (बरगद), नीम, आंवला और घर-घर में तुलसी—की पूजा कर उन्हें काटने से बचाना।
- ग्रामीण व जनजातीय अंचलों में वनों के एक बड़े भाग को 'देव-स्थान' (सरना) घोषित कर वहां कुल्हाड़ी चलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना, जिससे जैव-विविधता अक्षुण्ण रही।
- जल एवं नदियों को 'लोकमाता' का सम्मान:
- नर्मदा, गंगा, यमुना, गोदावरी आदि जीवनदायिनी नदियों को माता मानकर पूजना तथा बहते जल में अपशिष्ट या गंदगी फेंकने को शास्त्रों में घोर पाप घोषित करना।
- पशु-पक्षियों का संरक्षण एवं देव-वाहन परंपरा:
- देवी-देवताओं के वाहनों के रूप में शेर (दुर्गा), मोर (कार्तिकेय), गरुड़ (विष्णु), हंस (सरस्वती) और नंदी (शिव) को जोड़कर वन्यजीवों के शिकार पर धार्मिक रोक लगाना।
- बिश्नोई समाज का अमर बलिदान: अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 ग्रामीणों द्वारा खेजड़ी के हरे वृक्षों को बचाने हेतु अपने शीश कटवा देना ("सिर सांटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण")।
3. मध्य प्रदेश की जनजातीय पर्यावरण चेतना:
बैगा और गोंड जनजातियाँ धरती को माता मानकर उस पर गहरा हल चलाने से बचती हैं तथा महुआ व साल के वृक्षों का दैवीय संरक्षण करती हैं।
4. निष्कर्ष:
भारतीय संस्कृति का यह सनातन पर्यावरण दर्शन आज के संविधान के अनुच्छेद 51A(g) (वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों की रक्षा का मौलिक कर्तव्य) तथा भारत के वैश्विक 'मिशन लाइफ' (Mission LiFE) का मूल आधार है। अपनी इस पावन परंपरा को अपनाकर ही हम पर्यावरण संकट से मुक्ति पा सकते हैं और हरित व समृद्ध 'विकसित भारत @2047' का निर्माण कर सकते हैं।