मुख्य›MPPSC Mains (हिन्दी)›सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण›सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण›अपठित गद्यांश›अथवा आज के सांस्कृतिक मानचित्र को देखिए । आधुनिकीकरण के प्रबल आग्रह

अथवा
आज के सांस्कृतिक मानचित्र को देखिए । आधुनिकीकरण के प्रबल आग्रह के बावजूद जातीय स्मृतियाँ सशक्त ढंग से उभर रही हैं और नयी सांस्कृतिक परंपरा को विस्मृत करने के पक्ष में नहीं है । समाज का ढाँचा चरमरा रहा है । वैयक्तीकरण ने एक अजीब-सी दिशाहीनता की स्थिति उत्पन्न की है, जिसमें निजी हित व्यापक सामाजिक हितों पर हावी हो गए हैं । जिस वैकल्पिक भविष्य की तलाश हम कर रहे हैं, उसमें मानव समाज के पुनर्गठन की योजना भी सम्मिलित है । इस नये समाज का आधार होगा । अर्थपूर्ण मानवीय संबंधों की पुनः स्थापना । यदि हमें औद्योगीकरण और महानगरीकरण की विकृतियों से बचना है और अमानवीकरण के उफान को रोकना है तो हमें उद्योगों का रूप बदलना होगा और साथ ही सामाजिक संबंधों का आधार भी ।
(i) इस समय भारतीय समाज किस प्रकार के अंतर्द्वंद्व से गुजर रहा है ?
(ii) 'समाज का ढाँचा चरमरा रहा है' ऐसा लेखक को क्यों लग रहा है ?
(iii) अर्थपूर्ण मानवीय संबंधों की तलाश लेखक क्यों कर रहा है ?
(iv) उद्योगों के रूप को लेखक क्यों बदलना चाहता है ?
(v) लेखक के अनुसार नये समाज निर्मिति के लिए कौन-से परिवर्तन आवश्यक है ?

202020M
आदर्श उत्तर

गद्यांश 6(ब) के सभी 5 प्रश्नों के आदर्श उत्तर:

  1. (i) इस समय भारतीय समाज किस प्रकार के अंतर्द्वंद्व से गुजर रहा है?
    भारतीय समाज एक ओर आधुनिकीकरण के तीव्र दबाव और दूसरी ओर अपनी परंपरा, सांस्कृतिक जड़ों तथा जातीय स्मृतियों को संजोए रखने के गहन अंतर्द्वंद्व से गुजर रहा है।
  2. (ii) 'समाज का ढाँचा चरमरा रहा है' ऐसा लेखक को क्यों लग रहा है?
    अत्यधिक वैयक्तिकरण (अंध व्यक्तिवाद) और दिशाहीनता के कारण जब निजी स्वार्थ व्यापक सामाजिक हितों पर हावी हो रहे हैं तथा पारस्परिक आत्मीयता समाप्त हो रही है, इसीलिए लेखक को समाज का ढाँचा चरमराता हुआ प्रतीत हो रहा है।
  3. (iii) अर्थपूर्ण मानवीय संबंधों की तलाश लेखक क्यों कर रहा है?
    औद्योगिकीकरण और महानगरीकरण से उत्पन्न अमानवीकरण, अकेलेपन और नैतिक पतन से समाज की रक्षा करने तथा स्वस्थ सामाजिक ताने-बाने को पुनर्जीवित करने के लिए लेखक अर्थपूर्ण मानवीय संबंधों की तलाश कर रहा है।
  4. (iv) उद्योगों के रूप को लेखक क्यों बदलना चाहता है?
    लेखक उद्योगों के रूप को इसलिए बदलना चाहता है ताकि केवल अंधाधुंध भौतिक लाभ और शोषण के स्थान पर मानव-केंद्रित, पर्यावरण-अनुकूल और सामाजिक संवेदना से युक्त उत्पादन ढाँचा स्थापित हो सके।
  5. (v) लेखक के अनुसार नये समाज निर्मिति के लिए कौन-से परिवर्तन आवश्यक हैं?
    नये समाज के निर्माण के लिए अर्थपूर्ण मानवीय संबंधों की पुनर्स्थापना, उद्योगों के शोषणकारी स्वरूप में मानवीय बदलाव तथा सामाजिक संबंधों को स्वार्थ के स्थान पर सहकारिता और संवेदनशीलता पर आधारित करना आवश्यक है।

In English (Question & Model Answer)

अथवा
आज के सांस्कृतिक मानचित्र को देखिए । आधुनिकीकरण के प्रबल आग्रह के बावजूद जातीय स्मृतियाँ सशक्त ढंग से उभर रही हैं और नयी सांस्कृतिक परंपरा को विस्मृत करने के पक्ष में नहीं है । समाज का ढाँचा चरमरा रहा है । वैयक्तीकरण ने एक अजीब-सी दिशाहीनता की स्थिति उत्पन्न की है, जिसमें निजी हित व्यापक सामाजिक हितों पर हावी हो गए हैं । जिस वैकल्पिक भविष्य की तलाश हम कर रहे हैं, उसमें मानव समाज के पुनर्गठन की योजना भी सम्मिलित है । इस नये समाज का आधार होगा । अर्थपूर्ण मानवीय संबंधों की पुनः स्थापना । यदि हमें औद्योगीकरण और महानगरीकरण की विकृतियों से बचना है और अमानवीकरण के उफान को रोकना है तो हमें उद्योगों का रूप बदलना होगा और साथ ही सामाजिक संबंधों का आधार भी ।
(i) इस समय भारतीय समाज किस प्रकार के अंतर्द्वंद्व से गुजर रहा है ?
(ii) 'समाज का ढाँचा चरमरा रहा है' ऐसा लेखक को क्यों लग रहा है ?
(iii) अर्थपूर्ण मानवीय संबंधों की तलाश लेखक क्यों कर रहा है ?
(iv) उद्योगों के रूप को लेखक क्यों बदलना चाहता है ?
(v) लेखक के अनुसार नये समाज निर्मिति के लिए कौन-से परिवर्तन आवश्यक है ?

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.

गद्यांश 6(ब) के सभी 5 प्रश्नों के आदर्श उत्तर:

  1. (i) इस समय भारतीय समाज किस प्रकार के अंतर्द्वंद्व से गुजर रहा है?
    भारतीय समाज एक ओर आधुनिकीकरण के तीव्र दबाव और दूसरी ओर अपनी परंपरा, सांस्कृतिक जड़ों तथा जातीय स्मृतियों को संजोए रखने के गहन अंतर्द्वंद्व से गुजर रहा है।
  2. (ii) 'समाज का ढाँचा चरमरा रहा है' ऐसा लेखक को क्यों लग रहा है?
    अत्यधिक वैयक्तिकरण (अंध व्यक्तिवाद) और दिशाहीनता के कारण जब निजी स्वार्थ व्यापक सामाजिक हितों पर हावी हो रहे हैं तथा पारस्परिक आत्मीयता समाप्त हो रही है, इसीलिए लेखक को समाज का ढाँचा चरमराता हुआ प्रतीत हो रहा है।
  3. (iii) अर्थपूर्ण मानवीय संबंधों की तलाश लेखक क्यों कर रहा है?
    औद्योगिकीकरण और महानगरीकरण से उत्पन्न अमानवीकरण, अकेलेपन और नैतिक पतन से समाज की रक्षा करने तथा स्वस्थ सामाजिक ताने-बाने को पुनर्जीवित करने के लिए लेखक अर्थपूर्ण मानवीय संबंधों की तलाश कर रहा है।
  4. (iv) उद्योगों के रूप को लेखक क्यों बदलना चाहता है?
    लेखक उद्योगों के रूप को इसलिए बदलना चाहता है ताकि केवल अंधाधुंध भौतिक लाभ और शोषण के स्थान पर मानव-केंद्रित, पर्यावरण-अनुकूल और सामाजिक संवेदना से युक्त उत्पादन ढाँचा स्थापित हो सके।
  5. (v) लेखक के अनुसार नये समाज निर्मिति के लिए कौन-से परिवर्तन आवश्यक हैं?
    नये समाज के निर्माण के लिए अर्थपूर्ण मानवीय संबंधों की पुनर्स्थापना, उद्योगों के शोषणकारी स्वरूप में मानवीय बदलाव तथा सामाजिक संबंधों को स्वार्थ के स्थान पर सहकारिता और संवेदनशीलता पर आधारित करना आवश्यक है।
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