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निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "तुलसी साहित्य और इसकी प्रासंगिकता"

202150M
आदर्श उत्तर

तुलसी साहित्य और इसकी प्रासंगिकता: लोकमंगल की अमर साधना, समन्वयवाद, सामाजिक समरसता एवं रामराज्य का आदर्श

"तुलसीदास जी का सारा काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है।" — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
"चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसैं, तिलक देत रघुबीर॥"

1. प्रस्तावना एवं युगीन संदर्भ:
गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी) भक्तिकाल के ऐसे युगदृष्टा लोकनायक महाकवि हैं, जिनके साहित्य ने भारतीय समाज को निराशा और पराभव के अंधकार से निकालकर आशा, मर्यादा और नैतिक मूल्यों का नव-आलोक प्रदान किया। 'रामचरितमानस', 'विनय पत्रिका', 'कवितावली', 'दोहावली' और 'गीतावली' जैसी अमर कृतियों के माध्यम से तुलसीदास जी ने वैदिक ज्ञान और उपनिषदों के गूढ़ दर्शन को जनभाषा (अवधी एवं ब्रज) में प्रवाहित कर जन-जन के हृदय का कंठहार बना दिया। उनका काव्य केवल भक्ति का साधन नहीं, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण आचार-संहिता है।

2. तुलसी का समन्वयवाद (समन्वय की विराट चेष्टा):
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुलसीदास को समन्वय का अप्रतिम कवि माना है:

  • शैव एवं वैष्णव मत का समन्वय: समाज में व्याप्त धार्मिक संघर्ष को समाप्त करते हुए राम के मुख से कहलवाया—"सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥" (जो शिव से द्रोह कर मेरी भक्ति करता है, वह मुझे स्वप्न में भी प्राप्त नहीं हो सकता)।
  • सगुण एवं निर्गुण का समन्वय: ज्ञान और भक्ति की दार्शनिक खाई को पाटते हुए स्पष्ट किया—"अगुनहि सगुनहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा॥"
  • भाषा एवं लोक-संस्कृति का समन्वय: संस्कृत की शास्त्रीय गरिमा को लोकभाषा अवधी और लोक-छंदों (चौपाई, दोहा, सोरठा) के साथ जोड़कर ज्ञान का लोकतंत्रीकरण किया।

3. तुलसी साहित्य की बहुआयामी समकालीन प्रासंगिकता:

  • 1. सुशासन एवं कल्याणकारी राज्य का आदर्श ('रामराज्य'):
    रामचरितमानस के उत्तरकांड में वर्णित 'रामराज्य' आज के आधुनिक लोकतांत्रिक लोककल्याणकारी राज्य (Welfare State) का सर्वोत्तम मार्गदर्शक है:
    • रोग-शोक से मुक्ति: "दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥" (शारीरिक व्याधियों, प्राकृतिक आपदाओं और मानसिक क्लेशों से मुक्ति)।
    • उत्कृष्ट स्वास्थ्य एवं दीर्घायु: "अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥" (अकाल मृत्यु का अभाव और सभी का स्वस्थ होना)।
    • पारिस्थितिक संतुलन: "बरषहिं मघ जल नीति बिचारी। राम राज पाताल भिखारी॥" (सदा फलने-फूलने वाले वन और समय पर संतुलित वर्षा)।
  • 2. सामाजिक समरसता एवं वंचितों का उत्थान:
    आधुनिक समाज जब जातिवाद और भेदभाव से जूझ रहा है, तब तुलसी के राम का केवट और निषादराज को गले लगाना, शबरी के जूठे बेर प्रेमपूर्वक खाना तथा वनवासी-गिरिजन समाज को संगठित कर अन्याय पर विजय पाना सामाजिक समरसता का सर्वोच्च प्रमाण है।
  • 3. पारिवारिक मर्यादा एवं त्याग का संदेश:
    आज के उपभोक्तावादी युग में जब संपत्ति विवादों से परिवार टूट रहे हैं, तब तुलसी साहित्य में भरत और लक्ष्मण का भ्रातृत्व प्रेम तथा राज-सिंहासन को तिनके के समान त्याग देने का आदर्श परिवार को अखंड बनाए रखने की संजीवनी है।
  • 4. पर्यावरण संरक्षण एवं प्रकृति प्रेम:
    चित्रकूट, मंदाकिनी नदी, किष्किंधा और दंडकारण्य के वनों, पशु-पक्षियों और वनस्पतियों का सजीव और आदरयुक्त चित्रण आधुनिक 'मिशन लाइफ' और प्रकृति संरक्षण का प्रत्यक्ष संदेश देता है।
  • 5. संकटकाल में धैर्य व मानसिक संबल:
    'कवितावली' में तत्कालीन महामारी, अकाल और बेरोजगारी का यथार्थ चित्रण करते हुए तुलसीदास जी 'विनय पत्रिका' के माध्यम से घोर निराशा में भी ईश्वर-विश्वास, आत्मबल और सकारात्मकता बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं।

4. मध्य प्रदेश से पावन संबंध (चित्रकूट की साधना-भूमि):
मध्य प्रदेश की पावन धरा तुलसी साहित्य की रचना स्थली रही है:

  • चित्रकूट (सतना जिला): मंदाकिनी के रामघाट पर तुलसीदास जी ने दीर्घकाल तक तपस्या की और प्रभु श्री राम के साक्षात दर्शन प्राप्त किए।
  • संस्थागत संरक्षण: मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा चित्रकूट में 'तुलसी शोध संस्थान' तथा रामवन (सतना) में 'तुलसी संग्रहालय' की स्थापना कर तुलसी साहित्य के शोध को निरंतर बढ़ावा दिया जा रहा है।

5. निष्कर्ष:
गोस्वामी तुलसीदास किसी एक काल, संप्रदाय या भूगोल के कवि नहीं हैं; वे शाश्वत मानवता के अमर प्रवक्ता हैं। उनका साहित्य व्यक्ति को 'मर्यादित', समाज को 'समरस', परिवार को 'संस्कारित' और शासन को 'लोकमंगलकारी' बनाने का अक्षय स्रोत है। जब भारत 'विकसित भारत @2047' के निर्माण की ओर अग्रसर है, तब तुलसी साहित्य की नैतिक मर्यादा और समरसता ही देश को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाए रखेगी।

In English (Question & Model Answer)

निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "तुलसी साहित्य और इसकी प्रासंगिकता"

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

तुलसी साहित्य और इसकी प्रासंगिकता: लोकमंगल की अमर साधना, समन्वयवाद, सामाजिक समरसता एवं रामराज्य का आदर्श

"तुलसीदास जी का सारा काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है।" — आचार्य रामचंद्र शुक्ल
"चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसैं, तिलक देत रघुबीर॥"

1. प्रस्तावना एवं युगीन संदर्भ:
गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी) भक्तिकाल के ऐसे युगदृष्टा लोकनायक महाकवि हैं, जिनके साहित्य ने भारतीय समाज को निराशा और पराभव के अंधकार से निकालकर आशा, मर्यादा और नैतिक मूल्यों का नव-आलोक प्रदान किया। 'रामचरितमानस', 'विनय पत्रिका', 'कवितावली', 'दोहावली' और 'गीतावली' जैसी अमर कृतियों के माध्यम से तुलसीदास जी ने वैदिक ज्ञान और उपनिषदों के गूढ़ दर्शन को जनभाषा (अवधी एवं ब्रज) में प्रवाहित कर जन-जन के हृदय का कंठहार बना दिया। उनका काव्य केवल भक्ति का साधन नहीं, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण आचार-संहिता है।

2. तुलसी का समन्वयवाद (समन्वय की विराट चेष्टा):
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुलसीदास को समन्वय का अप्रतिम कवि माना है:

  • शैव एवं वैष्णव मत का समन्वय: समाज में व्याप्त धार्मिक संघर्ष को समाप्त करते हुए राम के मुख से कहलवाया—"सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥" (जो शिव से द्रोह कर मेरी भक्ति करता है, वह मुझे स्वप्न में भी प्राप्त नहीं हो सकता)।
  • सगुण एवं निर्गुण का समन्वय: ज्ञान और भक्ति की दार्शनिक खाई को पाटते हुए स्पष्ट किया—"अगुनहि सगुनहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा॥"
  • भाषा एवं लोक-संस्कृति का समन्वय: संस्कृत की शास्त्रीय गरिमा को लोकभाषा अवधी और लोक-छंदों (चौपाई, दोहा, सोरठा) के साथ जोड़कर ज्ञान का लोकतंत्रीकरण किया।

3. तुलसी साहित्य की बहुआयामी समकालीन प्रासंगिकता:

  • 1. सुशासन एवं कल्याणकारी राज्य का आदर्श ('रामराज्य'):
    रामचरितमानस के उत्तरकांड में वर्णित 'रामराज्य' आज के आधुनिक लोकतांत्रिक लोककल्याणकारी राज्य (Welfare State) का सर्वोत्तम मार्गदर्शक है:
    • रोग-शोक से मुक्ति: "दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥" (शारीरिक व्याधियों, प्राकृतिक आपदाओं और मानसिक क्लेशों से मुक्ति)।
    • उत्कृष्ट स्वास्थ्य एवं दीर्घायु: "अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥" (अकाल मृत्यु का अभाव और सभी का स्वस्थ होना)।
    • पारिस्थितिक संतुलन: "बरषहिं मघ जल नीति बिचारी। राम राज पाताल भिखारी॥" (सदा फलने-फूलने वाले वन और समय पर संतुलित वर्षा)।
  • 2. सामाजिक समरसता एवं वंचितों का उत्थान:
    आधुनिक समाज जब जातिवाद और भेदभाव से जूझ रहा है, तब तुलसी के राम का केवट और निषादराज को गले लगाना, शबरी के जूठे बेर प्रेमपूर्वक खाना तथा वनवासी-गिरिजन समाज को संगठित कर अन्याय पर विजय पाना सामाजिक समरसता का सर्वोच्च प्रमाण है।
  • 3. पारिवारिक मर्यादा एवं त्याग का संदेश:
    आज के उपभोक्तावादी युग में जब संपत्ति विवादों से परिवार टूट रहे हैं, तब तुलसी साहित्य में भरत और लक्ष्मण का भ्रातृत्व प्रेम तथा राज-सिंहासन को तिनके के समान त्याग देने का आदर्श परिवार को अखंड बनाए रखने की संजीवनी है।
  • 4. पर्यावरण संरक्षण एवं प्रकृति प्रेम:
    चित्रकूट, मंदाकिनी नदी, किष्किंधा और दंडकारण्य के वनों, पशु-पक्षियों और वनस्पतियों का सजीव और आदरयुक्त चित्रण आधुनिक 'मिशन लाइफ' और प्रकृति संरक्षण का प्रत्यक्ष संदेश देता है।
  • 5. संकटकाल में धैर्य व मानसिक संबल:
    'कवितावली' में तत्कालीन महामारी, अकाल और बेरोजगारी का यथार्थ चित्रण करते हुए तुलसीदास जी 'विनय पत्रिका' के माध्यम से घोर निराशा में भी ईश्वर-विश्वास, आत्मबल और सकारात्मकता बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं।

4. मध्य प्रदेश से पावन संबंध (चित्रकूट की साधना-भूमि):
मध्य प्रदेश की पावन धरा तुलसी साहित्य की रचना स्थली रही है:

  • चित्रकूट (सतना जिला): मंदाकिनी के रामघाट पर तुलसीदास जी ने दीर्घकाल तक तपस्या की और प्रभु श्री राम के साक्षात दर्शन प्राप्त किए।
  • संस्थागत संरक्षण: मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा चित्रकूट में 'तुलसी शोध संस्थान' तथा रामवन (सतना) में 'तुलसी संग्रहालय' की स्थापना कर तुलसी साहित्य के शोध को निरंतर बढ़ावा दिया जा रहा है।

5. निष्कर्ष:
गोस्वामी तुलसीदास किसी एक काल, संप्रदाय या भूगोल के कवि नहीं हैं; वे शाश्वत मानवता के अमर प्रवक्ता हैं। उनका साहित्य व्यक्ति को 'मर्यादित', समाज को 'समरस', परिवार को 'संस्कारित' और शासन को 'लोकमंगलकारी' बनाने का अक्षय स्रोत है। जब भारत 'विकसित भारत @2047' के निर्माण की ओर अग्रसर है, तब तुलसी साहित्य की नैतिक मर्यादा और समरसता ही देश को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाए रखेगी।

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