निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारत में बढ़ता जल-संकट एवं उसका समाधान"
भारत में बढ़ता जल-संकट एवं उसका समाधान: भू-जल संकट, कारण, शासकीय रणनीतियाँ एवं जल-सुरक्षा का रोडमैप
"रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥" — महाकवि रहीम
"जल ही जीवन है; जल की सुरक्षा ही देश की खाद्य सुरक्षा, औद्योगिक समृद्धि और मानव अस्तित्व की पहली शर्त है।"
1. प्रस्तावना एवं जल-संकट की भयावहता:
भारत आज एक भीषण जल-विषमता के दौर से गुजर रहा है। विश्व की लगभग 18% जनसंख्या और 15% पशुधन का पोषण करने वाले भारत के पास विश्व के कुल नवीकरणीय मीठे जल (Freshwater) का मात्र 4% हिस्सा ही उपलब्ध है। नीति आयोग की 'समग्र जल प्रबंधन सूचकांक' (CWMI) रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपने इतिहास के सबसे गंभीर जल-संकट का सामना कर रहा है, जहाँ 60 करोड़ से अधिक लोग गंभीर जल-तनाव (Water Stress) से जूझ रहे हैं तथा कई प्रमुख शहर 'डे-जीरो' (भूजल समाप्त होने) की कगार पर खड़े हैं।
2. भारत में बढ़ते जल-संकट के प्रमुख कारण:
- भू-जल का अनियंत्रित दोहन: भारत विश्व में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है (अमेरिका व चीन के कुल उपयोग से भी अधिक)। ट्यूबवेलों के अंधाधुंध खनन से भूजल स्तर रसातल में जा रहा है।
- दोषपूर्ण फसल चक्र एवं पारंपरिक सिंचाई: देश के कुल जल का 85% से अधिक भाग कृषि में उपयोग होता है, जहाँ पंजाब व महाराष्ट्र जैसे जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में अत्यधिक पानी सोखने वाले धान और गन्ने की खेती की जाती है।
- जलस्रोतों का गंभीर प्रदूषण: शहरों का 70% अनुपचारित सीवेज और कारखानों का जहरीला रासायनिक कचरा नदियों (गंगा, यमुना, नर्मदा) और तालाबों में बहाया जाना।
- पारंपरिक जलस्रोतों का अतिक्रमण: कंक्रीट के शहरीकरण के कारण प्राचीन बावड़ियों, झीलों, कुओं और वेटलैंड्स का नष्ट होना।
3. मध्य प्रदेश का परिदृश्य एवं राज्य-स्तरीय पहलें:
मध्य प्रदेश ने जल संरक्षण के क्षेत्र में कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं:
- केन-बेतवा लिंक परियोजना: देश की पहली राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना, जिसके माध्यम से बुंदेलखंड (छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना) के सूखाग्रस्त अंचल में 10 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि पर सिंचाई और पेयजल की स्थायी व्यवस्था।
- जलाभिषेक अभियान एवं अमृत सरोवर मिशन: प्रत्येक जिले में 75-75 विशाल अमृत सरोवरों का निर्माण व जीर्णोद्धार कर वर्षा जल संचयन।
- नमामि देवि नर्मदे अभियान: मध्य प्रदेश की जीवन-रेखा नर्मदा के कछार में सघन वृक्षारोपण और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (STPs) की स्थापना।
4. जल-संकट के स्थायी समाधान हेतु बहुआयामी कार्ययोजना (आगे की राह):
- वर्षा जल संचयन (Catch the Rain): नगरीय क्षेत्रों में 'रूफ-टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग' को भवन निर्माण का अनिवार्य नियम बनाना।
- सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली (प्रति बूंद अधिक फसल): पारंपरिक बाढ़ सिंचाई (Flood Irrigation) के स्थान पर 'ड्रिप' और 'स्प्रिंकलर' सिंचाई का 100% विस्तार (PMKSY योजना)।
- कम पानी वाली फसलों (श्री अन्न / मिलेट्स) को प्रोत्साहन: किसानों को मोटे अनाजों (ज्वार, बाजरा, रागी) और दलहन की खेती हेतु प्रोत्साहित करना।
- अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण (Recycling): सीवेज के उपचारित जल का उद्योगों, पार्कों और निर्माण कार्यों में पुनः उपयोग।
- सामुदायिक भू-जल प्रबंधन (अटल भूजल योजना): ग्राम पंचायत स्तर पर जल-बजट तैयार कर ग्रामीणों की सहभागिता से जल संरक्षण।
5. निष्कर्ष:
जल संरक्षण केवल शासन की योजना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का सामाजिक और नैतिक धर्म है। पारंपरिक जल संचयन ज्ञान (बावड़ियां, जोहड़, तालाब) और आधुनिक सूक्ष्म सिंचाई तकनीक के संगम से ही हम अपनी जल संपदा को सुरक्षित रख सकते हैं। जल की एक-एक बूंद को बचाकर ही हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध, हरित और खुशहाल 'विकसित भारत @2047' का निर्माण कर सकते हैं।
In English (Question & Model Answer)
निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारत में बढ़ता जल-संकट एवं उसका समाधान"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
भारत में बढ़ता जल-संकट एवं उसका समाधान: भू-जल संकट, कारण, शासकीय रणनीतियाँ एवं जल-सुरक्षा का रोडमैप
"रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥" — महाकवि रहीम
"जल ही जीवन है; जल की सुरक्षा ही देश की खाद्य सुरक्षा, औद्योगिक समृद्धि और मानव अस्तित्व की पहली शर्त है।"
1. प्रस्तावना एवं जल-संकट की भयावहता:
भारत आज एक भीषण जल-विषमता के दौर से गुजर रहा है। विश्व की लगभग 18% जनसंख्या और 15% पशुधन का पोषण करने वाले भारत के पास विश्व के कुल नवीकरणीय मीठे जल (Freshwater) का मात्र 4% हिस्सा ही उपलब्ध है। नीति आयोग की 'समग्र जल प्रबंधन सूचकांक' (CWMI) रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपने इतिहास के सबसे गंभीर जल-संकट का सामना कर रहा है, जहाँ 60 करोड़ से अधिक लोग गंभीर जल-तनाव (Water Stress) से जूझ रहे हैं तथा कई प्रमुख शहर 'डे-जीरो' (भूजल समाप्त होने) की कगार पर खड़े हैं।
2. भारत में बढ़ते जल-संकट के प्रमुख कारण:
- भू-जल का अनियंत्रित दोहन: भारत विश्व में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है (अमेरिका व चीन के कुल उपयोग से भी अधिक)। ट्यूबवेलों के अंधाधुंध खनन से भूजल स्तर रसातल में जा रहा है।
- दोषपूर्ण फसल चक्र एवं पारंपरिक सिंचाई: देश के कुल जल का 85% से अधिक भाग कृषि में उपयोग होता है, जहाँ पंजाब व महाराष्ट्र जैसे जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में अत्यधिक पानी सोखने वाले धान और गन्ने की खेती की जाती है।
- जलस्रोतों का गंभीर प्रदूषण: शहरों का 70% अनुपचारित सीवेज और कारखानों का जहरीला रासायनिक कचरा नदियों (गंगा, यमुना, नर्मदा) और तालाबों में बहाया जाना।
- पारंपरिक जलस्रोतों का अतिक्रमण: कंक्रीट के शहरीकरण के कारण प्राचीन बावड़ियों, झीलों, कुओं और वेटलैंड्स का नष्ट होना।
3. मध्य प्रदेश का परिदृश्य एवं राज्य-स्तरीय पहलें:
मध्य प्रदेश ने जल संरक्षण के क्षेत्र में कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं:
- केन-बेतवा लिंक परियोजना: देश की पहली राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना, जिसके माध्यम से बुंदेलखंड (छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना) के सूखाग्रस्त अंचल में 10 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि पर सिंचाई और पेयजल की स्थायी व्यवस्था।
- जलाभिषेक अभियान एवं अमृत सरोवर मिशन: प्रत्येक जिले में 75-75 विशाल अमृत सरोवरों का निर्माण व जीर्णोद्धार कर वर्षा जल संचयन।
- नमामि देवि नर्मदे अभियान: मध्य प्रदेश की जीवन-रेखा नर्मदा के कछार में सघन वृक्षारोपण और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (STPs) की स्थापना।
4. जल-संकट के स्थायी समाधान हेतु बहुआयामी कार्ययोजना (आगे की राह):
- वर्षा जल संचयन (Catch the Rain): नगरीय क्षेत्रों में 'रूफ-टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग' को भवन निर्माण का अनिवार्य नियम बनाना।
- सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली (प्रति बूंद अधिक फसल): पारंपरिक बाढ़ सिंचाई (Flood Irrigation) के स्थान पर 'ड्रिप' और 'स्प्रिंकलर' सिंचाई का 100% विस्तार (PMKSY योजना)।
- कम पानी वाली फसलों (श्री अन्न / मिलेट्स) को प्रोत्साहन: किसानों को मोटे अनाजों (ज्वार, बाजरा, रागी) और दलहन की खेती हेतु प्रोत्साहित करना।
- अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण (Recycling): सीवेज के उपचारित जल का उद्योगों, पार्कों और निर्माण कार्यों में पुनः उपयोग।
- सामुदायिक भू-जल प्रबंधन (अटल भूजल योजना): ग्राम पंचायत स्तर पर जल-बजट तैयार कर ग्रामीणों की सहभागिता से जल संरक्षण।
5. निष्कर्ष:
जल संरक्षण केवल शासन की योजना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का सामाजिक और नैतिक धर्म है। पारंपरिक जल संचयन ज्ञान (बावड़ियां, जोहड़, तालाब) और आधुनिक सूक्ष्म सिंचाई तकनीक के संगम से ही हम अपनी जल संपदा को सुरक्षित रख सकते हैं। जल की एक-एक बूंद को बचाकर ही हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध, हरित और खुशहाल 'विकसित भारत @2047' का निर्माण कर सकते हैं।