निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "भाषा और राष्ट्रीय एकता"
भाषा और राष्ट्रीय एकता
"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।" — भारतेन्दु हरिश्चंद्र
१. प्रस्तावना एवं वैचारिक पृष्ठभूमि
भाषा केवल संवाद, लिपि अथवा व्याकरणिक संरचना का माध्यम नहीं है; यह किसी राष्ट्र की सामूहिक चेतना, ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक अस्मिता और मनोवैज्ञानिक एकता की संवाहक होती है। भारत जैसे बहुलतावादी, बहु-सांस्कृतिक और बहु-जातीय देश में भाषा राष्ट्रीय एकीकरण का सर्वाधिक सशक्त आधारस्तंभ है। भारतीय उपमहाद्वीप में भाषाई विविधता कभी विभाजन का कारण नहीं रही, बल्कि इसने "विविधता में एकता" के उस सनातन दर्शन को पुष्ट किया है, जहाँ ऋग्वेद का उद्घोष है: "संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्" (हम साथ चलें, साथ बोलें और हमारे मन एक हों)।
राष्ट्रीय एकता का तात्पर्य केवल भौगोलिक अखंडता नहीं, अपितु भावनात्मक, सामाजिक और संस्थागत सुदृढ़ता है। स्वतंत्रता संग्राम में भी बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी और सुब्रह्मण्यम भारती जैसे मनीषियों ने जन-भाषाओं को स्वदेशी और स्वराज के आंदोलन का प्राण बनाया। अतः समकालीन भारत में भाषा, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने वाला एक सेतु है।
२. बहुआयामी विश्लेषण: भाषा और राष्ट्रीय एकता
(क) संवैधानिक एवं विधिक आयाम
- संवैधानिक संरक्षण: संविधान का भाग १७ (अनुच्छेद ३४३ से ३५१) भाषाई संतुलन स्थापित करता है। अनुच्छेद ३४३ के तहत देवनागरी लिपि में हिंदी संघ की राजभाषा है, जबकि अनुच्छेद ३५१ संघ को हिंदी भाषा के प्रसार और भारतीय सामासिक संस्कृति (Composite Culture) के विकास का निर्देश देता है।
- अष्टम अनुसूची का संतुलन: संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित २२ भाषाएं देश के भाषाई संघीय ढांचे (Linguistic Federalism) को वैधता प्रदान करती हैं।
- अल्पसंख्यक भाषाई अधिकार: अनुच्छेद २९, ३० तथा अनुच्छेद ३५०-क (प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण) भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा कर उनमें राष्ट्र के प्रति विश्वास को सुदृढ़ करते हैं।
(ख) सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम
- सांस्कृतिक सूत्र: मध्यकाल के भक्ति आंदोलन ने पूरे देश को भाषाई रूप से जोड़ा—तमिलनाडु के आलवार-नायनार, महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर व तुकाराम, असम के शंकरदेव, पंजाब के गुरु नानक और उत्तर भारत के कबीर, तुलसी व सूरदास ने अपनी देशज भाषाओं के माध्यम से एक साझी राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का निर्माण किया।
- सामासिक चेतना: भाषाएं पारस्परिक रूप से एक-दूसरे के शब्द-भंडार को समृद्ध कर 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' और अखिल भारतीय बंधुत्व को पुष्ट करती हैं।
(ग) प्रशासनिक एवं सुशासन आयाम
- समावेशी शासन: नागरिक और सरकार के बीच जब संवाद जनभाषा में होता है, तो लोकतंत्र अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनता है।
- न्यायपालिका में सुगम्यता: उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के निर्णयों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद न्याय को आम नागरिक के निकट लाता है, जिससे संस्थागत राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है।
(घ) आर्थिक एवं डिजिटल आयाम
- श्रम गतिशीलता व बाज़ार एकीकरण: Open Network for Digital Commerce (ONDC) और ई-कॉमर्स पोर्टल्स का बहुभाषी होना आंतरिक व्यापार तथा श्रमिकों के अंतर-राज्यीय प्रवास को सुगम बनाता है।
३. मध्य प्रदेश का विशिष्ट संदर्भ: भाषाई समरसता का हृदय-प्रदेश
मध्य प्रदेश, जिसे 'लघु भारत' कहा जाता है, भाषाई समन्वय और राष्ट्रीय एकता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है:
- क्षेत्रीय बोलियों का सह-अस्तित्व: राज्य में मालवी (उज्जैन, इंदौर), निमाड़ी (खरगोन, खंडवा), बुंदेली (सागर, टीकमगढ़, छतरपुर) एवं बघेली (रीवा, सतना) समृद्ध लोक-साहित्य के माध्यम से राज्य के सांस्कृतिक ताने-बाने को जोड़ती हैं।
- जनजातीय भाषाई विरासत: गोंडी (डिंडोरी, मंडला), भीली/भिलाली (झाबुआ, अलीराजपुर), कोरकू और सहरिया बोलियां प्रदेश की प्राचीन देशज संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- शिक्षा एवं नवाचार में देश का अग्रदूत: मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बना जिसने भोपाल स्थित गांधी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम का हिंदी माध्यम में शुभारंभ कर भाषा के भाषाई व वर्गीय अवरोध को समाप्त किया। इसके अतिरिक्त भोपाल स्थित अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय तथा आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी आंचलिक बोलियों के संरक्षण में अग्रणी हैं।
- जनकल्याणकारी योजनाओं में भाषाई पहुंच: मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना, संबल २.० और मुख्यमंत्री सीखो-कमाओ योजना के डिजिटल पोर्टलों और ग्राम-स्तरीय प्रचार में स्थानीय बोलियों का प्रयोग कर अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को राज्य व्यवस्था से जोड़ा गया है। एक जिला एक उत्पाद (ODOP) एवं पीएम विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत चंदेरी (अशोकनगर) व महेश्वरी (खरगोन) साड़ियों तथा बाग प्रिंट (धार) के पारंपरिक शिल्पकारों को उनकी मातृभाषा में प्रशिक्षण व बाज़ार लिंकेज दिया जा रहा है।
४. प्रमुख चुनौतियाँ एवं गतिरोध
- भाषाई संकीर्णता एवं क्षेत्रीयतावाद: भाषाई आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण तथा उत्तर-दक्षिण की कृत्रिम भाषाई खाई राष्ट्रीय संप्रभुता और सामाजिक समरसता के समक्ष चुनौती उत्पन्न करती है।
- आंग्ल-भाषा का प्रभुत्व (Digital & Linguistic Divide): उच्च शिक्षा, कॉरपोरेट क्षेत्र और न्यायपालिका में अंग्रेजी का वर्चस्व मातृभाषा आधारित जनसांख्यिकी को हीनभावना और अवसरों की असमानता की ओर धकेलता है।
- संकटापन्न देशज व जनजातीय बोलियां: यूनेस्को (UNESCO) के अनुसार भारत की १९०+ भाषाएं/बोलियां विलुप्त होने की कगार पर हैं; इनमें कई जनजातीय बोलियां शामिल हैं।
- गुणवत्तापूर्ण तकनीकी व वैज्ञानिक सामग्री का अभाव: भारतीय भाषाओं में उच्च-स्तरीय शोध पत्रों, तकनीकी शब्दावली और संदर्भ ग्रंथों की पर्याप्त उपलब्धता न होना।
- त्रि-भाषा सूत्र का असंतुलित क्रियान्वयन: कई राज्यों द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के त्रि-भाषा सूत्र (Three-Language Formula) को अक्षरशः लागू न करना।
५. शासकीय नीतियाँ एवं रणनीतिक पहल
| स्तर | प्रमुख योजना / नीति | मुख्य उद्देश्य एवं प्रभाव |
|---|---|---|
| केंद्रीय | राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) २०२० | प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा/स्थानीय भाषा में अनिवार्य करना; बहुभाषावाद को बढ़ावा देना। |
| केंद्रीय | डिजिटल भारत 'भाषिणी' मिशन | AI-आधारित अनुवाद प्लेटफॉर्म, जो २२ भारतीय भाषाओं में वास्तविक समय अनुवाद उपलब्ध कराता है। |
| केंद्रीय | एक भारत श्रेष्ठ भारत | राज्यों के बीच भाषाई व सांस्कृतिक आदान-प्रदान (उदा. मध्य प्रदेश का मणिपुर/नागालैंड के साथ युग्मन)। |
| राज्य (म.प्र.) | तकनीकी व चिकित्सा हिंदी प्रकल्प | उच्च शिक्षा में भाषाई समावेशिता सुनिश्चित करना। |
| राज्य (म.प्र.) | जनजातीय बोली शब्दकोश निर्माण | गोंडी, भीली, कोरकू बोलियों का डिजिटलीकरण एवं अभिलेखीकरण। |
६. रणनीतिक समाधान एवं भावी मार्ग (Way Forward)
- बहुभाषावाद को राष्ट्रीय शक्ति बनाना: 'एक भाषा बनाम दूसरी भाषा' के द्वंद्व को समाप्त कर "भाषा संपूरकता" की नीति अपनाई जाए, जहाँ हिंदी संपर्क भाषा, क्षेत्रीय भाषाएं सांस्कृतिक आधार और अंग्रेजी वैश्विक ज्ञान का माध्यम बनें।
- एआई (AI) और भाषा-प्रौद्योगिकी का विस्तार: भाषिणी और अनुवादिनी जैसे टूल्स का उपयोग कर संसद, न्यायालयों और तकनीकी शिक्षा की संपूर्ण सामग्री का सभी अनुसूचित भाषाओं में त्वरित अनुवाद हो।
- त्रि-भाषा सूत्र का सुदृढ़ीकरण: उत्तर भारतीय राज्यों में दक्षिण भारतीय भाषाओं (तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम) के अध्ययन को प्रोत्साहन मिले, जिससे पारस्परिक सौहार्द्र बढ़े।
- जनजातीय भाषा संरक्षण मिशन: मध्य प्रदेश मॉडल की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर देशज बोलियों के लिए डिजिटल लोक-ज्ञानकोश तैयार किए जाएं।
७. निष्कर्ष
भाषा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। यह दीवार नहीं, बल्कि हृदयों को जोड़ने वाला द्वार है। भारत की भाषाई विविधता हमारे राष्ट्र की दुर्बलता नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है। जब प्रत्येक नागरिक को अपनी मातृभाषा में शिक्षा, न्याय और शासन प्राप्त होगा, तभी वास्तविक अर्थों में सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता स्थापित होगी।
आगामी अमृत काल में 'विकसित भारत @२०४७' और 'आत्मनिर्भर भारत' के संकल्प की सिद्धि तभी संभव है, जब हम अपनी भाषाई जड़ों से जुड़कर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को आत्मसात करें।
"भाषा अनेक, भाव एक; पंथ अनेक, लक्ष्य एक; राज्य अनेक, राष्ट्र एक—यही है भारत की शाश्वत टेक।"
In English (Question & Model Answer)
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[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
भाषा और राष्ट्रीय एकता
"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।" — भारतेन्दु हरिश्चंद्र
१. प्रस्तावना एवं वैचारिक पृष्ठभूमि
भाषा केवल संवाद, लिपि अथवा व्याकरणिक संरचना का माध्यम नहीं है; यह किसी राष्ट्र की सामूहिक चेतना, ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक अस्मिता और मनोवैज्ञानिक एकता की संवाहक होती है। भारत जैसे बहुलतावादी, बहु-सांस्कृतिक और बहु-जातीय देश में भाषा राष्ट्रीय एकीकरण का सर्वाधिक सशक्त आधारस्तंभ है। भारतीय उपमहाद्वीप में भाषाई विविधता कभी विभाजन का कारण नहीं रही, बल्कि इसने "विविधता में एकता" के उस सनातन दर्शन को पुष्ट किया है, जहाँ ऋग्वेद का उद्घोष है: "संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्" (हम साथ चलें, साथ बोलें और हमारे मन एक हों)।
राष्ट्रीय एकता का तात्पर्य केवल भौगोलिक अखंडता नहीं, अपितु भावनात्मक, सामाजिक और संस्थागत सुदृढ़ता है। स्वतंत्रता संग्राम में भी बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी और सुब्रह्मण्यम भारती जैसे मनीषियों ने जन-भाषाओं को स्वदेशी और स्वराज के आंदोलन का प्राण बनाया। अतः समकालीन भारत में भाषा, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने वाला एक सेतु है।
२. बहुआयामी विश्लेषण: भाषा और राष्ट्रीय एकता
(क) संवैधानिक एवं विधिक आयाम
- संवैधानिक संरक्षण: संविधान का भाग १७ (अनुच्छेद ३४३ से ३५१) भाषाई संतुलन स्थापित करता है। अनुच्छेद ३४३ के तहत देवनागरी लिपि में हिंदी संघ की राजभाषा है, जबकि अनुच्छेद ३५१ संघ को हिंदी भाषा के प्रसार और भारतीय सामासिक संस्कृति (Composite Culture) के विकास का निर्देश देता है।
- अष्टम अनुसूची का संतुलन: संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित २२ भाषाएं देश के भाषाई संघीय ढांचे (Linguistic Federalism) को वैधता प्रदान करती हैं।
- अल्पसंख्यक भाषाई अधिकार: अनुच्छेद २९, ३० तथा अनुच्छेद ३५०-क (प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण) भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा कर उनमें राष्ट्र के प्रति विश्वास को सुदृढ़ करते हैं।
(ख) सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम
- सांस्कृतिक सूत्र: मध्यकाल के भक्ति आंदोलन ने पूरे देश को भाषाई रूप से जोड़ा—तमिलनाडु के आलवार-नायनार, महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर व तुकाराम, असम के शंकरदेव, पंजाब के गुरु नानक और उत्तर भारत के कबीर, तुलसी व सूरदास ने अपनी देशज भाषाओं के माध्यम से एक साझी राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का निर्माण किया।
- सामासिक चेतना: भाषाएं पारस्परिक रूप से एक-दूसरे के शब्द-भंडार को समृद्ध कर 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' और अखिल भारतीय बंधुत्व को पुष्ट करती हैं।
(ग) प्रशासनिक एवं सुशासन आयाम
- समावेशी शासन: नागरिक और सरकार के बीच जब संवाद जनभाषा में होता है, तो लोकतंत्र अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनता है।
- न्यायपालिका में सुगम्यता: उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के निर्णयों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद न्याय को आम नागरिक के निकट लाता है, जिससे संस्थागत राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है।
(घ) आर्थिक एवं डिजिटल आयाम
- श्रम गतिशीलता व बाज़ार एकीकरण: Open Network for Digital Commerce (ONDC) और ई-कॉमर्स पोर्टल्स का बहुभाषी होना आंतरिक व्यापार तथा श्रमिकों के अंतर-राज्यीय प्रवास को सुगम बनाता है।
३. मध्य प्रदेश का विशिष्ट संदर्भ: भाषाई समरसता का हृदय-प्रदेश
मध्य प्रदेश, जिसे 'लघु भारत' कहा जाता है, भाषाई समन्वय और राष्ट्रीय एकता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है:
- क्षेत्रीय बोलियों का सह-अस्तित्व: राज्य में मालवी (उज्जैन, इंदौर), निमाड़ी (खरगोन, खंडवा), बुंदेली (सागर, टीकमगढ़, छतरपुर) एवं बघेली (रीवा, सतना) समृद्ध लोक-साहित्य के माध्यम से राज्य के सांस्कृतिक ताने-बाने को जोड़ती हैं।
- जनजातीय भाषाई विरासत: गोंडी (डिंडोरी, मंडला), भीली/भिलाली (झाबुआ, अलीराजपुर), कोरकू और सहरिया बोलियां प्रदेश की प्राचीन देशज संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- शिक्षा एवं नवाचार में देश का अग्रदूत: मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बना जिसने भोपाल स्थित गांधी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम का हिंदी माध्यम में शुभारंभ कर भाषा के भाषाई व वर्गीय अवरोध को समाप्त किया। इसके अतिरिक्त भोपाल स्थित अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय तथा आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी आंचलिक बोलियों के संरक्षण में अग्रणी हैं।
- जनकल्याणकारी योजनाओं में भाषाई पहुंच: मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना, संबल २.० और मुख्यमंत्री सीखो-कमाओ योजना के डिजिटल पोर्टलों और ग्राम-स्तरीय प्रचार में स्थानीय बोलियों का प्रयोग कर अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को राज्य व्यवस्था से जोड़ा गया है। एक जिला एक उत्पाद (ODOP) एवं पीएम विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत चंदेरी (अशोकनगर) व महेश्वरी (खरगोन) साड़ियों तथा बाग प्रिंट (धार) के पारंपरिक शिल्पकारों को उनकी मातृभाषा में प्रशिक्षण व बाज़ार लिंकेज दिया जा रहा है।
४. प्रमुख चुनौतियाँ एवं गतिरोध
- भाषाई संकीर्णता एवं क्षेत्रीयतावाद: भाषाई आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण तथा उत्तर-दक्षिण की कृत्रिम भाषाई खाई राष्ट्रीय संप्रभुता और सामाजिक समरसता के समक्ष चुनौती उत्पन्न करती है।
- आंग्ल-भाषा का प्रभुत्व (Digital & Linguistic Divide): उच्च शिक्षा, कॉरपोरेट क्षेत्र और न्यायपालिका में अंग्रेजी का वर्चस्व मातृभाषा आधारित जनसांख्यिकी को हीनभावना और अवसरों की असमानता की ओर धकेलता है।
- संकटापन्न देशज व जनजातीय बोलियां: यूनेस्को (UNESCO) के अनुसार भारत की १९०+ भाषाएं/बोलियां विलुप्त होने की कगार पर हैं; इनमें कई जनजातीय बोलियां शामिल हैं।
- गुणवत्तापूर्ण तकनीकी व वैज्ञानिक सामग्री का अभाव: भारतीय भाषाओं में उच्च-स्तरीय शोध पत्रों, तकनीकी शब्दावली और संदर्भ ग्रंथों की पर्याप्त उपलब्धता न होना।
- त्रि-भाषा सूत्र का असंतुलित क्रियान्वयन: कई राज्यों द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के त्रि-भाषा सूत्र (Three-Language Formula) को अक्षरशः लागू न करना।
५. शासकीय नीतियाँ एवं रणनीतिक पहल
| स्तर | प्रमुख योजना / नीति | मुख्य उद्देश्य एवं प्रभाव |
|---|---|---|
| केंद्रीय | राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) २०२० | प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा/स्थानीय भाषा में अनिवार्य करना; बहुभाषावाद को बढ़ावा देना। |
| केंद्रीय | डिजिटल भारत 'भाषिणी' मिशन | AI-आधारित अनुवाद प्लेटफॉर्म, जो २२ भारतीय भाषाओं में वास्तविक समय अनुवाद उपलब्ध कराता है। |
| केंद्रीय | एक भारत श्रेष्ठ भारत | राज्यों के बीच भाषाई व सांस्कृतिक आदान-प्रदान (उदा. मध्य प्रदेश का मणिपुर/नागालैंड के साथ युग्मन)। |
| राज्य (म.प्र.) | तकनीकी व चिकित्सा हिंदी प्रकल्प | उच्च शिक्षा में भाषाई समावेशिता सुनिश्चित करना। |
| राज्य (म.प्र.) | जनजातीय बोली शब्दकोश निर्माण | गोंडी, भीली, कोरकू बोलियों का डिजिटलीकरण एवं अभिलेखीकरण। |
६. रणनीतिक समाधान एवं भावी मार्ग (Way Forward)
- बहुभाषावाद को राष्ट्रीय शक्ति बनाना: 'एक भाषा बनाम दूसरी भाषा' के द्वंद्व को समाप्त कर "भाषा संपूरकता" की नीति अपनाई जाए, जहाँ हिंदी संपर्क भाषा, क्षेत्रीय भाषाएं सांस्कृतिक आधार और अंग्रेजी वैश्विक ज्ञान का माध्यम बनें।
- एआई (AI) और भाषा-प्रौद्योगिकी का विस्तार: भाषिणी और अनुवादिनी जैसे टूल्स का उपयोग कर संसद, न्यायालयों और तकनीकी शिक्षा की संपूर्ण सामग्री का सभी अनुसूचित भाषाओं में त्वरित अनुवाद हो।
- त्रि-भाषा सूत्र का सुदृढ़ीकरण: उत्तर भारतीय राज्यों में दक्षिण भारतीय भाषाओं (तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम) के अध्ययन को प्रोत्साहन मिले, जिससे पारस्परिक सौहार्द्र बढ़े।
- जनजातीय भाषा संरक्षण मिशन: मध्य प्रदेश मॉडल की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर देशज बोलियों के लिए डिजिटल लोक-ज्ञानकोश तैयार किए जाएं।
७. निष्कर्ष
भाषा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। यह दीवार नहीं, बल्कि हृदयों को जोड़ने वाला द्वार है। भारत की भाषाई विविधता हमारे राष्ट्र की दुर्बलता नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है। जब प्रत्येक नागरिक को अपनी मातृभाषा में शिक्षा, न्याय और शासन प्राप्त होगा, तभी वास्तविक अर्थों में सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता स्थापित होगी।
आगामी अमृत काल में 'विकसित भारत @२०४७' और 'आत्मनिर्भर भारत' के संकल्प की सिद्धि तभी संभव है, जब हम अपनी भाषाई जड़ों से जुड़कर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को आत्मसात करें।
"भाषा अनेक, भाव एक; पंथ अनेक, लक्ष्य एक; राज्य अनेक, राष्ट्र एक—यही है भारत की शाश्वत टेक।"