निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारत में आपदा एवं प्रबंधन"
भारत में आपदा एवं प्रबंधन: प्रतिक्रियात्मक राहत से पूर्व-तैयारी व संधारणीयता की ओर
"आपदाओं को पूर्णतः रोकना असंभव है, किन्तु वैज्ञानिक पूर्व-तैयारी, तकनीकी दक्षता और संस्थागत तत्परता से जन-धन की क्षति को न्यूनतम किया जा सकता है।"
1. प्रस्तावना एवं वैचारिक रूपांतरण:
भारत अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना, जलवायु विविधता और सघन जनसंख्या के कारण विभिन्न प्राकृतिक एवं मानव-जनित आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। ऐतिहासिक रूप से भारत की आपदा नीति 'आपदा-उपरांत राहत एवं पुनर्वास' (Reactive Approach) तक सीमित थी। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के लागू होने के पश्चात इस दृष्टिकोण में आमूलचूल परिवर्तन आया और आपदा प्रबंधन का केंद्रबिंदु 'जोखिम न्यूनीकरण, पूर्व-चेतावनी, आपदा-रोधी अवसंरचना तथा सामुदायिक सहभागिता' (Proactive Resilience) बन गया।
2. संस्थागत एवं वैधानिक ढाँचा:
- त्रिस्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था: राष्ट्रीय स्तर पर NDMA (अध्यक्ष: प्रधानमंत्री), राज्य स्तर पर SDMA (अध्यक्ष: मुख्यमंत्री), तथा जिला स्तर पर DDMA (अध्यक्ष: जिला कलेक्टर/दंडाधिकारी)।
- विशेषज्ञ प्रतिक्रिया बल: त्वरित एवं तकनीकी बचाव कार्यों हेतु राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) तथा राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) का गठन।
- वैश्विक प्रतिबद्धता: सेंडाई फ्रेमवर्क फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन (2015–2030) का अनुपालन तथा भारत द्वारा वैश्विक 'आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन' (CDRI) की स्थापना।
3. मध्य प्रदेश का परिदृश्य एवं राज्य-स्तरीय पहलें:
मध्य प्रदेश विशिष्ट क्षेत्रीय आपदा जोखिमों का सामना करता है:
- दीर्घकालिक सूखा: बुंदेलखंड व बघेलखंड अंचलों में जल संकट, जिसके निवारण हेतु केन-बेतवा लिंक परियोजना तथा अमृत सरोवर अभियान का संचालन।
- नदी तटीय बाढ़: नर्मदा, चंबल, बेतवा एवं सोन बेसिन में मानसूनी अतिवृष्टि पर नियंत्रण हेतु रियल-टाइम डैम मॉनिटरिंग व GIS मैपिंग।
- औद्योगिक एवं रासायनिक जोखिम: 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के उपरांत औद्योगिक सुरक्षा ऑडिट, कारखानों के कड़े निरीक्षण और आपातकालीन मॉक ड्रिल की अनिवार्यता।
- राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (MP SDMA): 24x7 राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र (SEOC) की स्थापना तथा 'आपदा मित्र' योजना के तहत स्थानीय स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण।
4. तकनीकी नवाचार एवं पूर्व-चेतावनी प्रणालियाँ:
- आधुनिक संचार तंत्र: मौसम विभाग (IMD) के डॉप्लर रडार, केंद्रीय जल आयोग की बाढ़ चेतावनी तथा 'कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल' (CAP) द्वारा नागरिकों को मोबाइल पर त्वरित एसएमएस चेतावनी।
- आपदा-रोधी अवसंरचना: राष्ट्रीय भवन निर्माण संहिता (NBC) का कठोर अनुपालन तथा स्कूल, अस्पताल व पुलों का भूकंप-रोधी सुदृढ़ीकरण।
5. प्रमुख चुनौतियाँ एवं आगे की राह:
- चुनौतियाँ: प्राकृतिक जल निकासी अवरुद्ध होने से नगरीय जलभराव (Urban Flooding), जलवायु परिवर्तन जनित लू (Heatwave), तथा ग्राम पंचायत स्तर पर संसाधनों की कमी।
- आगे की राह: प्रधानमंत्री के 'आपदा जोखिम न्यूनीकरण के 10-सूत्रीय एजेंडा' का क्रियान्वयन, नगर नियोजन में आपदा संवेदनशीलता का समावेशन, तथा स्थानीय समुदायों को प्राथमिक उत्तरदाता के रूप में सशक्त बनाना।
6. निष्कर्ष:
आपदा प्रबंधन केवल राहत कार्य नहीं, बल्कि सतत विकास का अनिवार्य रक्षा कवच है। उपग्रह तकनीक, आपदा-रोधी अधोसंरचना और जन-जागरूकता के समन्वय से भारत एक सुरक्षित, सजग एवं आपदा-प्रतिरोधी राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है।
In English (Question & Model Answer)
निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारत में आपदा एवं प्रबंधन"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
भारत में आपदा एवं प्रबंधन: प्रतिक्रियात्मक राहत से पूर्व-तैयारी व संधारणीयता की ओर
"आपदाओं को पूर्णतः रोकना असंभव है, किन्तु वैज्ञानिक पूर्व-तैयारी, तकनीकी दक्षता और संस्थागत तत्परता से जन-धन की क्षति को न्यूनतम किया जा सकता है।"
1. प्रस्तावना एवं वैचारिक रूपांतरण:
भारत अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना, जलवायु विविधता और सघन जनसंख्या के कारण विभिन्न प्राकृतिक एवं मानव-जनित आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। ऐतिहासिक रूप से भारत की आपदा नीति 'आपदा-उपरांत राहत एवं पुनर्वास' (Reactive Approach) तक सीमित थी। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के लागू होने के पश्चात इस दृष्टिकोण में आमूलचूल परिवर्तन आया और आपदा प्रबंधन का केंद्रबिंदु 'जोखिम न्यूनीकरण, पूर्व-चेतावनी, आपदा-रोधी अवसंरचना तथा सामुदायिक सहभागिता' (Proactive Resilience) बन गया।
2. संस्थागत एवं वैधानिक ढाँचा:
- त्रिस्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था: राष्ट्रीय स्तर पर NDMA (अध्यक्ष: प्रधानमंत्री), राज्य स्तर पर SDMA (अध्यक्ष: मुख्यमंत्री), तथा जिला स्तर पर DDMA (अध्यक्ष: जिला कलेक्टर/दंडाधिकारी)।
- विशेषज्ञ प्रतिक्रिया बल: त्वरित एवं तकनीकी बचाव कार्यों हेतु राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) तथा राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) का गठन।
- वैश्विक प्रतिबद्धता: सेंडाई फ्रेमवर्क फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन (2015–2030) का अनुपालन तथा भारत द्वारा वैश्विक 'आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन' (CDRI) की स्थापना।
3. मध्य प्रदेश का परिदृश्य एवं राज्य-स्तरीय पहलें:
मध्य प्रदेश विशिष्ट क्षेत्रीय आपदा जोखिमों का सामना करता है:
- दीर्घकालिक सूखा: बुंदेलखंड व बघेलखंड अंचलों में जल संकट, जिसके निवारण हेतु केन-बेतवा लिंक परियोजना तथा अमृत सरोवर अभियान का संचालन।
- नदी तटीय बाढ़: नर्मदा, चंबल, बेतवा एवं सोन बेसिन में मानसूनी अतिवृष्टि पर नियंत्रण हेतु रियल-टाइम डैम मॉनिटरिंग व GIS मैपिंग।
- औद्योगिक एवं रासायनिक जोखिम: 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के उपरांत औद्योगिक सुरक्षा ऑडिट, कारखानों के कड़े निरीक्षण और आपातकालीन मॉक ड्रिल की अनिवार्यता।
- राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (MP SDMA): 24x7 राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र (SEOC) की स्थापना तथा 'आपदा मित्र' योजना के तहत स्थानीय स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण।
4. तकनीकी नवाचार एवं पूर्व-चेतावनी प्रणालियाँ:
- आधुनिक संचार तंत्र: मौसम विभाग (IMD) के डॉप्लर रडार, केंद्रीय जल आयोग की बाढ़ चेतावनी तथा 'कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल' (CAP) द्वारा नागरिकों को मोबाइल पर त्वरित एसएमएस चेतावनी।
- आपदा-रोधी अवसंरचना: राष्ट्रीय भवन निर्माण संहिता (NBC) का कठोर अनुपालन तथा स्कूल, अस्पताल व पुलों का भूकंप-रोधी सुदृढ़ीकरण।
5. प्रमुख चुनौतियाँ एवं आगे की राह:
- चुनौतियाँ: प्राकृतिक जल निकासी अवरुद्ध होने से नगरीय जलभराव (Urban Flooding), जलवायु परिवर्तन जनित लू (Heatwave), तथा ग्राम पंचायत स्तर पर संसाधनों की कमी।
- आगे की राह: प्रधानमंत्री के 'आपदा जोखिम न्यूनीकरण के 10-सूत्रीय एजेंडा' का क्रियान्वयन, नगर नियोजन में आपदा संवेदनशीलता का समावेशन, तथा स्थानीय समुदायों को प्राथमिक उत्तरदाता के रूप में सशक्त बनाना।
6. निष्कर्ष:
आपदा प्रबंधन केवल राहत कार्य नहीं, बल्कि सतत विकास का अनिवार्य रक्षा कवच है। उपग्रह तकनीक, आपदा-रोधी अधोसंरचना और जन-जागरूकता के समन्वय से भारत एक सुरक्षित, सजग एवं आपदा-प्रतिरोधी राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है।