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निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "गाँवों से शहरों की ओर पलायन"

202420M
आदर्श उत्तर

गाँवों से शहरों की ओर पलायन: कारण, प्रभाव एवं 'रुर्बन' विकास का समाधानकारी मॉडल

"भारत की वास्तविक समृद्धि तभी संभव है जब गाँव आजीविका से संपन्न हों और शहर अनियंत्रित पलायन के दबाव से मुक्त हों।"

1. प्रस्तावना एवं पलायन का स्वरूप:
गाँवों से शहरों की ओर होने वाला जनसंख्या का विस्थापन समकालीन भारत का एक प्रमुख सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य है। यह पलायन मुख्य रूप से दो शक्तियों द्वारा संचालित होता है: ग्रामीण क्षेत्रों के 'प्रतिकर्ष कारक' (Push Factors)—जैसे कृषि संकट, मौसमी बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव; तथा नगरीय क्षेत्रों के 'अपकर्ष कारक' (Pull Factors)—जैसे रोजगार के विविध अवसर, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और आधुनिक जीवनशैली।

2. पलायन के प्रमुख कारण:

  • कृषि का अलाभकारी स्वरूप: जोतों का निरंतर विखंडन, मानसूनी अनिश्चितता, लागत में वृद्धि तथा कृषि में प्रच्छन्न बेरोजगारी के कारण युवाओं का कृषि से मोहभंग।
  • ग्रामीण बुनियादी ढांचे में कमी: गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा, विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं, तथा तकनीकी कौशल प्रशिक्षण केंद्रों का अभाव।
  • शहरी आजीविका का आकर्षण: विनिर्माण, निर्माण क्षेत्र, परिवहन, तथा गिग/प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में दैनिक मजदूरी एवं नकद आय के निरंतर अवसर।
  • सामाजिक गतिशीलता: पारंपरिक ग्रामीण सामाजिक बंधनों व जातिगत असमानता से मुक्त होकर शहरों में स्वतंत्र जीवन जीने की आकांक्षा।

3. ग्रामीण एवं नगरीय जीवन पर द्विपक्षीय प्रभाव:

  • ग्रामीण क्षेत्रों पर प्रभाव: 'कृषि का महिलाकरण' (पुरुषों के पलायन के बाद महिलाओं पर खेती का भार), गाँवों में केवल वृद्धों व बच्चों का रह जाना, तथा ग्रामीण नवाचार व कार्यबल की कमी।
  • शहरी क्षेत्रों पर दबाव: मलिन बस्तियों (Slums) का तीव्र विस्तार, पेयजल संकट, जल-निकासी व सीवरेज की विफलता, वायु प्रदूषण, तथा अनौपचारिक श्रमिकों की दयनीय कार्यदशाएं।

4. मध्य प्रदेश का परिदृश्य एवं राज्य स्तरीय प्रयास:
मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड, बघेलखंड तथा झाबुआ-अलीराजपुर-बड़वानी जैसे जनजातीय जिलों से कृषि के गैर-मौसमी समय में गुजरात, महाराष्ट्र व दिल्ली की ओर मौसमी पलायन देखा जाता है:

  • राज्य शासन के प्रयास: मनरेगा के तहत जल संरक्षण (अमृत सरोवर), मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना, 'नल-जल योजना', तथा असंगठित श्रमिकों हेतु 'संबल 2.0 योजना' का सुरक्षा कवच।
  • स्थानीय आजीविका: 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) के तहत स्थानीय जनजातीय कला, लघु वनोपज व कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण।

5. स्थायी समाधान: 'रुर्बन' (Rurban) विकास की अवधारणा:

  • डॉ. कलाम का 'पुरा' (PURA) मॉडल: श्यामा प्रसाद मुखर्जी रुर्बन मिशन (SPMRM) के तहत गाँवों में भौतिक, इलेक्ट्रॉनिक, ज्ञान तथा आर्थिक कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना ताकि गाँव में ही शहर जैसी सुविधाएं मिलें।
  • द्वितीयक शहरों का विकास: केवल बड़े महानगरों के बजाय टीयर-2 और टीयर-3 शहरों (जैसे सागर, रीवा, उज्जैन, छिंदवाड़ा) को क्षेत्रीय विकास केंद्र बनाना।
  • ग्रामीण गैर-कृषि रोजगार: खाद्य प्रसंस्करण इकाइयाँ, दुग्ध उत्पाद संकुल, तथा भारतनेट से ग्रामीण युवाओं को डिजिटल रोजगार।
  • प्रवासी श्रमिकों का संरक्षण: 'वन नेशन वन राशन कार्ड' का शत-प्रतिशत क्रियान्वयन तथा किफायती किराये के आवास (ARHC)।

6. निष्कर्ष:
पलायन किसी विवशता का परिणाम नहीं, बल्कि विकास की स्वाभाविक आकांक्षा का प्रतीक होना चाहिए। गाँवों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी और तकनीकी रूप से सक्षम 'स्मार्ट विलेज' बनाकर ही संतुलित क्षेत्रीय विकास और गांधीजी के 'ग्राम स्वराज' के सपने को साकार किया जा सकता है।

In English (Question & Model Answer)

निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "गाँवों से शहरों की ओर पलायन"

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

गाँवों से शहरों की ओर पलायन: कारण, प्रभाव एवं 'रुर्बन' विकास का समाधानकारी मॉडल

"भारत की वास्तविक समृद्धि तभी संभव है जब गाँव आजीविका से संपन्न हों और शहर अनियंत्रित पलायन के दबाव से मुक्त हों।"

1. प्रस्तावना एवं पलायन का स्वरूप:
गाँवों से शहरों की ओर होने वाला जनसंख्या का विस्थापन समकालीन भारत का एक प्रमुख सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य है। यह पलायन मुख्य रूप से दो शक्तियों द्वारा संचालित होता है: ग्रामीण क्षेत्रों के 'प्रतिकर्ष कारक' (Push Factors)—जैसे कृषि संकट, मौसमी बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव; तथा नगरीय क्षेत्रों के 'अपकर्ष कारक' (Pull Factors)—जैसे रोजगार के विविध अवसर, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और आधुनिक जीवनशैली।

2. पलायन के प्रमुख कारण:

  • कृषि का अलाभकारी स्वरूप: जोतों का निरंतर विखंडन, मानसूनी अनिश्चितता, लागत में वृद्धि तथा कृषि में प्रच्छन्न बेरोजगारी के कारण युवाओं का कृषि से मोहभंग।
  • ग्रामीण बुनियादी ढांचे में कमी: गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा, विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं, तथा तकनीकी कौशल प्रशिक्षण केंद्रों का अभाव।
  • शहरी आजीविका का आकर्षण: विनिर्माण, निर्माण क्षेत्र, परिवहन, तथा गिग/प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में दैनिक मजदूरी एवं नकद आय के निरंतर अवसर।
  • सामाजिक गतिशीलता: पारंपरिक ग्रामीण सामाजिक बंधनों व जातिगत असमानता से मुक्त होकर शहरों में स्वतंत्र जीवन जीने की आकांक्षा।

3. ग्रामीण एवं नगरीय जीवन पर द्विपक्षीय प्रभाव:

  • ग्रामीण क्षेत्रों पर प्रभाव: 'कृषि का महिलाकरण' (पुरुषों के पलायन के बाद महिलाओं पर खेती का भार), गाँवों में केवल वृद्धों व बच्चों का रह जाना, तथा ग्रामीण नवाचार व कार्यबल की कमी।
  • शहरी क्षेत्रों पर दबाव: मलिन बस्तियों (Slums) का तीव्र विस्तार, पेयजल संकट, जल-निकासी व सीवरेज की विफलता, वायु प्रदूषण, तथा अनौपचारिक श्रमिकों की दयनीय कार्यदशाएं।

4. मध्य प्रदेश का परिदृश्य एवं राज्य स्तरीय प्रयास:
मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड, बघेलखंड तथा झाबुआ-अलीराजपुर-बड़वानी जैसे जनजातीय जिलों से कृषि के गैर-मौसमी समय में गुजरात, महाराष्ट्र व दिल्ली की ओर मौसमी पलायन देखा जाता है:

  • राज्य शासन के प्रयास: मनरेगा के तहत जल संरक्षण (अमृत सरोवर), मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना, 'नल-जल योजना', तथा असंगठित श्रमिकों हेतु 'संबल 2.0 योजना' का सुरक्षा कवच।
  • स्थानीय आजीविका: 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) के तहत स्थानीय जनजातीय कला, लघु वनोपज व कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण।

5. स्थायी समाधान: 'रुर्बन' (Rurban) विकास की अवधारणा:

  • डॉ. कलाम का 'पुरा' (PURA) मॉडल: श्यामा प्रसाद मुखर्जी रुर्बन मिशन (SPMRM) के तहत गाँवों में भौतिक, इलेक्ट्रॉनिक, ज्ञान तथा आर्थिक कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना ताकि गाँव में ही शहर जैसी सुविधाएं मिलें।
  • द्वितीयक शहरों का विकास: केवल बड़े महानगरों के बजाय टीयर-2 और टीयर-3 शहरों (जैसे सागर, रीवा, उज्जैन, छिंदवाड़ा) को क्षेत्रीय विकास केंद्र बनाना।
  • ग्रामीण गैर-कृषि रोजगार: खाद्य प्रसंस्करण इकाइयाँ, दुग्ध उत्पाद संकुल, तथा भारतनेट से ग्रामीण युवाओं को डिजिटल रोजगार।
  • प्रवासी श्रमिकों का संरक्षण: 'वन नेशन वन राशन कार्ड' का शत-प्रतिशत क्रियान्वयन तथा किफायती किराये के आवास (ARHC)।

6. निष्कर्ष:
पलायन किसी विवशता का परिणाम नहीं, बल्कि विकास की स्वाभाविक आकांक्षा का प्रतीक होना चाहिए। गाँवों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी और तकनीकी रूप से सक्षम 'स्मार्ट विलेज' बनाकर ही संतुलित क्षेत्रीय विकास और गांधीजी के 'ग्राम स्वराज' के सपने को साकार किया जा सकता है।

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