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जिज्ञासा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है और आनन्द प्राप्ति उसकी स्वाभाविक कामना। घोर से घोर भौतिकवादी मनुष्य में भी ये दोनों प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक और जन्म-जात हैं। उनका संतोषजनक शमन न होने पर मनुष्य में एक ओर तो अनास्था उत्पन्न होती है और दूसरी ओर भय, निराशा और अवसाद। यह मानव की विकृत अवस्था कही जा सकती है। सामान्य रूप से, आज का मानव, अधिक अतृप्त, अधिक उद्विग्न और अधिक दुखी है। इस विकृति से अनेक मानसिक और शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं। सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो आज के स्नायु व्यतिक्रम का मूल कारण यह विकृति ही प्रतीत होती है। इस विकृति का निदान और उपचार दोनों ही कठिन हैं। इस प्रकार मानव का मानवत्व उसके दानवत्व से आच्छादित हो गया है और विडम्बना तो यह है कि मानव अपने बाह्य परितोष के लिए नैतिक और मानवीय मूल्यों की परिभाषा को ही बदलने में जुटा हुआ है।

201520M
Model Answer

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.

हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद (Hindi to English Passage Translation):

मूल अवतरण:
"जिज्ञासा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है और आनन्द प्राप्ति उसकी स्वाभाविक चाह है। अज्ञात को जानने और नए सत्यों की खोज करने की यही जिज्ञासा ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की जननी है। जब मनुष्य प्रकृति के रहस्यों को समझता है, तब उसे परम आनंद की अनुभूति होती है। ज्ञान की यह खोज ही मानव सभ्यता को आगे बढ़ाती है।"

मानक अंग्रेजी अनुवाद:
"Curiosity is an inherent trait of human beings and the attainment of bliss is their natural desire. This very curiosity to know the unknown and discover new truths is the mother of knowledge, science and philosophy. When man comprehends the mysteries of nature, he experiences supreme joy. This pursuit of knowledge drives human civilization forward."

हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

जिज्ञासा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है और आनन्द प्राप्ति उसकी स्वाभाविक कामना। घोर से घोर भौतिकवादी मनुष्य में भी ये दोनों प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक और जन्म-जात हैं। उनका संतोषजनक शमन न होने पर मनुष्य में एक ओर तो अनास्था उत्पन्न होती है और दूसरी ओर भय, निराशा और अवसाद। यह मानव की विकृत अवस्था कही जा सकती है। सामान्य रूप से, आज का मानव, अधिक अतृप्त, अधिक उद्विग्न और अधिक दुखी है। इस विकृति से अनेक मानसिक और शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं। सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो आज के स्नायु व्यतिक्रम का मूल कारण यह विकृति ही प्रतीत होती है। इस विकृति का निदान और उपचार दोनों ही कठिन हैं। इस प्रकार मानव का मानवत्व उसके दानवत्व से आच्छादित हो गया है और विडम्बना तो यह है कि मानव अपने बाह्य परितोष के लिए नैतिक और मानवीय मूल्यों की परिभाषा को ही बदलने में जुटा हुआ है।

हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद (Hindi to English Passage Translation):

मूल अवतरण:
"जिज्ञासा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है और आनन्द प्राप्ति उसकी स्वाभाविक चाह है। अज्ञात को जानने और नए सत्यों की खोज करने की यही जिज्ञासा ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की जननी है। जब मनुष्य प्रकृति के रहस्यों को समझता है, तब उसे परम आनंद की अनुभूति होती है। ज्ञान की यह खोज ही मानव सभ्यता को आगे बढ़ाती है।"

मानक अंग्रेजी अनुवाद:
"Curiosity is an inherent trait of human beings and the attainment of bliss is their natural desire. This very curiosity to know the unknown and discover new truths is the mother of knowledge, science and philosophy. When man comprehends the mysteries of nature, he experiences supreme joy. This pursuit of knowledge drives human civilization forward."

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