निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारत में प्राकृतिक आपदायें : कारण और निवारण"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
भारत में प्राकृतिक आपदायें : कारण और निवारण: सुभेद्यता परिदृश्य, एनडीएमए ढाँचा, सेंडाई फ्रेमवर्क एवं आपदा प्रबंधन की आधुनिक रणनीतियाँ
"प्राकृतिक आपदाएं भूगर्भीय और मौसमी यथार्थ हैं; किन्तु वे मानव जीवन के लिए विनाशकारी 'आपदा' तभी बनती हैं जब हमारा नियोजन दोषपूर्ण, पर्यावरण उपेक्षित और पूर्व-तैयारी अधूरी होती है।"
"आपदा प्रबंधन का मूल मंत्र 'आपदा के बाद राहत' नहीं, बल्कि 'आपदा से पूर्व रोकथाम, वैज्ञानिक चेतावनी और आपदा-रोधी निर्माण' है।"
1. प्रस्तावना एवं भारत का आपदा सुभेद्यता परिदृश्य:
अपनी अनूठी भौगोलिक स्थिति, विशाल भू-भाग, विवर्तनिक (Tectonic) हलचलों और 7,516 किमी लंबी तटरेखा के कारण भारत प्राकृतिक आपदाओं के प्रति विश्व के सर्वाधिक संवेदनशील देशों में से एक है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के आंकड़ों के अनुसार:
- देश का लगभग 58.6% भूभाग मध्यम से तीव्र भूकंप (जोन IV व V) के प्रति संवेदनशील है।
- कुल क्षेत्रफल का लगभग 12% (4 करोड़ हेक्टेयर) भूभाग हर वर्ष विनाशकारी बाढ़ और नदी-कटाव का शिकार होता है।
- देश की संपूर्ण तटरेखा चक्रवातों और सुनामी के प्रति सुभेद्य है।
- कृषि योग्य भूमि का 68% भाग सूखे के संकट से जूझता है, वहीं हिमालयी और पश्चिमी घाट के क्षेत्र भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं से त्रस्त रहते हैं।
2. भारत में प्राकृतिक आपदाओं के प्रमुख कारण:
- 1. प्राकृतिक एवं भूगर्भीय कारण:
भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट से निरंतर टकराना, मानसूनी वर्षा का 3-4 महीनों में अत्यधिक संकेंद्रण, तथा बंगाल की खाड़ी व अरब सागर में तापमान वृद्धि से चक्रवातों की उत्पत्ति। - 2. मानव-जनित (Anthropogenic) कारण:
- वनों का अंधाधुंध विनाश: पहाड़ों पर पेड़ों की कटाई से मिट्टी का ढीला होना और भीषण भूस्खलन (जैसे वायनाड, केदारनाथ व जोशीमठ संकट)।
- अनियोजित शहरीकरण एवं जल-स्रोतों पर अतिक्रमण: प्राकृतिक नालों और तालाबों पर कंक्रीट के अवैध निर्माण से हर वर्ष चेन्नई, बेंगलुरु और दिल्ली जैसे शहरों में भयानक 'शहरी बाढ़' (Urban Floods)।
- पहाड़ों पर अनियंत्रित निर्माण व ब्लास्टिंग: सुरंगों, जल-विद्युत परियोजनाओं और चौड़ी सड़कों हेतु पहाड़ों को अवैज्ञानिक तरीके से काटना।
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change): ग्लोबल वार्मिंग के कारण सूखे और अतिवृष्टि की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि।
3. संस्थागत व कानूनी ढाँचा: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005:
- पैराडाइम शिफ्ट (दृष्टिकोण में बदलाव): आपदा के बाद केवल 'राहत वितरण' के स्थान पर 'आपदा पूर्व तैयारी, जोखिम न्यूनीकरण (Mitigation) और क्षमता विकास' को प्राथमिकता।
- त्रि-स्तरीय प्रशासनिक संरचना: NDMA (प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में), SDMA (मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में), तथा DDMA (जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में)।
- विशेषज्ञ बल: राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और एसडीआरएफ (SDRF) का गठन, जो अत्याधुनिक तकनीक से लैस होकर जीवन रक्षा करते हैं।
- सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030) एवं प्रधानमंत्री का 10-सूत्रीय एजेंडा: आपदा जोखिम न्यूनीकरण के वैश्विक लक्ष्यों का क्रियान्वयन।
4. आपदा निवारण एवं प्रबंधन हेतु ठोस रणनीतिक उपाय (आगे की राह):
- 1. अंतरिक्ष तकनीक एवं पूर्व-चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems):
डॉपलर रडार, इनकॉइस (INCOIS) सुनामी चेतावनी केंद्र तथा इसरो उपग्रहों द्वारा सटीक मौसम पूर्वानुमान, जिससे चक्रवातों (जैसे बिपरजॉय) में जनहानि को शून्य किया गया। 'कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल' (CAP) द्वारा नागरिकों के मोबाइल पर सीधे चेतावनी सायरन भेजना। - 2. आपदा-रोधी अधोसंरचना का निर्माण:
भूकंप-रोधी भवन निर्माण मानकों (BIS Codes) का कड़ाई से पालन तथा वैश्विक मंच 'आपदा रोधी अवसंरचना गठबंधन' (CDRI) का नेतृत्व। - 3. प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-Based Solutions):
तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वनों का संरक्षण (मिश्ती योजना - MISHTI), तथा अमृत सरोवरों द्वारा वर्षा जल संचयन। - 4. सामुदायिक सहभागिता एवं 'आपदा मित्र':
स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों को 'आपदा मित्र योजना' के तहत प्राथमिक राहत व बचाव का प्रशिक्षण देना। - 5. मध्य प्रदेश के प्रयास: नर्मदा, चंबल व बेतवा बेसिन में वैज्ञानिक जल-प्रबंधन तथा बुंदेलखंड में केन-बेतवा लिंक परियोजना द्वारा सूखे का स्थायी समाधान।
5. निष्कर्ष:
हम प्राकृतिक घटनाओं को रोक नहीं सकते, किन्तु आधुनिक विज्ञान, तकनीकी दक्षता, पर्यावरणीय संतुलन और मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति द्वारा उनके विनाशकारी प्रभावों को न्यूनतम अवश्य कर सकते हैं। प्रकृति के साथ सामंजस्य और आपदा-रोधी राष्ट्र का निर्माण ही सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर 'विकसित भारत @2047' का मूल आधार है।
हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारत में प्राकृतिक आपदायें : कारण और निवारण"
भारत में प्राकृतिक आपदायें : कारण और निवारण: सुभेद्यता परिदृश्य, एनडीएमए ढाँचा, सेंडाई फ्रेमवर्क एवं आपदा प्रबंधन की आधुनिक रणनीतियाँ
"प्राकृतिक आपदाएं भूगर्भीय और मौसमी यथार्थ हैं; किन्तु वे मानव जीवन के लिए विनाशकारी 'आपदा' तभी बनती हैं जब हमारा नियोजन दोषपूर्ण, पर्यावरण उपेक्षित और पूर्व-तैयारी अधूरी होती है।"
"आपदा प्रबंधन का मूल मंत्र 'आपदा के बाद राहत' नहीं, बल्कि 'आपदा से पूर्व रोकथाम, वैज्ञानिक चेतावनी और आपदा-रोधी निर्माण' है।"
1. प्रस्तावना एवं भारत का आपदा सुभेद्यता परिदृश्य:
अपनी अनूठी भौगोलिक स्थिति, विशाल भू-भाग, विवर्तनिक (Tectonic) हलचलों और 7,516 किमी लंबी तटरेखा के कारण भारत प्राकृतिक आपदाओं के प्रति विश्व के सर्वाधिक संवेदनशील देशों में से एक है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के आंकड़ों के अनुसार:
- देश का लगभग 58.6% भूभाग मध्यम से तीव्र भूकंप (जोन IV व V) के प्रति संवेदनशील है।
- कुल क्षेत्रफल का लगभग 12% (4 करोड़ हेक्टेयर) भूभाग हर वर्ष विनाशकारी बाढ़ और नदी-कटाव का शिकार होता है।
- देश की संपूर्ण तटरेखा चक्रवातों और सुनामी के प्रति सुभेद्य है।
- कृषि योग्य भूमि का 68% भाग सूखे के संकट से जूझता है, वहीं हिमालयी और पश्चिमी घाट के क्षेत्र भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं से त्रस्त रहते हैं।
2. भारत में प्राकृतिक आपदाओं के प्रमुख कारण:
- 1. प्राकृतिक एवं भूगर्भीय कारण:
भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट से निरंतर टकराना, मानसूनी वर्षा का 3-4 महीनों में अत्यधिक संकेंद्रण, तथा बंगाल की खाड़ी व अरब सागर में तापमान वृद्धि से चक्रवातों की उत्पत्ति। - 2. मानव-जनित (Anthropogenic) कारण:
- वनों का अंधाधुंध विनाश: पहाड़ों पर पेड़ों की कटाई से मिट्टी का ढीला होना और भीषण भूस्खलन (जैसे वायनाड, केदारनाथ व जोशीमठ संकट)।
- अनियोजित शहरीकरण एवं जल-स्रोतों पर अतिक्रमण: प्राकृतिक नालों और तालाबों पर कंक्रीट के अवैध निर्माण से हर वर्ष चेन्नई, बेंगलुरु और दिल्ली जैसे शहरों में भयानक 'शहरी बाढ़' (Urban Floods)।
- पहाड़ों पर अनियंत्रित निर्माण व ब्लास्टिंग: सुरंगों, जल-विद्युत परियोजनाओं और चौड़ी सड़कों हेतु पहाड़ों को अवैज्ञानिक तरीके से काटना।
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change): ग्लोबल वार्मिंग के कारण सूखे और अतिवृष्टि की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि।
3. संस्थागत व कानूनी ढाँचा: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005:
- पैराडाइम शिफ्ट (दृष्टिकोण में बदलाव): आपदा के बाद केवल 'राहत वितरण' के स्थान पर 'आपदा पूर्व तैयारी, जोखिम न्यूनीकरण (Mitigation) और क्षमता विकास' को प्राथमिकता।
- त्रि-स्तरीय प्रशासनिक संरचना: NDMA (प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में), SDMA (मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में), तथा DDMA (जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में)।
- विशेषज्ञ बल: राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और एसडीआरएफ (SDRF) का गठन, जो अत्याधुनिक तकनीक से लैस होकर जीवन रक्षा करते हैं।
- सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030) एवं प्रधानमंत्री का 10-सूत्रीय एजेंडा: आपदा जोखिम न्यूनीकरण के वैश्विक लक्ष्यों का क्रियान्वयन।
4. आपदा निवारण एवं प्रबंधन हेतु ठोस रणनीतिक उपाय (आगे की राह):
- 1. अंतरिक्ष तकनीक एवं पूर्व-चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems):
डॉपलर रडार, इनकॉइस (INCOIS) सुनामी चेतावनी केंद्र तथा इसरो उपग्रहों द्वारा सटीक मौसम पूर्वानुमान, जिससे चक्रवातों (जैसे बिपरजॉय) में जनहानि को शून्य किया गया। 'कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल' (CAP) द्वारा नागरिकों के मोबाइल पर सीधे चेतावनी सायरन भेजना। - 2. आपदा-रोधी अधोसंरचना का निर्माण:
भूकंप-रोधी भवन निर्माण मानकों (BIS Codes) का कड़ाई से पालन तथा वैश्विक मंच 'आपदा रोधी अवसंरचना गठबंधन' (CDRI) का नेतृत्व। - 3. प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-Based Solutions):
तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वनों का संरक्षण (मिश्ती योजना - MISHTI), तथा अमृत सरोवरों द्वारा वर्षा जल संचयन। - 4. सामुदायिक सहभागिता एवं 'आपदा मित्र':
स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों को 'आपदा मित्र योजना' के तहत प्राथमिक राहत व बचाव का प्रशिक्षण देना। - 5. मध्य प्रदेश के प्रयास: नर्मदा, चंबल व बेतवा बेसिन में वैज्ञानिक जल-प्रबंधन तथा बुंदेलखंड में केन-बेतवा लिंक परियोजना द्वारा सूखे का स्थायी समाधान।
5. निष्कर्ष:
हम प्राकृतिक घटनाओं को रोक नहीं सकते, किन्तु आधुनिक विज्ञान, तकनीकी दक्षता, पर्यावरणीय संतुलन और मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति द्वारा उनके विनाशकारी प्रभावों को न्यूनतम अवश्य कर सकते हैं। प्रकृति के साथ सामंजस्य और आपदा-रोधी राष्ट्र का निर्माण ही सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर 'विकसित भारत @2047' का मूल आधार है।