निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "परहित सरिस धर्म नहिं भाई"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई": परोपकार का शाश्वत दर्शन, प्रकृति का मौन उपदेश, लोक सेवा की अंतरात्मा एवं विश्व-कल्याण
"परहित सरिस धरम नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
निरनय सकल पुरान बेद कर।
कहेउं तात जानहिं कोबिद नर॥" — गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस, उत्तरकांड)
(हे भाई! दूसरों की भलाई (परोपकार) करने के समान कोई दूसरा बड़ा धर्म नहीं है, और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई दूसरा निकृष्ट पाप नहीं है। यह समस्त वेदों और पुराणों का अंतिम और सर्वमान्य निर्णय है।)
"वे ही वास्तव में जीवित हैं जो दूसरों के कल्याण हेतु जीते हैं, केवल अपने स्वार्थ में जीने वाले तो जीवित होते हुए भी मृतक समान हैं।" — स्वामी विवेकानंद
1. प्रस्तावना एवं सूक्ति का सार्वभौमिक नैतिक मर्म:
गोस्वामी तुलसीदास जी की यह अमर चौपाई भारतीय चिंतन, अध्यात्म और नीतिशास्त्र का शाश्वत निचोड़ है। महर्षि वेदव्यास ने भी अठारह पुराणों का सार केवल दो वाक्यों में समेटते हुए यही उद्घोष किया था—"अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥" (परोपकार ही सबसे बड़ा पुण्य है और दूसरों को पीड़ा पहुँचाना सबसे बड़ा पाप है)। 'परहित' (दूसरों का हित/कल्याण) केवल कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव जीवन की सार्थकता और उसकी आत्मा के दिव्य रूपांतरण की सर्वोच्च अवस्था है।
2. प्रकृति का जीता-जागता मौन परोपकार:
प्रकृति का कण-कण हमें निःस्वार्थ परोपकार का जीवन-संदेश देता है:
"पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः॥"
- नदियाँ कभी अपना मीठा जल स्वयं नहीं पीतीं; फलदार वृक्ष कभी अपने फल स्वयं नहीं खाते; और जल से भरे बादल कभी अपने द्वारा सिंचित अन्न को स्वयं नहीं चरते।
- सूर्य समस्त संसार को बिना किसी शुल्क के प्रकाश देता है और वृक्ष स्वयं धूप सहकर दूसरों को शीतल छाया देते हैं। जब संपूर्ण प्रकृति परहित में लीन है, तो मानव द्वारा स्वार्थ में लिप्त रहना उसकी पशुता का प्रमाण है।
3. भारतीय संस्कृति में परोपकार के अमर आदर्श:
- महर्षि दधीचि का अस्थि-दान: देवराज इंद्र और मानवता की रक्षा हेतु जीवित रहते हुए अपनी अस्थियाँ दान कर देना ताकि 'वज्र' का निर्माण हो सके और वृत्रासुर का संहार हो।
- महाराजा शिबि का आत्म-बलिदान: शरणागत कपोत (कबूतर) की रक्षा हेतु बाज को अपने शरीर का मांस काटकर तराजू पर तौल देना।
- भगवान बुद्ध एवं महावीर की महाकरुणा: राजमहलों के वैभव को त्यागकर संपूर्ण सृष्टि के दुःखों के निवारण हेतु साधना करना।
- स्वामी विवेकानंद का 'दरिद्र नारायण' दर्शन: भूखे, अशिक्षित और दीन-दुखियों की निःस्वार्थ सेवा को ही ईश्वर की सच्ची पूजा घोषित करना।
4. लोक प्रशासन एवं शासन में 'परहित' का महत्व:
- सच्चे लोक सेवक की पहचान: एक प्रशासनिक अधिकारी (Civil Servant) के लिए 'परहित' ही उसकी कार्यशैली की अंतरात्मा है। जब एक अधिकारी रिश्वत और अहंकार से मुक्त होकर समाज के अंतिम व्यक्ति (*अंत्योदय*) तक न्याय और जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाता है, तो वही सच्चा धर्म है।
- कल्याणकारी राज्य का मूर्त रूप: आयुष्मान भारत (निःशुल्क स्वास्थ्य रक्षा), पीएम आवास योजना, तथा मध्य प्रदेश की 'लाड़ली बहना' व 'संबल योजना' सरकार द्वारा संस्थागत 'परहित' के सजीव उदाहरण हैं।
5. 21वीं सदी के उपभोक्तावादी संकट का एकमात्र समाधान:
- आज जब समाज संवेदनहीनता, अति-व्यक्तिवाद, डिप्रेशन और लालच के दलदल में धंस रहा है, तब 'परहित' की भावना ही मनुष्य को पुनः मानवीय और करुणामय बना सकती है।
- पर्यावरणीय परहित (Mission LiFE): आने वाली पीढ़ियों के लिए जल, जंगल और जमीन की रक्षा करना ही आधुनिक युग का सबसे बड़ा परोपकार है।
6. निष्कर्ष:
केवल अपने लिए जीना तो पशु-प्रवृत्ति है, किन्तु दूसरों के आंसुओं को पोंछना और उनके चेहरे पर मुस्कान लाना ही सच्ची मनुष्यता और देवत्व है। जब 'परहित' हमारे व्यक्तिगत जीवन का संस्कार और राष्ट्रीय नीतियों का मूल आधार बनेगा, तभी समाज से घृणा, शोषण और विषमता का अंत होगा और भारत 'विश्व बंधु' बनकर एक खुशहाल, न्यायपूर्ण और समरस 'विकसित भारत @2047' का निर्माण करेगा।
हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "परहित सरिस धर्म नहिं भाई"
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई": परोपकार का शाश्वत दर्शन, प्रकृति का मौन उपदेश, लोक सेवा की अंतरात्मा एवं विश्व-कल्याण
"परहित सरिस धरम नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
निरनय सकल पुरान बेद कर।
कहेउं तात जानहिं कोबिद नर॥" — गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस, उत्तरकांड)
(हे भाई! दूसरों की भलाई (परोपकार) करने के समान कोई दूसरा बड़ा धर्म नहीं है, और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई दूसरा निकृष्ट पाप नहीं है। यह समस्त वेदों और पुराणों का अंतिम और सर्वमान्य निर्णय है।)
"वे ही वास्तव में जीवित हैं जो दूसरों के कल्याण हेतु जीते हैं, केवल अपने स्वार्थ में जीने वाले तो जीवित होते हुए भी मृतक समान हैं।" — स्वामी विवेकानंद
1. प्रस्तावना एवं सूक्ति का सार्वभौमिक नैतिक मर्म:
गोस्वामी तुलसीदास जी की यह अमर चौपाई भारतीय चिंतन, अध्यात्म और नीतिशास्त्र का शाश्वत निचोड़ है। महर्षि वेदव्यास ने भी अठारह पुराणों का सार केवल दो वाक्यों में समेटते हुए यही उद्घोष किया था—"अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥" (परोपकार ही सबसे बड़ा पुण्य है और दूसरों को पीड़ा पहुँचाना सबसे बड़ा पाप है)। 'परहित' (दूसरों का हित/कल्याण) केवल कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव जीवन की सार्थकता और उसकी आत्मा के दिव्य रूपांतरण की सर्वोच्च अवस्था है।
2. प्रकृति का जीता-जागता मौन परोपकार:
प्रकृति का कण-कण हमें निःस्वार्थ परोपकार का जीवन-संदेश देता है:
"पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः॥"
- नदियाँ कभी अपना मीठा जल स्वयं नहीं पीतीं; फलदार वृक्ष कभी अपने फल स्वयं नहीं खाते; और जल से भरे बादल कभी अपने द्वारा सिंचित अन्न को स्वयं नहीं चरते।
- सूर्य समस्त संसार को बिना किसी शुल्क के प्रकाश देता है और वृक्ष स्वयं धूप सहकर दूसरों को शीतल छाया देते हैं। जब संपूर्ण प्रकृति परहित में लीन है, तो मानव द्वारा स्वार्थ में लिप्त रहना उसकी पशुता का प्रमाण है।
3. भारतीय संस्कृति में परोपकार के अमर आदर्श:
- महर्षि दधीचि का अस्थि-दान: देवराज इंद्र और मानवता की रक्षा हेतु जीवित रहते हुए अपनी अस्थियाँ दान कर देना ताकि 'वज्र' का निर्माण हो सके और वृत्रासुर का संहार हो।
- महाराजा शिबि का आत्म-बलिदान: शरणागत कपोत (कबूतर) की रक्षा हेतु बाज को अपने शरीर का मांस काटकर तराजू पर तौल देना।
- भगवान बुद्ध एवं महावीर की महाकरुणा: राजमहलों के वैभव को त्यागकर संपूर्ण सृष्टि के दुःखों के निवारण हेतु साधना करना।
- स्वामी विवेकानंद का 'दरिद्र नारायण' दर्शन: भूखे, अशिक्षित और दीन-दुखियों की निःस्वार्थ सेवा को ही ईश्वर की सच्ची पूजा घोषित करना।
4. लोक प्रशासन एवं शासन में 'परहित' का महत्व:
- सच्चे लोक सेवक की पहचान: एक प्रशासनिक अधिकारी (Civil Servant) के लिए 'परहित' ही उसकी कार्यशैली की अंतरात्मा है। जब एक अधिकारी रिश्वत और अहंकार से मुक्त होकर समाज के अंतिम व्यक्ति (*अंत्योदय*) तक न्याय और जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाता है, तो वही सच्चा धर्म है।
- कल्याणकारी राज्य का मूर्त रूप: आयुष्मान भारत (निःशुल्क स्वास्थ्य रक्षा), पीएम आवास योजना, तथा मध्य प्रदेश की 'लाड़ली बहना' व 'संबल योजना' सरकार द्वारा संस्थागत 'परहित' के सजीव उदाहरण हैं।
5. 21वीं सदी के उपभोक्तावादी संकट का एकमात्र समाधान:
- आज जब समाज संवेदनहीनता, अति-व्यक्तिवाद, डिप्रेशन और लालच के दलदल में धंस रहा है, तब 'परहित' की भावना ही मनुष्य को पुनः मानवीय और करुणामय बना सकती है।
- पर्यावरणीय परहित (Mission LiFE): आने वाली पीढ़ियों के लिए जल, जंगल और जमीन की रक्षा करना ही आधुनिक युग का सबसे बड़ा परोपकार है।
6. निष्कर्ष:
केवल अपने लिए जीना तो पशु-प्रवृत्ति है, किन्तु दूसरों के आंसुओं को पोंछना और उनके चेहरे पर मुस्कान लाना ही सच्ची मनुष्यता और देवत्व है। जब 'परहित' हमारे व्यक्तिगत जीवन का संस्कार और राष्ट्रीय नीतियों का मूल आधार बनेगा, तभी समाज से घृणा, शोषण और विषमता का अंत होगा और भारत 'विश्व बंधु' बनकर एक खुशहाल, न्यायपूर्ण और समरस 'विकसित भारत @2047' का निर्माण करेगा।