निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "आर्थिक उदारवाद और सामाजिक विषमता"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
आर्थिक उदारवाद और सामाजिक विषमता: 1991 के एलपीजी सुधार, धन का संकेंद्रण, समावेशी कल्याणकारी राज्य एवं समतामूलक विकास
"26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों के एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी, किन्तु सामाजिक और आर्थिक जीवन में घोर विषमता होगी... हमें इस अंतर्विरोध को यथाशीघ्र समाप्त करना होगा, अन्यथा विषमता से पीड़ित जनता लोकतंत्र के इस पूरे ढांचे को ध्वस्त कर देगी।" — डॉ. भीमराव आंबेडकर
"सच्ची आर्थिक प्रगति केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि में नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन स्तर और खुशहाली में परिलक्षित होती है।"
1. प्रस्तावना एवं 1991 का ऐतिहासिक आर्थिक मोड़:
जुलाई 1991 में भारत द्वारा अपनाए गए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के आर्थिक सुधारों ने देश को 'लाइसेंस-परमिट-कोटा राज' की सुस्त विकास दर से बाहर निकालकर विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में ला खड़ा किया। उदारीकरण ने निजी उद्यमों को मुक्त किया, विदेशी निवेश (FDI) के द्वार खोले और देश में आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी व सेवा क्षेत्र की क्रांति ला दी। किन्तु इस आर्थिक संवृद्धि का एक दूसरा स्याह पहलू भी है—सकल राष्ट्रीय आय में भारी वृद्धि के साथ-साथ अमीर और गरीब के मध्य 'सामाजिक एवं आर्थिक विषमता' (Social & Economic Inequality) की खाई अप्रत्याशित रूप से चौड़ी हुई है।
2. आर्थिक उदारीकरण की उपलब्धियाँ (संवृद्धि का इंजन):
- आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभार: भारत का 3.75 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था बनना तथा विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत होना।
- बहुआयामी गरीबी में ऐतिहासिक कमी: नीति आयोग के अनुसार विगत एक दशक में 24.8 करोड़ से अधिक देशवासियों का बहुआयामी गरीबी से बाहर निकलना।
- डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): यूपीआई (UPI), मोबाइल बैंकिंग और ई-कॉमर्स द्वारा व्यापार और नागरिक सेवाओं का लोकतंत्रीकरण।
3. सामाजिक विषमता के विभिन्न आयाम एवं विद्रूपताएँ:
- 1. धन और आय का खतरनाक संकेंद्रण:
विश्व असमानता रिपोर्ट (World Inequality Report / थॉमस पिकेटी) के अनुसार, भारत की शीर्ष 1% आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का 40% से अधिक हिस्सा केंद्रित है, जबकि नीचे की 50% आबादी के पास मात्र 3% संपत्ति है। - 2. 'इंडिया' बनाम 'भारत' की खाई (कृषि बनाम सेवा क्षेत्र):
देश की लगभग 45% कार्यशील आबादी कृषि पर निर्भर है, किन्तु जीडीपी में कृषि का योगदान मात्र ~18% है। इससे महानगरों की चकाचौंध के सामने ग्रामीण अंचलों में कर्ज-संकट और पलायन बढ़ा है। - 3. शिक्षा एवं स्वास्थ्य का अनियंत्रित बाजारीकरण:
महंगे निजी अस्पतालों और पब्लिक स्कूलों के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व इलाज केवल संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार बन गया है, जिससे सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) बाधित हुई है। - 4. असंगठित क्षेत्र की असुरक्षा:
देश के 85% से अधिक श्रमिक असंगठित क्षेत्र में कार्य करते हैं, जो सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन और पेंशन से वंचित हैं।
4. संवैधानिक दायित्व एवं कल्याणकारी राज्य की भूमिका:
- नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 38 एवं 39(ख)(ग)): राज्य का यह पावन कर्तव्य निर्धारित करते हैं कि आर्थिक व्यवस्था का संचालन इस प्रकार हो जिससे धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के अहित के लिए संकेंद्रण न हो।
- सक्रिय सरकारी कल्याणकारी योजनाएँ:
- जैम (JAM) त्रिमूर्ति एवं प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): बिचौलियों को समाप्त कर शत-प्रतिशत सहायता सीधे गरीबों के खातों में भेजना।
- पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना: 80 करोड़ नागरिकों को निःशुल्क खाद्यान्न सुरक्षा।
- आयुष्मान भारत (PM-JAY): प्रत्येक निर्धन परिवार को ₹5 लाख तक का निःशुल्क स्वास्थ्य बीमा।
- मध्य प्रदेश के अभिनव प्रयास: 'मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना', 'संबल योजना' तथा 'सीएम राइज स्कूल'।
5. समावेशी विकास हेतु रणनीतिक रोडमैप (आगे की राह):
- श्रम-प्रधान उद्योगों का विस्तार: एमएसएमई (MSME), कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण और चमड़ा उद्योग को प्रोत्साहन देकर ग्रामीण युवाओं को सम्मानजनक रोजगार देना।
- सार्वजनिक शिक्षा व स्वास्थ्य पर व्यय में वृद्धि: जीडीपी का कम से कम 6% शिक्षा पर और 2.5% स्वास्थ्य पर खर्च करना।
- कौशल विकास एवं प्रगतिशील कराधान: सुपर-रिच पर उचित कर लगाकर उस राजस्व से ग्रामीण बुनियादी ढांचे का विकास करना।
6. निष्कर्ष:
सामाजिक न्याय के बिना आर्थिक उदारीकरण केवल मुट्ठी भर अमीरों का अभयारण्य बनकर रह जाता है। हमें विकास के ऐसे मॉडल की आवश्यकता है जिसमें पूंजी का सृजन भी हो और उसका न्यायसंगत वितरण भी हो। जब आर्थिक उदारीकरण की गति को सामाजिक न्याय और अंत्योदय का नैतिक संबल मिलेगा, तभी एक समतामूलक, समरस और शक्तिशाली 'विकसित भारत @2047' का निर्माण संभव होगा।
हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "आर्थिक उदारवाद और सामाजिक विषमता"
आर्थिक उदारवाद और सामाजिक विषमता: 1991 के एलपीजी सुधार, धन का संकेंद्रण, समावेशी कल्याणकारी राज्य एवं समतामूलक विकास
"26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों के एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी, किन्तु सामाजिक और आर्थिक जीवन में घोर विषमता होगी... हमें इस अंतर्विरोध को यथाशीघ्र समाप्त करना होगा, अन्यथा विषमता से पीड़ित जनता लोकतंत्र के इस पूरे ढांचे को ध्वस्त कर देगी।" — डॉ. भीमराव आंबेडकर
"सच्ची आर्थिक प्रगति केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि में नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन स्तर और खुशहाली में परिलक्षित होती है।"
1. प्रस्तावना एवं 1991 का ऐतिहासिक आर्थिक मोड़:
जुलाई 1991 में भारत द्वारा अपनाए गए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के आर्थिक सुधारों ने देश को 'लाइसेंस-परमिट-कोटा राज' की सुस्त विकास दर से बाहर निकालकर विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में ला खड़ा किया। उदारीकरण ने निजी उद्यमों को मुक्त किया, विदेशी निवेश (FDI) के द्वार खोले और देश में आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी व सेवा क्षेत्र की क्रांति ला दी। किन्तु इस आर्थिक संवृद्धि का एक दूसरा स्याह पहलू भी है—सकल राष्ट्रीय आय में भारी वृद्धि के साथ-साथ अमीर और गरीब के मध्य 'सामाजिक एवं आर्थिक विषमता' (Social & Economic Inequality) की खाई अप्रत्याशित रूप से चौड़ी हुई है।
2. आर्थिक उदारीकरण की उपलब्धियाँ (संवृद्धि का इंजन):
- आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभार: भारत का 3.75 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था बनना तथा विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत होना।
- बहुआयामी गरीबी में ऐतिहासिक कमी: नीति आयोग के अनुसार विगत एक दशक में 24.8 करोड़ से अधिक देशवासियों का बहुआयामी गरीबी से बाहर निकलना।
- डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): यूपीआई (UPI), मोबाइल बैंकिंग और ई-कॉमर्स द्वारा व्यापार और नागरिक सेवाओं का लोकतंत्रीकरण।
3. सामाजिक विषमता के विभिन्न आयाम एवं विद्रूपताएँ:
- 1. धन और आय का खतरनाक संकेंद्रण:
विश्व असमानता रिपोर्ट (World Inequality Report / थॉमस पिकेटी) के अनुसार, भारत की शीर्ष 1% आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का 40% से अधिक हिस्सा केंद्रित है, जबकि नीचे की 50% आबादी के पास मात्र 3% संपत्ति है। - 2. 'इंडिया' बनाम 'भारत' की खाई (कृषि बनाम सेवा क्षेत्र):
देश की लगभग 45% कार्यशील आबादी कृषि पर निर्भर है, किन्तु जीडीपी में कृषि का योगदान मात्र ~18% है। इससे महानगरों की चकाचौंध के सामने ग्रामीण अंचलों में कर्ज-संकट और पलायन बढ़ा है। - 3. शिक्षा एवं स्वास्थ्य का अनियंत्रित बाजारीकरण:
महंगे निजी अस्पतालों और पब्लिक स्कूलों के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व इलाज केवल संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार बन गया है, जिससे सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) बाधित हुई है। - 4. असंगठित क्षेत्र की असुरक्षा:
देश के 85% से अधिक श्रमिक असंगठित क्षेत्र में कार्य करते हैं, जो सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन और पेंशन से वंचित हैं।
4. संवैधानिक दायित्व एवं कल्याणकारी राज्य की भूमिका:
- नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 38 एवं 39(ख)(ग)): राज्य का यह पावन कर्तव्य निर्धारित करते हैं कि आर्थिक व्यवस्था का संचालन इस प्रकार हो जिससे धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के अहित के लिए संकेंद्रण न हो।
- सक्रिय सरकारी कल्याणकारी योजनाएँ:
- जैम (JAM) त्रिमूर्ति एवं प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): बिचौलियों को समाप्त कर शत-प्रतिशत सहायता सीधे गरीबों के खातों में भेजना।
- पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना: 80 करोड़ नागरिकों को निःशुल्क खाद्यान्न सुरक्षा।
- आयुष्मान भारत (PM-JAY): प्रत्येक निर्धन परिवार को ₹5 लाख तक का निःशुल्क स्वास्थ्य बीमा।
- मध्य प्रदेश के अभिनव प्रयास: 'मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना', 'संबल योजना' तथा 'सीएम राइज स्कूल'।
5. समावेशी विकास हेतु रणनीतिक रोडमैप (आगे की राह):
- श्रम-प्रधान उद्योगों का विस्तार: एमएसएमई (MSME), कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण और चमड़ा उद्योग को प्रोत्साहन देकर ग्रामीण युवाओं को सम्मानजनक रोजगार देना।
- सार्वजनिक शिक्षा व स्वास्थ्य पर व्यय में वृद्धि: जीडीपी का कम से कम 6% शिक्षा पर और 2.5% स्वास्थ्य पर खर्च करना।
- कौशल विकास एवं प्रगतिशील कराधान: सुपर-रिच पर उचित कर लगाकर उस राजस्व से ग्रामीण बुनियादी ढांचे का विकास करना।
6. निष्कर्ष:
सामाजिक न्याय के बिना आर्थिक उदारीकरण केवल मुट्ठी भर अमीरों का अभयारण्य बनकर रह जाता है। हमें विकास के ऐसे मॉडल की आवश्यकता है जिसमें पूंजी का सृजन भी हो और उसका न्यायसंगत वितरण भी हो। जब आर्थिक उदारीकरण की गति को सामाजिक न्याय और अंत्योदय का नैतिक संबल मिलेगा, तभी एक समतामूलक, समरस और शक्तिशाली 'विकसित भारत @2047' का निर्माण संभव होगा।