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निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "वर्तमान में नैतिक शिक्षा अभाव"

201650M
Model Answer

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

वर्तमान में नैतिक शिक्षा का अभाव: चरित्र निर्माण का संकट, सामाजिक विद्रूपताएँ, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एवं मूल्य-परक शिक्षा का पुनरुत्थान

"हृदय को संस्कारित किए बिना केवल मस्तिष्क को शिक्षित करना वास्तव में समाज के लिए एक बड़ा खतरा पैदा करना है।" — थियोडोर रूजवेल्ट
"हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, मानसिक शक्ति का विकास हो, बुद्धि का विस्तार हो और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके।" — स्वामी विवेकानंद

1. प्रस्तावना एवं आधुनिक शिक्षा का नैतिक संकट:
प्राचीन भारतीय चिंतन में शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य केवल आजीविका कमाना नहीं, बल्कि व्यक्ति का सर्वांगीण विकास और चरित्र निर्माण रहा है ("विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्")। किन्तु 21वीं सदी के घोर भौतिकतावादी, उपभोक्तावादी और प्रतिस्पर्धी युग में शिक्षा का स्वरूप अत्यंत संकीर्ण और यंत्रीकृत हो गया है। आज स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय केवल 'डिग्री बांटने और भारी-भरकम पैकेज दिलाने वाली फैक्ट्रियां' बनकर रह गए हैं। शिक्षा में 'बुद्धि' (IQ) को तो चमकाया जा रहा है, किन्तु 'संवेदना' (EQ) और 'नैतिक अंतरात्मा' (Moral Quotient) की घोर उपेक्षा की जा रही है। परिणामस्वरूप, वर्तमान समाज 'नैतिक शिक्षा के गंभीर अभाव' के दौर से गुजर रहा है।

2. नैतिक शिक्षा के ह्रास के प्रमुख कारण:

  • औपनिवेशिक मैकाले शिक्षा पद्धति का प्रभाव: स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल क्लर्क और आज्ञाकारी कर्मचारी तैयार करने की ब्रिटिश मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है।
  • शिक्षा का अनियंत्रित व्यावसायीकरण: कोचिंग संस्थानों और निजी विश्वविद्यालयों की होड़ में अंकों, रैंक और पैकेज को ही सफलता का एकमात्र पैमाना मान लेना।
  • संयुक्त परिवार व्यवस्था का विघटन: एकल परिवारों (Nuclear Families) में माता-पिता की व्यस्तता और स्क्रीन-एडिक्शन के कारण बच्चों को दादा-दादी और नाना-नानी की संस्कार देने वाली कहानियों और पारिवारिक सान्निध्य से वंचित होना पड़ा है।
  • धर्मनिरपेक्षता की भ्रामक व्याख्या: सार्वभौमिक मानवीय और नैतिक मूल्यों (सत्य, दया, ईमानदारी, करुणा) को धर्म-विशेष से जोड़कर स्कूलों से नैतिक शिक्षा की कक्षाओं को लगभग समाप्त कर देना।

3. नैतिक शिक्षा के अभाव के भयावह सामाजिक दुष्परिणाम:

  • सफेदपोश अपराध एवं संस्थागत भ्रष्टाचार: उच्च डिग्रियां हासिल करने वाले इंजीनियर, डॉक्टर, नौकरशाह और कॉर्पोरेट प्रबंधक करोड़ों के वित्तीय घोटालों, पर्चा लीक (Paper Leaks), और रिश्वतखोरी में संलिप्त पाए जाते हैं।
  • महिलाओं एवं कमजोरों के प्रति संवेदनहीनता: समाज में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, बलात्कार और शोषण की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि तकनीकी शिक्षा मनुष्य को सभ्य नहीं बना पाई है।
  • माता-पिता एवं वृद्धों की उपेक्षा: संपन्न और शिक्षित संतानों द्वारा अपने वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रमों में बेसहारा छोड़ देना।
  • युवाओं में मानसिक हताशा एवं आत्महत्याएं: नैतिक और आध्यात्मिक संबल के अभाव में युवा असफलता का सामना नहीं कर पाते और अवसाद व नशे के शिकार हो रहे हैं।

4. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) द्वारा मूल्य-परक शिक्षा की पुनर्स्थापना:

  • सार्वभौमिक मानवीय मूल्य (UHV): सत्य, धर्म, शांति, प्रेम और अहिंसा को प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक के पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करना।
  • प्रायोगिक एवं व्यावहारिक शिक्षण: केवल उपदेश देने के बजाय नैतिक दुविधाओं (Ethical Dilemmas), केस स्टडीज और रोल-प्ले द्वारा बच्चों को निर्णय लेना सिखाना।
  • सामुदायिक सेवा (Seva Bhav): विद्यार्थियों को वृद्धाश्रमों, अनाथालयों, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण सेवा (NSS/NCC) से जोड़कर उनमें परोपकार की भावना भरना।
  • शिक्षकों का आचरण: शिक्षक स्वयं अपने जीवन में ईमानदारी और सत्यनिष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत करें, क्योंकि आचरण ही सच्चा उपदेश है।

5. निष्कर्ष:
नैतिकता के बिना विज्ञान और तकनीकी ज्ञान उस बिना लगाम वाले घोड़े के समान है जो सवार को विनाश की खाई में गिरा देता है। एक सशक्त, समरस और खुशहाल राष्ट्र के निर्माण हेतु युवाओं के हाथों में आधुनिक तकनीक (AI, कोडिंग) के साथ-साथ उनके हृदय में सत्य, करुणा और सेवा के नैतिक संस्कार देना अनिवार्य है। जब नैतिक शिक्षा ज्ञान की रीढ़ बनेगी, तभी भारत पुनः 'विश्वगुरु' के पद पर आसीन होगा और 'विकसित भारत @2047' का स्वप्न साकार होगा।

हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "वर्तमान में नैतिक शिक्षा अभाव"

वर्तमान में नैतिक शिक्षा का अभाव: चरित्र निर्माण का संकट, सामाजिक विद्रूपताएँ, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एवं मूल्य-परक शिक्षा का पुनरुत्थान

"हृदय को संस्कारित किए बिना केवल मस्तिष्क को शिक्षित करना वास्तव में समाज के लिए एक बड़ा खतरा पैदा करना है।" — थियोडोर रूजवेल्ट
"हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, मानसिक शक्ति का विकास हो, बुद्धि का विस्तार हो और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके।" — स्वामी विवेकानंद

1. प्रस्तावना एवं आधुनिक शिक्षा का नैतिक संकट:
प्राचीन भारतीय चिंतन में शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य केवल आजीविका कमाना नहीं, बल्कि व्यक्ति का सर्वांगीण विकास और चरित्र निर्माण रहा है ("विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्")। किन्तु 21वीं सदी के घोर भौतिकतावादी, उपभोक्तावादी और प्रतिस्पर्धी युग में शिक्षा का स्वरूप अत्यंत संकीर्ण और यंत्रीकृत हो गया है। आज स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय केवल 'डिग्री बांटने और भारी-भरकम पैकेज दिलाने वाली फैक्ट्रियां' बनकर रह गए हैं। शिक्षा में 'बुद्धि' (IQ) को तो चमकाया जा रहा है, किन्तु 'संवेदना' (EQ) और 'नैतिक अंतरात्मा' (Moral Quotient) की घोर उपेक्षा की जा रही है। परिणामस्वरूप, वर्तमान समाज 'नैतिक शिक्षा के गंभीर अभाव' के दौर से गुजर रहा है।

2. नैतिक शिक्षा के ह्रास के प्रमुख कारण:

  • औपनिवेशिक मैकाले शिक्षा पद्धति का प्रभाव: स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल क्लर्क और आज्ञाकारी कर्मचारी तैयार करने की ब्रिटिश मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है।
  • शिक्षा का अनियंत्रित व्यावसायीकरण: कोचिंग संस्थानों और निजी विश्वविद्यालयों की होड़ में अंकों, रैंक और पैकेज को ही सफलता का एकमात्र पैमाना मान लेना।
  • संयुक्त परिवार व्यवस्था का विघटन: एकल परिवारों (Nuclear Families) में माता-पिता की व्यस्तता और स्क्रीन-एडिक्शन के कारण बच्चों को दादा-दादी और नाना-नानी की संस्कार देने वाली कहानियों और पारिवारिक सान्निध्य से वंचित होना पड़ा है।
  • धर्मनिरपेक्षता की भ्रामक व्याख्या: सार्वभौमिक मानवीय और नैतिक मूल्यों (सत्य, दया, ईमानदारी, करुणा) को धर्म-विशेष से जोड़कर स्कूलों से नैतिक शिक्षा की कक्षाओं को लगभग समाप्त कर देना।

3. नैतिक शिक्षा के अभाव के भयावह सामाजिक दुष्परिणाम:

  • सफेदपोश अपराध एवं संस्थागत भ्रष्टाचार: उच्च डिग्रियां हासिल करने वाले इंजीनियर, डॉक्टर, नौकरशाह और कॉर्पोरेट प्रबंधक करोड़ों के वित्तीय घोटालों, पर्चा लीक (Paper Leaks), और रिश्वतखोरी में संलिप्त पाए जाते हैं।
  • महिलाओं एवं कमजोरों के प्रति संवेदनहीनता: समाज में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, बलात्कार और शोषण की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि तकनीकी शिक्षा मनुष्य को सभ्य नहीं बना पाई है।
  • माता-पिता एवं वृद्धों की उपेक्षा: संपन्न और शिक्षित संतानों द्वारा अपने वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रमों में बेसहारा छोड़ देना।
  • युवाओं में मानसिक हताशा एवं आत्महत्याएं: नैतिक और आध्यात्मिक संबल के अभाव में युवा असफलता का सामना नहीं कर पाते और अवसाद व नशे के शिकार हो रहे हैं।

4. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) द्वारा मूल्य-परक शिक्षा की पुनर्स्थापना:

  • सार्वभौमिक मानवीय मूल्य (UHV): सत्य, धर्म, शांति, प्रेम और अहिंसा को प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक के पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करना।
  • प्रायोगिक एवं व्यावहारिक शिक्षण: केवल उपदेश देने के बजाय नैतिक दुविधाओं (Ethical Dilemmas), केस स्टडीज और रोल-प्ले द्वारा बच्चों को निर्णय लेना सिखाना।
  • सामुदायिक सेवा (Seva Bhav): विद्यार्थियों को वृद्धाश्रमों, अनाथालयों, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण सेवा (NSS/NCC) से जोड़कर उनमें परोपकार की भावना भरना।
  • शिक्षकों का आचरण: शिक्षक स्वयं अपने जीवन में ईमानदारी और सत्यनिष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत करें, क्योंकि आचरण ही सच्चा उपदेश है।

5. निष्कर्ष:
नैतिकता के बिना विज्ञान और तकनीकी ज्ञान उस बिना लगाम वाले घोड़े के समान है जो सवार को विनाश की खाई में गिरा देता है। एक सशक्त, समरस और खुशहाल राष्ट्र के निर्माण हेतु युवाओं के हाथों में आधुनिक तकनीक (AI, कोडिंग) के साथ-साथ उनके हृदय में सत्य, करुणा और सेवा के नैतिक संस्कार देना अनिवार्य है। जब नैतिक शिक्षा ज्ञान की रीढ़ बनेगी, तभी भारत पुनः 'विश्वगुरु' के पद पर आसीन होगा और 'विकसित भारत @2047' का स्वप्न साकार होगा।

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