निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "भाषा का अवमूल्यन"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
भाषा का अवमूल्यन: व्याकरणिक क्षरण, हिंग्लिश की चुनौती, डिजिटल संस्कृति एवं भाषाई मर्यादा का संरक्षण
"भाषा केवल बातचीत का साधन नहीं, बल्कि किसी समाज के संस्कारों, संस्कृति और वैचारिक गहराई की आत्मा होती है; जब भाषा का अवमूल्यन होता है, तो पूरी संस्कृति पतन की ओर अग्रसर हो जाती है।"
1. प्रस्तावना एवं भाषा के अवमूल्यन का अर्थ:
भाषा का अवमूल्यन (Devaluation of Language) से तात्पर्य भाषा की शुद्धता, व्याकरणिक अनुशासन, शब्द-सामर्थ्य, साहित्यिक रस और उसकी शालीन मर्यादा में आने वाली लगातार गिरावट से है। 21वीं सदी के डिजिटल युग और तीव्र गति वाले जीवन में भाषा के स्वरूप, उच्चारण और प्रयोग में गंभीर विकृतियाँ और सतहीपन देखा जा रहा है।
2. भाषा के अवमूल्यन के प्रमुख कारण एवं स्वरूप:
- सोशल मीडिया की 'शॉर्ट-फॉर्म' एवं इमोजी संस्कृति: व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर शब्दों को तोड़-मरोड़कर लिखना (जैसे—'u', 'k', 'hbd') तथा इमोजी पर निर्भरता ने बच्चों में वर्तनी (Spelling) और व्याकरण की समझ को समाप्त कर दिया है।
- 'हिंग्लिश' का अंधाधुंध प्रयोग (खिचड़ी भाषा): न पूरी तरह हिंदी बोलना और न अंग्रेजी, जिससे ऐसी हाइब्रिड भाषा बन गई है जिसमें किसी भी गंभीर दार्शनिक, तकनीकी या भावनात्मक विचार को गहराई से व्यक्त करने की क्षमता नहीं बची है।
- सिनेमा, वेब सीरीज एवं गानों में फूहड़ता: ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और गानों में अश्लील गालियों, अभद्र स्लैंग्स और फूहड़ भाषा को 'कूल' और 'यथार्थवादी' बताकर महिमामंडित करना, जिससे युवा पीढ़ी की भाषा से शालीनता गायब हो रही है।
- साहित्य पठन का अभाव: महान साहित्यकारों (प्रेमचंद, दिनकर, निराला, मुक्तिबोध) की पुस्तकों से दूरी, जिसके कारण समृद्ध मुहावरों, लोकोक्तियों और सुंदर शब्दावली का लोप हो रहा है।
3. समाधान हेतु आवश्यक कदम (आगे की राह):
- प्राथमिक शिक्षा में शुद्ध भाषा शिक्षण (NEP 2020): बच्चों में सुंदर हस्तलेखन, शुद्ध उच्चारण और व्याकरणिक शुद्धता पर विशेष बल देना।
- पुस्तकालय संस्कृति का पुनरुद्धार: स्कूलों और मोहल्लों में पुस्तकालयों की स्थापना कर युवाओं को श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने हेतु प्रेरित करना।
- मीडिया का नैतिक दायित्व: मीडिया व पटकथा लेखकों द्वारा भाषा की गरिमा और मर्यादा का पालन करना।
4. निष्कर्ष:
भाषा मनुष्य की पहचान और उसकी बौद्धिक संप्रभुता का प्रतीक है। भाषा को विकृतियों से बचाकर उसकी गरिमा, शुद्धता और माधुर्य को अक्षुण्ण रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। अपनी भाषा पर गर्व (*विरासत पर गर्व*) करना ही एक सुसंस्कृत, स्वाभिमानी और प्रबुद्ध 'विकसित भारत @2047' का सच्चा आधार है।
हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "भाषा का अवमूल्यन"
भाषा का अवमूल्यन: व्याकरणिक क्षरण, हिंग्लिश की चुनौती, डिजिटल संस्कृति एवं भाषाई मर्यादा का संरक्षण
"भाषा केवल बातचीत का साधन नहीं, बल्कि किसी समाज के संस्कारों, संस्कृति और वैचारिक गहराई की आत्मा होती है; जब भाषा का अवमूल्यन होता है, तो पूरी संस्कृति पतन की ओर अग्रसर हो जाती है।"
1. प्रस्तावना एवं भाषा के अवमूल्यन का अर्थ:
भाषा का अवमूल्यन (Devaluation of Language) से तात्पर्य भाषा की शुद्धता, व्याकरणिक अनुशासन, शब्द-सामर्थ्य, साहित्यिक रस और उसकी शालीन मर्यादा में आने वाली लगातार गिरावट से है। 21वीं सदी के डिजिटल युग और तीव्र गति वाले जीवन में भाषा के स्वरूप, उच्चारण और प्रयोग में गंभीर विकृतियाँ और सतहीपन देखा जा रहा है।
2. भाषा के अवमूल्यन के प्रमुख कारण एवं स्वरूप:
- सोशल मीडिया की 'शॉर्ट-फॉर्म' एवं इमोजी संस्कृति: व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर शब्दों को तोड़-मरोड़कर लिखना (जैसे—'u', 'k', 'hbd') तथा इमोजी पर निर्भरता ने बच्चों में वर्तनी (Spelling) और व्याकरण की समझ को समाप्त कर दिया है।
- 'हिंग्लिश' का अंधाधुंध प्रयोग (खिचड़ी भाषा): न पूरी तरह हिंदी बोलना और न अंग्रेजी, जिससे ऐसी हाइब्रिड भाषा बन गई है जिसमें किसी भी गंभीर दार्शनिक, तकनीकी या भावनात्मक विचार को गहराई से व्यक्त करने की क्षमता नहीं बची है।
- सिनेमा, वेब सीरीज एवं गानों में फूहड़ता: ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और गानों में अश्लील गालियों, अभद्र स्लैंग्स और फूहड़ भाषा को 'कूल' और 'यथार्थवादी' बताकर महिमामंडित करना, जिससे युवा पीढ़ी की भाषा से शालीनता गायब हो रही है।
- साहित्य पठन का अभाव: महान साहित्यकारों (प्रेमचंद, दिनकर, निराला, मुक्तिबोध) की पुस्तकों से दूरी, जिसके कारण समृद्ध मुहावरों, लोकोक्तियों और सुंदर शब्दावली का लोप हो रहा है।
3. समाधान हेतु आवश्यक कदम (आगे की राह):
- प्राथमिक शिक्षा में शुद्ध भाषा शिक्षण (NEP 2020): बच्चों में सुंदर हस्तलेखन, शुद्ध उच्चारण और व्याकरणिक शुद्धता पर विशेष बल देना।
- पुस्तकालय संस्कृति का पुनरुद्धार: स्कूलों और मोहल्लों में पुस्तकालयों की स्थापना कर युवाओं को श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने हेतु प्रेरित करना।
- मीडिया का नैतिक दायित्व: मीडिया व पटकथा लेखकों द्वारा भाषा की गरिमा और मर्यादा का पालन करना।
4. निष्कर्ष:
भाषा मनुष्य की पहचान और उसकी बौद्धिक संप्रभुता का प्रतीक है। भाषा को विकृतियों से बचाकर उसकी गरिमा, शुद्धता और माधुर्य को अक्षुण्ण रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। अपनी भाषा पर गर्व (*विरासत पर गर्व*) करना ही एक सुसंस्कृत, स्वाभिमानी और प्रबुद्ध 'विकसित भारत @2047' का सच्चा आधार है।