Home›MPPSC Mains (Eng)›General Hindi & Grammar›General Hindi & Grammar›Unseen Passage (18 marks)›'रामचरितमानस' के उत्तरकांड में गरुड़ ने काकभुशुण्डि से सात प्रश्न

'रामचरितमानस' के उत्तरकांड में गरुड़ ने काकभुशुण्डि से सात प्रश्न पूछे हैं। वे प्रश्न मानवीय अस्तित्व के बुनियादी प्रश्न हैं और उनके उत्तर भी उतने ही अर्थवान। जितने संक्षिप्त प्रश्न उतने ही सारगर्भित उत्तर। जैसे तुलसी अपने जीवन भर के अनुभवों का निचोड़ दे रहे हों। गरुड़ का एक प्रश्न है - 'बड़ दुख कवन, कवन सुख भारी' अर्थात् सबसे बड़ा दुख और सबसे बड़ा सुख क्या है ? काकभुशुण्डि एक ही चौपाई में इसका जो उत्तर देते हैं, वह तुलसी जैसा बड़ा कवि ही लिख सकता था। वे कहते हैं - "नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं, संत मिलन सम सुख जग नाहीं" अर्थात् दारिद्र्य के समान कोई दुख नहीं और संत मिलन के समान कोई सुख नहीं है। विचार करें कि यदि दारिद्र्य सबसे बड़ा दुख है तो उसका उल्टा अर्थात् आर्थिक संपन्नता को सबसे बड़ा सुख कहना चाहिए। मगर तुलसी ऐसा नहीं कहते हैं।

201715M
Model Answer

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.

संक्षेपण (Précis Writing):

उचित शीर्षक: संत-असंत लक्षण एवं परहित का महत्व

संक्षेपण:
'रामचरितमानस' के उत्तरकांड में महर्षि काकभुशुण्डि ने मानव शरीर को धर्म का साधन बताते हुए 'परहित' को सबसे बड़ा धर्म तथा 'दूसरों को पीड़ा पहुँचाने' को सबसे बड़ा पाप कहा है। संतों का हृदय मक्खन से भी अधिक कोमल होता है जो दूसरों के दुःख से द्रवित हो उठता है, जबकि दुर्जन पर-पीड़ा में ही सुख पाते हैं।

(मूल शब्द: ~140 शब्द | संक्षेपण शब्द: ~50 शब्द)

हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

'रामचरितमानस' के उत्तरकांड में गरुड़ ने काकभुशुण्डि से सात प्रश्न पूछे हैं। वे प्रश्न मानवीय अस्तित्व के बुनियादी प्रश्न हैं और उनके उत्तर भी उतने ही अर्थवान। जितने संक्षिप्त प्रश्न उतने ही सारगर्भित उत्तर। जैसे तुलसी अपने जीवन भर के अनुभवों का निचोड़ दे रहे हों। गरुड़ का एक प्रश्न है - 'बड़ दुख कवन, कवन सुख भारी' अर्थात् सबसे बड़ा दुख और सबसे बड़ा सुख क्या है ? काकभुशुण्डि एक ही चौपाई में इसका जो उत्तर देते हैं, वह तुलसी जैसा बड़ा कवि ही लिख सकता था। वे कहते हैं - "नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं, संत मिलन सम सुख जग नाहीं" अर्थात् दारिद्र्य के समान कोई दुख नहीं और संत मिलन के समान कोई सुख नहीं है। विचार करें कि यदि दारिद्र्य सबसे बड़ा दुख है तो उसका उल्टा अर्थात् आर्थिक संपन्नता को सबसे बड़ा सुख कहना चाहिए। मगर तुलसी ऐसा नहीं कहते हैं।

संक्षेपण (Précis Writing):

उचित शीर्षक: संत-असंत लक्षण एवं परहित का महत्व

संक्षेपण:
'रामचरितमानस' के उत्तरकांड में महर्षि काकभुशुण्डि ने मानव शरीर को धर्म का साधन बताते हुए 'परहित' को सबसे बड़ा धर्म तथा 'दूसरों को पीड़ा पहुँचाने' को सबसे बड़ा पाप कहा है। संतों का हृदय मक्खन से भी अधिक कोमल होता है जो दूसरों के दुःख से द्रवित हो उठता है, जबकि दुर्जन पर-पीड़ा में ही सुख पाते हैं।

(मूल शब्द: ~140 शब्द | संक्षेपण शब्द: ~50 शब्द)

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