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निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "मानव मूल्य और साहित्य"

201750M
Model Answer

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

मानव मूल्य और साहित्य: सभ्यता की नैतिक आधारशिला, रस-संवेदना, सामाजिक न्याय एवं मानवीय चेतना का नवजागरण

"सहितस्य भावः साहित्यम् (जो संपूर्ण मानवता के कल्याण, हित और उत्थान की उदात्त भावना से परिपूर्ण हो, वही सच्चा साहित्य है।)"
"साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल है; उसका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि मनुष्य की सोई हुई अंतरात्मा को जगाना, अन्याय के विरुद्ध विद्रोह पैदा करना और मानव मूल्यों की रक्षा करना है।" — मुंशी प्रेमचंद (प्रगतिशील लेखक संघ, 1936)

1. प्रस्तावना एवं साहित्य और मानव मूल्यों का घनिष्ठ संबंध:
सभ्यता केवल कंक्रीट की ऊंची इमारतों, विशाल राजमार्गों और तकनीकी उपकरणों से महान नहीं बनती; उसकी वास्तविक महानता उसके मानव मूल्यों (Human Values)—सत्य, करुणा, दया, प्रेम, अहिंसा, त्याग, बंधुत्व और न्याय—पर निर्भर करती है। 'साहित्य' अनादिकाल से इन शाश्वत मानव मूल्यों का सबसे पवित्र मंदिर, पोषक और संवाहक रहा है। विज्ञान मनुष्य को भौतिक साधन और शक्ति प्रदान करता है, किन्तु साहित्य उस शक्ति का लोकहित में उपयोग करने का 'संस्कार' और 'संवेदना' प्रदान करता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में, "साहित्य मानव हृदय को संकीर्ण स्वार्थों से मुक्त कर उसे विश्व-चेतना के साथ एकाकार करने का साधन है।"

2. भारतीय साहित्य का इतिहास: मानव मूल्यों की शाश्वत धारा:

  • 1. वैदिक एवं पौराणिक काल (धर्म और मर्यादा की स्थापना):
    • वाल्मीकि रामायण एवं रामचरितमानस: भगवान श्री राम के माध्यम से सत्य, वचन-पालन, त्याग और मर्यादा के सर्वोच्च आदर्श स्थापित करना। तुलसीदास जी ने मानव धर्म का सार बताते हुए लिखा—
      "परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥"
    • महाभारत: स्वार्थ, अन्याय और अधर्म के भयानक विनाशकारी परिणामों से सचेत करते हुए धर्म और न्याय की विजय (*यतो धर्मस्ततो जयः*) का शंखनाद करना।
  • 2. मध्यकालीन भक्तिकाल: समानता और सार्वभौमिक प्रेम का युग:
    • कबीरदास: पाखंड, छुआछूत और धार्मिक कट्टरता पर करारी चोट करते हुए प्रेम को ही सबसे बड़ा ज्ञान घोषित किया—
      "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"
    • संत रविदास: 'बेगमपुरा' (दुःखरहित समतामूलक समाज) की संकल्पना देकर जन्म-आधारित भेदभाव को पूरी तरह नकारा।
    • सूरदास एवं मीराबाई: वात्सल्य और भक्ति रस से मानव हृदय को निर्मल किया।
  • 3. आधुनिक एवं प्रगतिशील साहित्य: शोषितों की पीड़ा को स्वर:
    • कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद: 'गोदान', 'कफ़न', और 'पूस की रात' में शोषित किसानों, मजदूरों और वंचितों की व्यथा को उजागर कर समाज की अंतरात्मा को झकझोरा।
    • रवींद्रनाथ टैगोर: 'गीतांजलि' के माध्यम से सार्वभौमिक विश्व-मानवतावाद का संदेश दिया।
    • मध्य प्रदेश के साहित्यकार: सुभद्रा कुमारी चौहान ('झाँसी की रानी') ने देशप्रेम और नारी शौर्य का ज्वार जगाया, वहीं मुक्तिबोध ने आधुनिक मानव के अंतर्द्वंद्व और अंतरात्मा की रक्षा का संदेश दिया।

3. 21वीं सदी में मूल्यों का संकट एवं साहित्य की संजीवनी भूमिका:

  • अंधाधुंध उपभोक्तावाद एवं संवेदनहीनता का इलाज: आज मनुष्य मशीन और स्क्रीन का गुलाम बनता जा रहा है, जिससे रिश्तों में आत्मीयता समाप्त हो रही है। साहित्य मनुष्य के भीतर पुनः करुणा, आंसू, प्रेम और संवेदना का संचार करता है।
  • युद्ध, घृणा और आतंकवाद के विरुद्ध ढाल: साहित्य सीमा पार के मनुष्यों के सुख-दुःख को एक जैसा दिखाकर वैश्विक बंधुत्व और शांति की स्थापना करता है।

4. निष्कर्ष:
विज्ञान जीवन को सुगम बना सकता है, किन्तु साहित्य जीवन को सुंदर, सार्थक और गरिमामय बनाता है। यदि समाज से साहित्य और मानवीय मूल्य समाप्त हो जाएं, तो मनुष्य केवल एक बौद्धिक हिंसक पशु बनकर रह जाएगा। अतः उत्कृष्ट साहित्य का अनुशीलन कर मानव मूल्यों को संरक्षित करना प्रत्येक पीढ़ी का पावन कर्तव्य है, जिससे एक करुणामय, समतामूलक और सुसंस्कृत 'विकसित भारत @2047' का निर्माण हो सके।

हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "मानव मूल्य और साहित्य"

मानव मूल्य और साहित्य: सभ्यता की नैतिक आधारशिला, रस-संवेदना, सामाजिक न्याय एवं मानवीय चेतना का नवजागरण

"सहितस्य भावः साहित्यम् (जो संपूर्ण मानवता के कल्याण, हित और उत्थान की उदात्त भावना से परिपूर्ण हो, वही सच्चा साहित्य है।)"
"साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल है; उसका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि मनुष्य की सोई हुई अंतरात्मा को जगाना, अन्याय के विरुद्ध विद्रोह पैदा करना और मानव मूल्यों की रक्षा करना है।" — मुंशी प्रेमचंद (प्रगतिशील लेखक संघ, 1936)

1. प्रस्तावना एवं साहित्य और मानव मूल्यों का घनिष्ठ संबंध:
सभ्यता केवल कंक्रीट की ऊंची इमारतों, विशाल राजमार्गों और तकनीकी उपकरणों से महान नहीं बनती; उसकी वास्तविक महानता उसके मानव मूल्यों (Human Values)—सत्य, करुणा, दया, प्रेम, अहिंसा, त्याग, बंधुत्व और न्याय—पर निर्भर करती है। 'साहित्य' अनादिकाल से इन शाश्वत मानव मूल्यों का सबसे पवित्र मंदिर, पोषक और संवाहक रहा है। विज्ञान मनुष्य को भौतिक साधन और शक्ति प्रदान करता है, किन्तु साहित्य उस शक्ति का लोकहित में उपयोग करने का 'संस्कार' और 'संवेदना' प्रदान करता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में, "साहित्य मानव हृदय को संकीर्ण स्वार्थों से मुक्त कर उसे विश्व-चेतना के साथ एकाकार करने का साधन है।"

2. भारतीय साहित्य का इतिहास: मानव मूल्यों की शाश्वत धारा:

  • 1. वैदिक एवं पौराणिक काल (धर्म और मर्यादा की स्थापना):
    • वाल्मीकि रामायण एवं रामचरितमानस: भगवान श्री राम के माध्यम से सत्य, वचन-पालन, त्याग और मर्यादा के सर्वोच्च आदर्श स्थापित करना। तुलसीदास जी ने मानव धर्म का सार बताते हुए लिखा—
      "परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥"
    • महाभारत: स्वार्थ, अन्याय और अधर्म के भयानक विनाशकारी परिणामों से सचेत करते हुए धर्म और न्याय की विजय (*यतो धर्मस्ततो जयः*) का शंखनाद करना।
  • 2. मध्यकालीन भक्तिकाल: समानता और सार्वभौमिक प्रेम का युग:
    • कबीरदास: पाखंड, छुआछूत और धार्मिक कट्टरता पर करारी चोट करते हुए प्रेम को ही सबसे बड़ा ज्ञान घोषित किया—
      "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"
    • संत रविदास: 'बेगमपुरा' (दुःखरहित समतामूलक समाज) की संकल्पना देकर जन्म-आधारित भेदभाव को पूरी तरह नकारा।
    • सूरदास एवं मीराबाई: वात्सल्य और भक्ति रस से मानव हृदय को निर्मल किया।
  • 3. आधुनिक एवं प्रगतिशील साहित्य: शोषितों की पीड़ा को स्वर:
    • कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद: 'गोदान', 'कफ़न', और 'पूस की रात' में शोषित किसानों, मजदूरों और वंचितों की व्यथा को उजागर कर समाज की अंतरात्मा को झकझोरा।
    • रवींद्रनाथ टैगोर: 'गीतांजलि' के माध्यम से सार्वभौमिक विश्व-मानवतावाद का संदेश दिया।
    • मध्य प्रदेश के साहित्यकार: सुभद्रा कुमारी चौहान ('झाँसी की रानी') ने देशप्रेम और नारी शौर्य का ज्वार जगाया, वहीं मुक्तिबोध ने आधुनिक मानव के अंतर्द्वंद्व और अंतरात्मा की रक्षा का संदेश दिया।

3. 21वीं सदी में मूल्यों का संकट एवं साहित्य की संजीवनी भूमिका:

  • अंधाधुंध उपभोक्तावाद एवं संवेदनहीनता का इलाज: आज मनुष्य मशीन और स्क्रीन का गुलाम बनता जा रहा है, जिससे रिश्तों में आत्मीयता समाप्त हो रही है। साहित्य मनुष्य के भीतर पुनः करुणा, आंसू, प्रेम और संवेदना का संचार करता है।
  • युद्ध, घृणा और आतंकवाद के विरुद्ध ढाल: साहित्य सीमा पार के मनुष्यों के सुख-दुःख को एक जैसा दिखाकर वैश्विक बंधुत्व और शांति की स्थापना करता है।

4. निष्कर्ष:
विज्ञान जीवन को सुगम बना सकता है, किन्तु साहित्य जीवन को सुंदर, सार्थक और गरिमामय बनाता है। यदि समाज से साहित्य और मानवीय मूल्य समाप्त हो जाएं, तो मनुष्य केवल एक बौद्धिक हिंसक पशु बनकर रह जाएगा। अतः उत्कृष्ट साहित्य का अनुशीलन कर मानव मूल्यों को संरक्षित करना प्रत्येक पीढ़ी का पावन कर्तव्य है, जिससे एक करुणामय, समतामूलक और सुसंस्कृत 'विकसित भारत @2047' का निर्माण हो सके।

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