निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारतीय संसद की कार्य-प्रणाली"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
भारतीय संसद की कार्य-प्रणाली: संवैधानिक संरचना, विधि निर्माण, कार्यपालिका पर नियंत्रण एवं सुधार
"संसद भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च पावन मंदिर है, जहाँ 140 करोड़ नागरिकों की संप्रभु इच्छा, आकांक्षाएँ और नीतियाँ आकार लेती हैं।"
1. प्रस्तावना एवं संवैधानिक स्थिति:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार संघ की संसद राष्ट्रपति तथा दो सदनों—राज्यसभा (उच्च सदन/राज्यों की परिषद) और लोकसभा (जनता का सदन) से मिलकर बनती है। संसदीय प्रणाली के तहत संसद देश में विधि निर्माण, जन-समस्याओं के समाधान तथा कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने का सर्वोच्च मंच है।
2. संसद की कार्य-प्रणाली के प्रमुख अंग एवं आयाम:
- 1. विधि निर्माण (Legislative Process):
साधारण, वित्त तथा संविधान संशोधन विधेयकों (अनुच्छेद 368) को तीनों वाचनों (Three Readings) से गुजारकर तथा राष्ट्रपति की सहमति (अनुच्छेद 111) प्राप्त कर कानून का रूप देना। - 2. कार्यपालिका (सरकार) पर नियंत्रण:
- प्रश्नकाल एवं शून्यकाल: तारांकित व अतारांकित प्रश्नों के माध्यम से मंत्रियों से तीखे सवाल पूछकर प्रशासनिक जवाबदेही तय करना।
- संसदीय प्रस्ताव: ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, कार्यस्थगन प्रस्ताव तथा अविश्वास प्रस्ताव द्वारा अनुच्छेद 75(3) के तहत सरकार का सामूहिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना।
- 3. वित्तीय नियंत्रण (बजट प्रणाली):
वार्षिक वित्तीय विवरण (अनुच्छेद 112) व विनियोग विधेयक पारित करना तथा लोक लेखा समिति (PAC) द्वारा सीएजी (CAG) की रिपोर्ट के आधार पर सरकारी खर्चों की जांच करना। - 4. संसदीय समिति प्रणाली:
24 विभागीय स्थायी समितियाँ दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विधेयकों और नीतियों की गहन व निष्पक्ष समीक्षा करती हैं।
3. समकालीन चुनौतियाँ एवं सुधार (आगे की राह):
- संसद में बार-बार होने वाले व्यवधानों व स्थगनों को रोककर न्यूनतम 100 बैठकी दिवस अनिवार्य करना।
- विधेयकों को बिना बहस या बिना संसदीय समितियों को भेजे जल्दबाजी में पारित करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना।
4. निष्कर्ष:
संसद की जीवंतता और गुणवत्तापूर्ण वाद-विवाद ही लोकतंत्र की असली शक्ति है। संसदीय मर्यादाओं का पालन करते हुए जब संसद राष्ट्रहित में विधि निर्माण करेगी, तभी देश में सुशासन (Good Governance) स्थापित होगा और 'विकसित भारत @2047' का स्वप्न साकार होगा।
हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारतीय संसद की कार्य-प्रणाली"
भारतीय संसद की कार्य-प्रणाली: संवैधानिक संरचना, विधि निर्माण, कार्यपालिका पर नियंत्रण एवं सुधार
"संसद भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च पावन मंदिर है, जहाँ 140 करोड़ नागरिकों की संप्रभु इच्छा, आकांक्षाएँ और नीतियाँ आकार लेती हैं।"
1. प्रस्तावना एवं संवैधानिक स्थिति:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार संघ की संसद राष्ट्रपति तथा दो सदनों—राज्यसभा (उच्च सदन/राज्यों की परिषद) और लोकसभा (जनता का सदन) से मिलकर बनती है। संसदीय प्रणाली के तहत संसद देश में विधि निर्माण, जन-समस्याओं के समाधान तथा कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने का सर्वोच्च मंच है।
2. संसद की कार्य-प्रणाली के प्रमुख अंग एवं आयाम:
- 1. विधि निर्माण (Legislative Process):
साधारण, वित्त तथा संविधान संशोधन विधेयकों (अनुच्छेद 368) को तीनों वाचनों (Three Readings) से गुजारकर तथा राष्ट्रपति की सहमति (अनुच्छेद 111) प्राप्त कर कानून का रूप देना। - 2. कार्यपालिका (सरकार) पर नियंत्रण:
- प्रश्नकाल एवं शून्यकाल: तारांकित व अतारांकित प्रश्नों के माध्यम से मंत्रियों से तीखे सवाल पूछकर प्रशासनिक जवाबदेही तय करना।
- संसदीय प्रस्ताव: ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, कार्यस्थगन प्रस्ताव तथा अविश्वास प्रस्ताव द्वारा अनुच्छेद 75(3) के तहत सरकार का सामूहिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना।
- 3. वित्तीय नियंत्रण (बजट प्रणाली):
वार्षिक वित्तीय विवरण (अनुच्छेद 112) व विनियोग विधेयक पारित करना तथा लोक लेखा समिति (PAC) द्वारा सीएजी (CAG) की रिपोर्ट के आधार पर सरकारी खर्चों की जांच करना। - 4. संसदीय समिति प्रणाली:
24 विभागीय स्थायी समितियाँ दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विधेयकों और नीतियों की गहन व निष्पक्ष समीक्षा करती हैं।
3. समकालीन चुनौतियाँ एवं सुधार (आगे की राह):
- संसद में बार-बार होने वाले व्यवधानों व स्थगनों को रोककर न्यूनतम 100 बैठकी दिवस अनिवार्य करना।
- विधेयकों को बिना बहस या बिना संसदीय समितियों को भेजे जल्दबाजी में पारित करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना।
4. निष्कर्ष:
संसद की जीवंतता और गुणवत्तापूर्ण वाद-विवाद ही लोकतंत्र की असली शक्ति है। संसदीय मर्यादाओं का पालन करते हुए जब संसद राष्ट्रहित में विधि निर्माण करेगी, तभी देश में सुशासन (Good Governance) स्थापित होगा और 'विकसित भारत @2047' का स्वप्न साकार होगा।