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निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारतीय संस्कृति और समरसता"

201950M
Model Answer

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

भारतीय संस्कृति और समरसता: दार्शनिक आधार, भक्ति-सूफी परंपरा, संवैधानिक बंधुता एवं सामाजिक समरसता का राष्ट्रीय संकल्प

"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥"
— ऋग्वेद (संज्ञान सूक्त)
(हम सब साथ-साथ चलें, एक स्वर में बात करें, हमारे मनों में समान विचार हों, जिस प्रकार प्राचीन काल के प्रबुद्ध जन मिलकर राष्ट्र की सेवा करते थे।)
"जाति-पाँति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।"
— संत रामानंद

1. प्रस्तावना एवं 'समरसता' का उदात्त मर्म:
सामाजिक समरसता भारतीय संस्कृति की प्राणवायु, उसका शाश्वत नैतिक आधार और सभ्यतागत सौंदर्य है। भारतीय चिंतन में समरसता का अर्थ केवल विभिन्न मतों का 'सह-अस्तित्व' (Co-existence) या 'सहनशीलता' (Tolerance) मात्र नहीं है, बल्कि समस्त मानव जाति में एक ही ईश्वरीय चेतना का दर्शन करते हुए परस्पर आत्मीय प्रेम, सम्मान और बंधुत्व की अनुभूति करना है। हजारों वर्षों के इतिहास में भारत ने अनेक जातियों, धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों को अपनी विशाल गोद में समेटकर 'अनेकता में एकता' की अनुपम सांस्कृतिक त्रिवेणी प्रवाहित की है।

2. भारतीय चिंतन में समरसता के दार्शनिक एवं ऐतिहासिक आधार:

  • अद्वैत दर्शन एवं उपनिषदीय एकात्मता: ईशावास्योपनिषद् का उद्घोष "ईशा वास्यमिदं सर्वम्" स्पष्ट करता है कि संपूर्ण चराचर जगत में एक ही परमात्मा का वास है। जब प्रत्येक व्यक्ति में एक ही आत्म-तत्व विद्यमान है, तो जाति, वर्ण या जन्म के आधार पर भेदभाव करना सबसे बड़ा नैतिक और आध्यात्मिक अपराध है।
  • भक्ति एवं सूफी आंदोलन की समरसता क्रांति:
    • संत कवियों ने सामाजिक रूढ़ियों पर कड़ा प्रहार किया: संत कबीर ने बाह्याडंबरों को नकारा, संत रविदास ने जाति-विहीन और शोषण-मुक्त आदर्श समाज 'बेगमपुरा' की कल्पना की, तथा गुरु नानक देव जी ने 'पंगत' (एक साथ भोजन) और 'लंगर' की स्थापना कर ऊंच-नीच के भेद को मिटा दिया।
    • सूफी संतों (निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो) ने 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' का बीजारोपण कर हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय को प्रगाढ़ किया।
  • सर्वधर्म समभाव: ऋग्वेद का आदर्श "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (सत्य एक है, ज्ञानी उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं) भारत को विश्व का सबसे सहिष्णु राष्ट्र बनाता है।

3. भारतीय संविधान में सामाजिक समरसता एवं बंधुता:

  • प्रस्तावना में 'बंधुत्व' (Fraternity) का संकल्प: व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने वाले बंधुत्व को संविधान का आधारस्तंभ बनाना।
  • संवैधानिक प्रावधान:
    1. अनुच्छेद 14 व 15: विधि के समक्ष समानता तथा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का पूर्ण प्रतिषेध।
    2. अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता (छुआछूत) का समूल उन्मूलन और इसे दंडनीय अपराध घोषित करना।
    3. अनुच्छेद 25 से 28: धार्मिक स्वतंत्रता एवं अंतःकरण की स्वतंत्रता।
  • डॉ. बी.आर. अंबेडकर का दृष्टिकोण: उन्होंने स्पष्ट किया था कि जब तक राजनीतिक लोकतंत्र के नीचे सामाजिक लोकतंत्र (स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व) की मजबूत नींव नहीं होगी, तब तक देश अखंड नहीं रह सकता।

4. मध्य प्रदेश: समरसता और सांस्कृतिक समन्वय की पावन धरा:
मध्य प्रदेश देश के सांस्कृतिक सद्भाव का प्रत्यक्ष प्रतीक रहा है:

  • साँची और विदिशा का संगम: बौद्ध स्तूप, जैन तीर्थ और हिंदू मंदिर (उदयगिरि) सदियों से एक ही क्षेत्र में शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व के साक्षी हैं।
  • ग्वालियर का तानसेन समारोह: भारतीय शास्त्रीय संगीत की वह परंपरा जो जाति और धर्म के बंधनों को तोड़कर सभी को सुरों के एक तार में पिरोती है।
  • निमाड़ के संत सिंगाजी एवं लोक संस्कृति: कबीरपंथी परंपरा और लोक गायन में सभी वर्गों की समान सहभागिता।
  • जनजातीय गौरव: रानी दुर्गावती और टंट्या भील जैसे जननायकों ने समाज के सभी वर्गों को जोड़कर अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया।

5. समकालीन समाज के समक्ष समरसता की चुनौतियाँ:

  • जातिवाद एवं सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों और वोट-बैंक की राजनीति हेतु सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देना।
  • सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचार व घृणा (Hate Speech): डिजिटल मंचों पर कट्टरता और विद्वेष फैलाने वाले तत्वों की सक्रियता।
  • आर्थिक विषमता: विकास के लाभों का असमान वितरण जिससे सामाजिक असंतोष उत्पन्न होता है।

6. सामाजिक समरसता के सुदृढ़ीकरण हेतु रणनीतिक मार्ग (आगे की राह):

  • 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' अभियान का विस्तार: विभिन्न राज्यों और संस्कृतियों के मध्य युवाओं और कलाकारों का परस्पर आदान-प्रदान।
  • सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास: बिना किसी तुष्टीकरण या भेदभाव के कल्याणकारी योजनाओं (पीएम आवास, नल से जल, आयुष्मान भारत) का शत-प्रतिशत क्रियान्वयन।
  • पाठ्यक्रमों में समाज सुधारकों का जीवन-दर्शन: स्कूलों में महात्मा ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, डॉ. अंबेडकर और संत रविदास के समरसता संदेशों का शिक्षण।
  • कानून का निष्पक्ष व कठोर पालन: सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले असामाजिक तत्वों पर बिना पक्षपात के कठोर दंडात्मक कार्रवाई।

7. निष्कर्ष:
सामाजिक समरसता भारत का कोई सामयिक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता का अमर प्राण-तत्व है। जिस प्रकार विभिन्न फूलों के एक सूत्र में बंधने से सुंदर और सुगंधित माला बनती है, उसी प्रकार विभिन्न जातियों, भाषाओं और संप्रदायों के सद्भाव से ही अखंड और समर्थ भारत का निर्माण होता है। 140 करोड़ भारतीयों की यह अटूट समरसता ही देश को 'विश्वगुरु' बनाएगी और 'विकसित भारत @2047' के महायज्ञ को पूर्ण करेगी।

हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारतीय संस्कृति और समरसता"

भारतीय संस्कृति और समरसता: दार्शनिक आधार, भक्ति-सूफी परंपरा, संवैधानिक बंधुता एवं सामाजिक समरसता का राष्ट्रीय संकल्प

"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥"
— ऋग्वेद (संज्ञान सूक्त)
(हम सब साथ-साथ चलें, एक स्वर में बात करें, हमारे मनों में समान विचार हों, जिस प्रकार प्राचीन काल के प्रबुद्ध जन मिलकर राष्ट्र की सेवा करते थे।)
"जाति-पाँति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।"
— संत रामानंद

1. प्रस्तावना एवं 'समरसता' का उदात्त मर्म:
सामाजिक समरसता भारतीय संस्कृति की प्राणवायु, उसका शाश्वत नैतिक आधार और सभ्यतागत सौंदर्य है। भारतीय चिंतन में समरसता का अर्थ केवल विभिन्न मतों का 'सह-अस्तित्व' (Co-existence) या 'सहनशीलता' (Tolerance) मात्र नहीं है, बल्कि समस्त मानव जाति में एक ही ईश्वरीय चेतना का दर्शन करते हुए परस्पर आत्मीय प्रेम, सम्मान और बंधुत्व की अनुभूति करना है। हजारों वर्षों के इतिहास में भारत ने अनेक जातियों, धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों को अपनी विशाल गोद में समेटकर 'अनेकता में एकता' की अनुपम सांस्कृतिक त्रिवेणी प्रवाहित की है।

2. भारतीय चिंतन में समरसता के दार्शनिक एवं ऐतिहासिक आधार:

  • अद्वैत दर्शन एवं उपनिषदीय एकात्मता: ईशावास्योपनिषद् का उद्घोष "ईशा वास्यमिदं सर्वम्" स्पष्ट करता है कि संपूर्ण चराचर जगत में एक ही परमात्मा का वास है। जब प्रत्येक व्यक्ति में एक ही आत्म-तत्व विद्यमान है, तो जाति, वर्ण या जन्म के आधार पर भेदभाव करना सबसे बड़ा नैतिक और आध्यात्मिक अपराध है।
  • भक्ति एवं सूफी आंदोलन की समरसता क्रांति:
    • संत कवियों ने सामाजिक रूढ़ियों पर कड़ा प्रहार किया: संत कबीर ने बाह्याडंबरों को नकारा, संत रविदास ने जाति-विहीन और शोषण-मुक्त आदर्श समाज 'बेगमपुरा' की कल्पना की, तथा गुरु नानक देव जी ने 'पंगत' (एक साथ भोजन) और 'लंगर' की स्थापना कर ऊंच-नीच के भेद को मिटा दिया।
    • सूफी संतों (निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो) ने 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' का बीजारोपण कर हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय को प्रगाढ़ किया।
  • सर्वधर्म समभाव: ऋग्वेद का आदर्श "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (सत्य एक है, ज्ञानी उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं) भारत को विश्व का सबसे सहिष्णु राष्ट्र बनाता है।

3. भारतीय संविधान में सामाजिक समरसता एवं बंधुता:

  • प्रस्तावना में 'बंधुत्व' (Fraternity) का संकल्प: व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने वाले बंधुत्व को संविधान का आधारस्तंभ बनाना।
  • संवैधानिक प्रावधान:
    1. अनुच्छेद 14 व 15: विधि के समक्ष समानता तथा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का पूर्ण प्रतिषेध।
    2. अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता (छुआछूत) का समूल उन्मूलन और इसे दंडनीय अपराध घोषित करना।
    3. अनुच्छेद 25 से 28: धार्मिक स्वतंत्रता एवं अंतःकरण की स्वतंत्रता।
  • डॉ. बी.आर. अंबेडकर का दृष्टिकोण: उन्होंने स्पष्ट किया था कि जब तक राजनीतिक लोकतंत्र के नीचे सामाजिक लोकतंत्र (स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व) की मजबूत नींव नहीं होगी, तब तक देश अखंड नहीं रह सकता।

4. मध्य प्रदेश: समरसता और सांस्कृतिक समन्वय की पावन धरा:
मध्य प्रदेश देश के सांस्कृतिक सद्भाव का प्रत्यक्ष प्रतीक रहा है:

  • साँची और विदिशा का संगम: बौद्ध स्तूप, जैन तीर्थ और हिंदू मंदिर (उदयगिरि) सदियों से एक ही क्षेत्र में शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व के साक्षी हैं।
  • ग्वालियर का तानसेन समारोह: भारतीय शास्त्रीय संगीत की वह परंपरा जो जाति और धर्म के बंधनों को तोड़कर सभी को सुरों के एक तार में पिरोती है।
  • निमाड़ के संत सिंगाजी एवं लोक संस्कृति: कबीरपंथी परंपरा और लोक गायन में सभी वर्गों की समान सहभागिता।
  • जनजातीय गौरव: रानी दुर्गावती और टंट्या भील जैसे जननायकों ने समाज के सभी वर्गों को जोड़कर अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया।

5. समकालीन समाज के समक्ष समरसता की चुनौतियाँ:

  • जातिवाद एवं सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों और वोट-बैंक की राजनीति हेतु सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देना।
  • सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचार व घृणा (Hate Speech): डिजिटल मंचों पर कट्टरता और विद्वेष फैलाने वाले तत्वों की सक्रियता।
  • आर्थिक विषमता: विकास के लाभों का असमान वितरण जिससे सामाजिक असंतोष उत्पन्न होता है।

6. सामाजिक समरसता के सुदृढ़ीकरण हेतु रणनीतिक मार्ग (आगे की राह):

  • 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' अभियान का विस्तार: विभिन्न राज्यों और संस्कृतियों के मध्य युवाओं और कलाकारों का परस्पर आदान-प्रदान।
  • सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास: बिना किसी तुष्टीकरण या भेदभाव के कल्याणकारी योजनाओं (पीएम आवास, नल से जल, आयुष्मान भारत) का शत-प्रतिशत क्रियान्वयन।
  • पाठ्यक्रमों में समाज सुधारकों का जीवन-दर्शन: स्कूलों में महात्मा ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, डॉ. अंबेडकर और संत रविदास के समरसता संदेशों का शिक्षण।
  • कानून का निष्पक्ष व कठोर पालन: सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले असामाजिक तत्वों पर बिना पक्षपात के कठोर दंडात्मक कार्रवाई।

7. निष्कर्ष:
सामाजिक समरसता भारत का कोई सामयिक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता का अमर प्राण-तत्व है। जिस प्रकार विभिन्न फूलों के एक सूत्र में बंधने से सुंदर और सुगंधित माला बनती है, उसी प्रकार विभिन्न जातियों, भाषाओं और संप्रदायों के सद्भाव से ही अखंड और समर्थ भारत का निर्माण होता है। 140 करोड़ भारतीयों की यह अटूट समरसता ही देश को 'विश्वगुरु' बनाएगी और 'विकसित भारत @2047' के महायज्ञ को पूर्ण करेगी।

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