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निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "हिन्दी भाषा और राष्ट्रबोध"

201950M
Model Answer

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

हिन्दी भाषा और राष्ट्रबोध: स्वाधीनता संग्राम में जन-जागरण, भाषाई संघवाद, उच्च शिक्षा में क्रांति एवं वैश्विक परिदृश्य

"निज भाषा उन्नति लहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥"
— भारतेंदु हरिश्चंद्र
"हिंदी के बिना मैं देश को गूंगा मानता हूँ; यह वह पवित्र सूत्र है जो भारत के करोड़ों हृदयों को एक धड़कन में पिरोता है।" — महात्मा गांधी

1. प्रस्तावना एवं 'राष्ट्रबोध' की अवधारणा:
भाषा केवल विचार-विनिमय का साधन मात्र नहीं होती, बल्कि वह किसी भी राष्ट्र की आत्मा, उसकी ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वाभिमान का सबसे जीवंत संवाहक होती है। 'राष्ट्रबोध' से आशय किसी देश के नागरिकों के मन में अपनी मातृभूमि की संप्रभुता, अखंडता, सांस्कृतिक गौरव और साझा भविष्य के प्रति गहरी निष्ठा और समर्पण की भावना से है। भारत जैसे विशाल, बहुभाषी और बहु-सांस्कृतिक देश में हिंदी भाषा ने युगों-युगों से एक ऐसी राष्ट्रीय संपर्क-भाषा (Bridge Language) की भूमिका निभाई है, जिसने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक राष्ट्रबोध की अखंड ज्योति को प्रज्वलित रखा है।

2. स्वाधीनता संग्राम में हिंदी: राष्ट्रबोध की संजीवनी:

  • अहिंदी भाषी महापुरुषों का ऐतिहासिक योगदान:
    हिंदी को राष्ट्र की संपर्क भाषा बनाने का सर्वाधिक पुरजोर समर्थन अहिंदी भाषी प्रांतों के मनीषियों ने किया:
    • स्वामी दयानंद सरस्वती (गुजरात): मूलतः गुजराती होते हुए भी उन्होंने देश में राष्ट्रीय चेतना जगाने हेतु अपना अमर ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' हिंदी में रचा।
    • महात्मा गांधी: उन्होंने 1918 में मद्रास में 'दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' की स्थापना की और स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है जब तक कि मानसिक व भाषाई दासता समाप्त न हो।
    • नेताजी सुभाष चंद्र बोस एवं लोकमान्य तिलक: आजाद हिंद फौज में 'कदम-कदम बढ़ाए जा' का तराना हिंदी-उर्दू (हिंदुस्तानी) में गूंजवाया तथा तिलक ने 'मराठा' और 'केसरी' के माध्यम से हिंदी को संपर्क भाषा बनाने का आह्वान किया।
  • राष्ट्रीय पत्रकारिता की क्रांति:
    पं. माधवराव सप्रे का 'छत्तीसगढ़ मित्र', गणेश शंकर विद्यार्थी का 'प्रताप' और बाबूराव विष्णु पराड़कर का 'आज' जैसे समाचार पत्रों ने पराधीन भारत में स्वतंत्रता की अलख जगाई।

3. संवैधानिक स्थिति एवं भाषाई संघवाद:

  • अनुच्छेद 343(1): देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को संघ की 'राजभाषा' (Official Language) घोषित करता है।
  • अनुच्छेद 351 (संवैधानिक दायित्व): संघ का यह पावन कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह हिंदी का प्रसार बढ़ाए, ताकि यह भारत की सामासिक संस्कृति (Composite Culture) के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके तथा संस्कृत व अन्य भारतीय भाषाओं से समृद्ध हो।
  • समस्त भारतीय भाषाओं की 'बड़ी बहन': हिंदी तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला, मराठी, गुजराती आदि किसी भी भारतीय भाषा की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उनकी 'बड़ी बहन' और सहयोगी सहचरी है।

4. मध्य प्रदेश: उच्च शिक्षा में हिंदी का ऐतिहासिक ध्वजवाहक:
मध्य प्रदेश ने देश में अंग्रेजी की औपनिवेशिक मानसिकता को तोड़ते हुए ऐतिहासिक नेतृत्व दिया है:

  • देश में पहली बार मेडिकल (MBBS) एवं इंजीनियरिंग (B.Tech) की पढ़ाई हिंदी में: 'मंदार' परियोजना के तहत मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बना जिसने चिकित्सा शिक्षा की पाठ्यपुस्तकें हिंदी में तैयार कर ग्रामीण व गैर-अंग्रेजी माध्यम के छात्रों हेतु उच्च शिक्षा के द्वार खोले।
  • अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय (भोपाल): हिंदी में शोध और तकनीकी शब्दावली के विकास हेतु समर्पित राज्य विश्वविद्यालय।

5. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) एवं डिजिटल क्रांति:

  • मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा: NEP 2020 ने मैकाले की भाषा नीति को नकारते हुए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षण को अनिवार्य बनाया है।
  • इंटरनेट पर हिंदी का अभूतपूर्व उभार: डिजिटल क्रांति ने हिंदी को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती इंटरनेट भाषा बना दिया है। 'भाषिणी' (Bhashini) AI अनुवाद मंच भारत की सभी भाषाओं को एक-दूसरे से जोड़ रहा है।
  • वैश्विक मंच पर हिंदी की गूंज: विश्व हिंदी सम्मेलनों तथा संयुक्त राष्ट्र में हिंदी के आधिकारिक उपयोग की बढ़ती मांग।

6. चुनौतियाँ एवं भाषाई स्वाभिमान की पुनर्प्रतिष्ठा (आगे की राह):

  • मानसिक दासता से मुक्ति: केवल अंग्रेजी बोलने को ही विद्वता मानने की औपनिवेशिक कुंठा को समाप्त करना।
  • सरल एवं व्यावहारिक शब्दावली: न्यायालयों, चिकित्सालयों और विज्ञान में हिंदी की सरल व सुबोध शब्दावली का प्रयोग।

7. निष्कर्ष:
हिंदी भारत की धड़कन, उसकी अस्मिता और राष्ट्रबोध का अमर प्रतीक है। यह भारत की सांस्कृतिक विविधता को एकता के सूत्र में बांधने वाली स्वर्णिम कड़ी है। जब देशवासी अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा पर गर्व करेंगे (*विरासत पर गर्व*), तभी भारत औपनिवेशिक मानसिक दासता से पूर्णतः मुक्त होकर आत्म-विश्वास के साथ 'विश्वगुरु' बनेगा और 'विकसित भारत @2047' का स्वप्न साकार होगा।

हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "हिन्दी भाषा और राष्ट्रबोध"

हिन्दी भाषा और राष्ट्रबोध: स्वाधीनता संग्राम में जन-जागरण, भाषाई संघवाद, उच्च शिक्षा में क्रांति एवं वैश्विक परिदृश्य

"निज भाषा उन्नति लहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥"
— भारतेंदु हरिश्चंद्र
"हिंदी के बिना मैं देश को गूंगा मानता हूँ; यह वह पवित्र सूत्र है जो भारत के करोड़ों हृदयों को एक धड़कन में पिरोता है।" — महात्मा गांधी

1. प्रस्तावना एवं 'राष्ट्रबोध' की अवधारणा:
भाषा केवल विचार-विनिमय का साधन मात्र नहीं होती, बल्कि वह किसी भी राष्ट्र की आत्मा, उसकी ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वाभिमान का सबसे जीवंत संवाहक होती है। 'राष्ट्रबोध' से आशय किसी देश के नागरिकों के मन में अपनी मातृभूमि की संप्रभुता, अखंडता, सांस्कृतिक गौरव और साझा भविष्य के प्रति गहरी निष्ठा और समर्पण की भावना से है। भारत जैसे विशाल, बहुभाषी और बहु-सांस्कृतिक देश में हिंदी भाषा ने युगों-युगों से एक ऐसी राष्ट्रीय संपर्क-भाषा (Bridge Language) की भूमिका निभाई है, जिसने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक राष्ट्रबोध की अखंड ज्योति को प्रज्वलित रखा है।

2. स्वाधीनता संग्राम में हिंदी: राष्ट्रबोध की संजीवनी:

  • अहिंदी भाषी महापुरुषों का ऐतिहासिक योगदान:
    हिंदी को राष्ट्र की संपर्क भाषा बनाने का सर्वाधिक पुरजोर समर्थन अहिंदी भाषी प्रांतों के मनीषियों ने किया:
    • स्वामी दयानंद सरस्वती (गुजरात): मूलतः गुजराती होते हुए भी उन्होंने देश में राष्ट्रीय चेतना जगाने हेतु अपना अमर ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' हिंदी में रचा।
    • महात्मा गांधी: उन्होंने 1918 में मद्रास में 'दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' की स्थापना की और स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है जब तक कि मानसिक व भाषाई दासता समाप्त न हो।
    • नेताजी सुभाष चंद्र बोस एवं लोकमान्य तिलक: आजाद हिंद फौज में 'कदम-कदम बढ़ाए जा' का तराना हिंदी-उर्दू (हिंदुस्तानी) में गूंजवाया तथा तिलक ने 'मराठा' और 'केसरी' के माध्यम से हिंदी को संपर्क भाषा बनाने का आह्वान किया।
  • राष्ट्रीय पत्रकारिता की क्रांति:
    पं. माधवराव सप्रे का 'छत्तीसगढ़ मित्र', गणेश शंकर विद्यार्थी का 'प्रताप' और बाबूराव विष्णु पराड़कर का 'आज' जैसे समाचार पत्रों ने पराधीन भारत में स्वतंत्रता की अलख जगाई।

3. संवैधानिक स्थिति एवं भाषाई संघवाद:

  • अनुच्छेद 343(1): देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को संघ की 'राजभाषा' (Official Language) घोषित करता है।
  • अनुच्छेद 351 (संवैधानिक दायित्व): संघ का यह पावन कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह हिंदी का प्रसार बढ़ाए, ताकि यह भारत की सामासिक संस्कृति (Composite Culture) के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके तथा संस्कृत व अन्य भारतीय भाषाओं से समृद्ध हो।
  • समस्त भारतीय भाषाओं की 'बड़ी बहन': हिंदी तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला, मराठी, गुजराती आदि किसी भी भारतीय भाषा की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उनकी 'बड़ी बहन' और सहयोगी सहचरी है।

4. मध्य प्रदेश: उच्च शिक्षा में हिंदी का ऐतिहासिक ध्वजवाहक:
मध्य प्रदेश ने देश में अंग्रेजी की औपनिवेशिक मानसिकता को तोड़ते हुए ऐतिहासिक नेतृत्व दिया है:

  • देश में पहली बार मेडिकल (MBBS) एवं इंजीनियरिंग (B.Tech) की पढ़ाई हिंदी में: 'मंदार' परियोजना के तहत मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बना जिसने चिकित्सा शिक्षा की पाठ्यपुस्तकें हिंदी में तैयार कर ग्रामीण व गैर-अंग्रेजी माध्यम के छात्रों हेतु उच्च शिक्षा के द्वार खोले।
  • अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय (भोपाल): हिंदी में शोध और तकनीकी शब्दावली के विकास हेतु समर्पित राज्य विश्वविद्यालय।

5. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) एवं डिजिटल क्रांति:

  • मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा: NEP 2020 ने मैकाले की भाषा नीति को नकारते हुए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षण को अनिवार्य बनाया है।
  • इंटरनेट पर हिंदी का अभूतपूर्व उभार: डिजिटल क्रांति ने हिंदी को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती इंटरनेट भाषा बना दिया है। 'भाषिणी' (Bhashini) AI अनुवाद मंच भारत की सभी भाषाओं को एक-दूसरे से जोड़ रहा है।
  • वैश्विक मंच पर हिंदी की गूंज: विश्व हिंदी सम्मेलनों तथा संयुक्त राष्ट्र में हिंदी के आधिकारिक उपयोग की बढ़ती मांग।

6. चुनौतियाँ एवं भाषाई स्वाभिमान की पुनर्प्रतिष्ठा (आगे की राह):

  • मानसिक दासता से मुक्ति: केवल अंग्रेजी बोलने को ही विद्वता मानने की औपनिवेशिक कुंठा को समाप्त करना।
  • सरल एवं व्यावहारिक शब्दावली: न्यायालयों, चिकित्सालयों और विज्ञान में हिंदी की सरल व सुबोध शब्दावली का प्रयोग।

7. निष्कर्ष:
हिंदी भारत की धड़कन, उसकी अस्मिता और राष्ट्रबोध का अमर प्रतीक है। यह भारत की सांस्कृतिक विविधता को एकता के सूत्र में बांधने वाली स्वर्णिम कड़ी है। जब देशवासी अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा पर गर्व करेंगे (*विरासत पर गर्व*), तभी भारत औपनिवेशिक मानसिक दासता से पूर्णतः मुक्त होकर आत्म-विश्वास के साथ 'विश्वगुरु' बनेगा और 'विकसित भारत @2047' का स्वप्न साकार होगा।

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