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निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारतीय संस्कृति के मूल आदर्श"

202050M
Model Answer

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

भारतीय संस्कृति के मूल आदर्श: सार्वभौमिक मानवता, पुरुषार्थ चतुष्टय, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता एवं वैश्विक प्रासंगिकता

"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥"
— बृहदारण्यक उपनिषद्
(सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का कल्याण हो और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।)
"यदि मुझसे पूछा जाए कि मानव मन ने जीवन की सबसे गंभीर समस्याओं पर किस आकाश के नीचे सबसे गहराई से विचार किया है, तो मैं भारत की ओर संकेत करूँगा।" — मैक्स मूलर

1. प्रस्तावना एवं सभ्यतागत शाश्वतता:
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम, समृद्धतम और सर्वाधिक समावेशी संस्कृतियों में अग्रणी है। यह किसी संकीर्ण मत, पंथ या कालखंड में बंधी हुई व्यवस्था नहीं, बल्कि युगों-युगों से प्रवाहित एक ऐसी शाश्वत जीवन-धारा (Sanatana) है जिसने अपनी मौलिकता को बनाए रखते हुए प्रत्येक युग के श्रेष्ठ विचारों को आत्मसात किया है। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर 'लोकमंगल', 'आध्यात्मिक मानवतावाद' और 'समस्त चराचर जगत के कल्याण' पर आधारित है।

2. भारतीय संस्कृति के मूल आधारस्तंभ एवं जीवन आदर्श:

  • 1. 'वसुधैव कुटुम्बकम्' एवं सर्वधर्म समभाव:
    महोपनिषद् का यह अमर उद्घोष संपूर्ण विश्व को एक ही परिवार मानता है। ऋग्वेद की यह प्रार्थना—"आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" (हमारे पास सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार आएं)—भारतीय चिंतन की वैचारिक उदारता का परिचायक है।
  • 2. पुरुषार्थ चतुष्टय (जीवन का समग्र संतुलन):
    भारतीय संस्कृति ने भौतिक सुख और आध्यात्मिक मुक्ति के मध्य अद्भुत संतुलन स्थापित किया है:
    1. धर्म: नैतिक आचरण, कर्तव्यनिष्ठा और सामाजिक व्यवस्था की आधारशिला।
    2. अर्थ: न्यायोचित व सात्विक उपायों से भौतिक संपदा का उपार्जन।
    3. काम: धर्म की मर्यादा में रहकर जीवन के सौंदर्य व सुखों का रसास्वादन।
    4. मोक्ष: मानव चेतना की सर्वोच्च आध्यात्मिक मुक्ति एवं आत्म-साक्षात्कार।
  • 3. सत्य एवं अहिंसा की सर्वोच्चता:
    मुण्डकोपनिषद् का आदर्श 'सत्यमेव जयते नानृतम्' (सत्य की ही विजय होती है) हमारा राष्ट्रीय ध्येय वाक्य है। वहीं 'अहिंसा परमो धर्मः' का संदेश केवल मनुष्यों तक सीमित न रहकर पशु-पक्षियों और पर्यावरण के प्रति भी असीम करुणा का विस्तार करता है।
  • 4. निष्काम कर्मयोग:
    श्रीमद्भगवद्गीता का अमर उपदेश—"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"—फल की आसक्ति से मुक्त होकर लोक-कल्याण हेतु कर्तव्य पथ पर निरंतर अग्रसर रहने की प्रेरणा देता है।
  • 5. पर्यावरण संरक्षण एवं प्रकृति-पूजन (पृथ्वी सूक्त):
    अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त उद्घोष करता है—"माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" (यह धरती मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ)। नदियों को 'लोकमाता' (नर्मदा, गंगा) मानकर पूजना और वृक्षों में ईश्वर देखना भारतीय संस्कृति का अनुपम पर्यावरण दर्शन है।
  • 6. अनेकता में एकता (सांस्कृतिक समन्वय):
    हजारों बोलियों, वेशभूषाओं और भौगोलिक विविधताओं के बावजूद एक अंतर्निहित सांस्कृतिक सूत्र में आबद्ध रहना।

3. मध्य प्रदेश: भारतीय सांस्कृतिक आदर्शों की जीवंत कर्मभूमि:
मध्य प्रदेश भारतीय संस्कृति के उदात्त मूल्यों का प्रत्यक्ष दर्पण है:

  • ओंकारेश्वर का 'एकात्म धाम': आदि शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन जो समस्त सृष्टि में एक ही ब्रह्म का दर्शन कराता है।
  • साँची के स्तूप: भगवान बुद्ध की करुणा, शांति और मध्यम मार्ग का वैश्विक संदेश।
  • खजुराहो के मंदिर: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संतुलन का पाषाण पर अमर उत्कीर्णन।
  • जनजातीय संस्कृति: गोंड, भील और बैगा जनजातियों का प्रकृति के साथ सहज, समरस और कृतज्ञतापूर्ण जीवन।

4. 21वीं सदी में भारतीय आदर्शों की वैश्विक प्रासंगिकता:

  • वैश्विक शांति एवं युद्धों का निवारण: युद्ध और विनाश के स्थान पर संवाद, सह-अस्तित्व (पंचशील) और अहिंसा का मार्ग।
  • जलवायु संकट का समाधान: उपभोक्तावाद के स्थान पर 'मिशन लाइफ' (Mission LiFE) के तहत प्रकृति-अनुकूल जीवन-शैली।
  • मानसिक आरोग्यता: आधुनिक तनाव और अवसाद से मुक्ति हेतु भारतीय योग और आयुर्वेद का वैश्विक विस्तार।

5. निष्कर्ष:
भारतीय संस्कृति के मूल आदर्श केवल अतीत का गौरव-गान नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की मानवता को विनाश से बचाने वाली संजीवनी हैं। जब हम अपनी इस समृद्ध विरासत पर गर्व करेंगे और इसके नैतिक मूल्यों को अपने व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन में उतारेंगे, तभी भारत 'विश्वगुरु' बनकर संपूर्ण मानवता को शांति, समरसता और समृद्धि का मार्ग दिखा सकेगा और 'विकसित भारत @2047' का स्वप्न साकार होगा।

हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारतीय संस्कृति के मूल आदर्श"

भारतीय संस्कृति के मूल आदर्श: सार्वभौमिक मानवता, पुरुषार्थ चतुष्टय, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता एवं वैश्विक प्रासंगिकता

"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥"
— बृहदारण्यक उपनिषद्
(सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का कल्याण हो और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।)
"यदि मुझसे पूछा जाए कि मानव मन ने जीवन की सबसे गंभीर समस्याओं पर किस आकाश के नीचे सबसे गहराई से विचार किया है, तो मैं भारत की ओर संकेत करूँगा।" — मैक्स मूलर

1. प्रस्तावना एवं सभ्यतागत शाश्वतता:
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम, समृद्धतम और सर्वाधिक समावेशी संस्कृतियों में अग्रणी है। यह किसी संकीर्ण मत, पंथ या कालखंड में बंधी हुई व्यवस्था नहीं, बल्कि युगों-युगों से प्रवाहित एक ऐसी शाश्वत जीवन-धारा (Sanatana) है जिसने अपनी मौलिकता को बनाए रखते हुए प्रत्येक युग के श्रेष्ठ विचारों को आत्मसात किया है। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर 'लोकमंगल', 'आध्यात्मिक मानवतावाद' और 'समस्त चराचर जगत के कल्याण' पर आधारित है।

2. भारतीय संस्कृति के मूल आधारस्तंभ एवं जीवन आदर्श:

  • 1. 'वसुधैव कुटुम्बकम्' एवं सर्वधर्म समभाव:
    महोपनिषद् का यह अमर उद्घोष संपूर्ण विश्व को एक ही परिवार मानता है। ऋग्वेद की यह प्रार्थना—"आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" (हमारे पास सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार आएं)—भारतीय चिंतन की वैचारिक उदारता का परिचायक है।
  • 2. पुरुषार्थ चतुष्टय (जीवन का समग्र संतुलन):
    भारतीय संस्कृति ने भौतिक सुख और आध्यात्मिक मुक्ति के मध्य अद्भुत संतुलन स्थापित किया है:
    1. धर्म: नैतिक आचरण, कर्तव्यनिष्ठा और सामाजिक व्यवस्था की आधारशिला।
    2. अर्थ: न्यायोचित व सात्विक उपायों से भौतिक संपदा का उपार्जन।
    3. काम: धर्म की मर्यादा में रहकर जीवन के सौंदर्य व सुखों का रसास्वादन।
    4. मोक्ष: मानव चेतना की सर्वोच्च आध्यात्मिक मुक्ति एवं आत्म-साक्षात्कार।
  • 3. सत्य एवं अहिंसा की सर्वोच्चता:
    मुण्डकोपनिषद् का आदर्श 'सत्यमेव जयते नानृतम्' (सत्य की ही विजय होती है) हमारा राष्ट्रीय ध्येय वाक्य है। वहीं 'अहिंसा परमो धर्मः' का संदेश केवल मनुष्यों तक सीमित न रहकर पशु-पक्षियों और पर्यावरण के प्रति भी असीम करुणा का विस्तार करता है।
  • 4. निष्काम कर्मयोग:
    श्रीमद्भगवद्गीता का अमर उपदेश—"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"—फल की आसक्ति से मुक्त होकर लोक-कल्याण हेतु कर्तव्य पथ पर निरंतर अग्रसर रहने की प्रेरणा देता है।
  • 5. पर्यावरण संरक्षण एवं प्रकृति-पूजन (पृथ्वी सूक्त):
    अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त उद्घोष करता है—"माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" (यह धरती मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ)। नदियों को 'लोकमाता' (नर्मदा, गंगा) मानकर पूजना और वृक्षों में ईश्वर देखना भारतीय संस्कृति का अनुपम पर्यावरण दर्शन है।
  • 6. अनेकता में एकता (सांस्कृतिक समन्वय):
    हजारों बोलियों, वेशभूषाओं और भौगोलिक विविधताओं के बावजूद एक अंतर्निहित सांस्कृतिक सूत्र में आबद्ध रहना।

3. मध्य प्रदेश: भारतीय सांस्कृतिक आदर्शों की जीवंत कर्मभूमि:
मध्य प्रदेश भारतीय संस्कृति के उदात्त मूल्यों का प्रत्यक्ष दर्पण है:

  • ओंकारेश्वर का 'एकात्म धाम': आदि शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन जो समस्त सृष्टि में एक ही ब्रह्म का दर्शन कराता है।
  • साँची के स्तूप: भगवान बुद्ध की करुणा, शांति और मध्यम मार्ग का वैश्विक संदेश।
  • खजुराहो के मंदिर: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संतुलन का पाषाण पर अमर उत्कीर्णन।
  • जनजातीय संस्कृति: गोंड, भील और बैगा जनजातियों का प्रकृति के साथ सहज, समरस और कृतज्ञतापूर्ण जीवन।

4. 21वीं सदी में भारतीय आदर्शों की वैश्विक प्रासंगिकता:

  • वैश्विक शांति एवं युद्धों का निवारण: युद्ध और विनाश के स्थान पर संवाद, सह-अस्तित्व (पंचशील) और अहिंसा का मार्ग।
  • जलवायु संकट का समाधान: उपभोक्तावाद के स्थान पर 'मिशन लाइफ' (Mission LiFE) के तहत प्रकृति-अनुकूल जीवन-शैली।
  • मानसिक आरोग्यता: आधुनिक तनाव और अवसाद से मुक्ति हेतु भारतीय योग और आयुर्वेद का वैश्विक विस्तार।

5. निष्कर्ष:
भारतीय संस्कृति के मूल आदर्श केवल अतीत का गौरव-गान नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की मानवता को विनाश से बचाने वाली संजीवनी हैं। जब हम अपनी इस समृद्ध विरासत पर गर्व करेंगे और इसके नैतिक मूल्यों को अपने व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन में उतारेंगे, तभी भारत 'विश्वगुरु' बनकर संपूर्ण मानवता को शांति, समरसता और समृद्धि का मार्ग दिखा सकेगा और 'विकसित भारत @2047' का स्वप्न साकार होगा।

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