निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : ""स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
"स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती": सांसारिक यथार्थ, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, स्वार्थ का सामाजिक प्रभाव एवं 'परमार्थ' की उदात्त साधना
"सुर नर मुनि सब कै यह रीती।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥" — गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस)
(देवता, मनुष्य और मुनि—इस संसार में सभी का यही स्वभाव है कि अधिकांश लोग स्वार्थवश ही किसी से प्रेम या मित्रता का संबंध जोड़ते हैं।)
"तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सचहिं सुजान॥" — महाकवि रहीम
1. प्रस्तावना एवं सूक्ति का गूढ़ मर्म:
गोस्वामी तुलसीदास जी की यह अमर चौपाई मानव स्वभाव, सांसारिक संबंधों और सामाजिक मनोविज्ञान के एक अत्यंत कड़वे और यथार्थवादी सत्य को उजागर करती है। आदि-अनादि काल से सांसारिक जीवन में अधिकांश संबंध, संधियां और मित्रता किसी न किसी निहित स्वार्थ, भौतिक लाभ या मानसिक तुष्टि पर आधारित रही हैं। किन्तु भारतीय दर्शन और संत परंपरा इस स्वार्थपरता को अंतिम सत्य नहीं मानती; वह मनुष्य को स्वार्थ के संकीर्ण दायरे से ऊपर उठाकर 'परमार्थ', 'निष्काम सेवा' और 'लोकमंगल' के दिव्य धरातल पर प्रतिष्ठित होने का आह्वान करती है।
2. विभिन्न क्षेत्रों में स्वार्थपरता की यथार्थवादी अभिव्यक्ति:
- पारिवारिक एवं सामाजिक संबंध:
भौतिकवादी युग में संबंधों का आधार 'आत्मीयता' के स्थान पर 'उपयोगिता' बनता जा रहा है। "सुख के सब साथी, दुख में न कोय" की उक्ति सिद्ध करती है कि धन, पद और सामर्थ्य समाप्त होते ही तथाकथित हितैषी मुख मोड़ लेते हैं। - राजनीतिक अवसरवादिता एवं दलबदल:
सिद्धांतविहीन राजनीतिक गठबंधन, सत्ता प्राप्ति हेतु अनैतिक दलबदल तथा चुनाव जीतने हेतु तात्कालिक मुफ्तखोरी (Freebies) की राजनीति केवल व्यक्तिगत और दलीय स्वार्थ की पूर्ति का साधन बनकर रह गई है। - बाजारवाद एवं उपभोक्तावादी शोषण:
कॉर्पोरेट जगत द्वारा अधिक से अधिक लाभ (Profit Maximization) कमाने हेतु प्रकृति का अंधाधुंध दोहन, मिलावटखोरी और भ्रामक विज्ञापनों द्वारा उपभोक्ताओं का मानसिक शोषण। - अंतर्राष्ट्रीय संबंध (Realpolitik):
वैश्विक कूटनीति में लॉर्ड पामर्स्टन का यह कथन सटीक बैठता है कि—"राष्ट्रों का न कोई स्थायी मित्र होता है और न स्थायी शत्रु; केवल उनके स्थायी राष्ट्रीय स्वार्थ होते हैं।"
3. स्वार्थ से परमार्थ की ओर: भारतीय संस्कृति का उदात्त आदर्श:
सच्ची मानवता और सभ्यता का विकास इसी बात में है कि मनुष्य अपनी पाशविक स्वार्थ-वृत्ति पर विजय प्राप्त कर त्याग और सेवा का मार्ग चुने:
- रामचरितमानस में त्याग का प्रतिमान: तुलसीदास जी ने जहाँ एक ओर स्वार्थ की रीति बताई, वहीं दूसरी ओर भगवान श्री राम का सहर्ष राज-त्याग तथा भरत जी द्वारा चरण पादुकाओं को रखकर 14 वर्षों तक तपस्वी जीवन जीना स्वार्थहीन निश्छल प्रेम का सर्वोच्च शिखर प्रस्तुत करता है।
- प्रशासनिक आचरण में निःस्वार्थता (Selflessness): नोलन समिति (Nolan Committee) द्वारा लोक जीवन के 7 सिद्धांतों में 'निःस्वार्थता' को प्रथम स्थान दिया गया है, ताकि सिविल सेवक व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर केवल जनहित में निर्णय लें।
- महात्मा गांधी का 'ट्रस्टीशिप' (न्यास) सिद्धांत: धनवानों को अपनी संपत्ति का स्वामी नहीं, बल्कि समाज के निर्धनों के कल्याण हेतु 'संरक्षक' (Trustee) मानना चाहिए।
4. मध्य प्रदेश के इतिहास में निःस्वार्थ सेवा के अमर उदाहरण:
- पुण्यश्लोका राजमाता अहिल्याबाई होल्कर: मालवा की महारानी जिन्होंने राजकोष का एक भी रुपया अपने व्यक्तिगत विलास पर खर्च न कर, संपूर्ण भारत में घाटों, मंदिरों, कुओं और धर्मशालाओं का निर्माण कराया तथा स्वयं को भगवान शिव की दासी मानकर शासन किया।
- वीरांगना रानी दुर्गावती: मुगलों की विशाल सेना के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय गोंडवाना की स्वतंत्रता और स्वाभिमान हेतु रणभूमि में अपने प्राणों का उत्सर्ग किया।
- कैलाश सत्यार्थी (विदिशा): बाल श्रम की बेड़ियों में जकड़े लाखों मासूम बच्चों को मुक्त कराने हेतु अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
5. समकालीन समाज हेतु रणनीतिक संदेश (आगे की राह):
- प्रशासनिक सुशासन एवं भ्रष्टाचार-मुक्ति: स्वार्थ-प्रेरित लालफीताशाही और रिश्वतखोरी का अंत कर पारदर्शी लोक सेवा गारंटी सुनिश्चित करना।
- मूल्य-आधारित शिक्षा: प्राथमिक स्तर से ही बच्चों में त्याग, परोपकार, रक्तदान, श्रमदान और वृद्धों के सम्मान के संस्कार डालना।
- 'अहं' से 'वयम्' की ओर यात्रा: व्यक्तिगत संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठकर 'हम' और संपूर्ण समाज के कल्याण का चिंतन करना।
6. निष्कर्ष:
स्वार्थ पशु-प्रवृत्ति है, जबकि निःस्वार्थ परोपकार देवत्व का लक्षण है। जब तक मनुष्य केवल अपने स्वार्थ के लिए जिएगा, समाज में संघर्ष, ईर्ष्या और अकेलापन रहेगा; किन्तु जिस दिन व्यक्ति 'स्वारथ' को 'परमार्थ' में रूपांतरित कर देगा, उसी दिन पृथ्वी पर स्वर्ग का अवतरण होगा। निःस्वार्थ कर्तव्य-चेतना और सामाजिक समरसता ही 'विकसित भारत @2047' की प्राणवायु है।
हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : ""स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।"
"स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती": सांसारिक यथार्थ, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, स्वार्थ का सामाजिक प्रभाव एवं 'परमार्थ' की उदात्त साधना
"सुर नर मुनि सब कै यह रीती।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥" — गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस)
(देवता, मनुष्य और मुनि—इस संसार में सभी का यही स्वभाव है कि अधिकांश लोग स्वार्थवश ही किसी से प्रेम या मित्रता का संबंध जोड़ते हैं।)
"तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सचहिं सुजान॥" — महाकवि रहीम
1. प्रस्तावना एवं सूक्ति का गूढ़ मर्म:
गोस्वामी तुलसीदास जी की यह अमर चौपाई मानव स्वभाव, सांसारिक संबंधों और सामाजिक मनोविज्ञान के एक अत्यंत कड़वे और यथार्थवादी सत्य को उजागर करती है। आदि-अनादि काल से सांसारिक जीवन में अधिकांश संबंध, संधियां और मित्रता किसी न किसी निहित स्वार्थ, भौतिक लाभ या मानसिक तुष्टि पर आधारित रही हैं। किन्तु भारतीय दर्शन और संत परंपरा इस स्वार्थपरता को अंतिम सत्य नहीं मानती; वह मनुष्य को स्वार्थ के संकीर्ण दायरे से ऊपर उठाकर 'परमार्थ', 'निष्काम सेवा' और 'लोकमंगल' के दिव्य धरातल पर प्रतिष्ठित होने का आह्वान करती है।
2. विभिन्न क्षेत्रों में स्वार्थपरता की यथार्थवादी अभिव्यक्ति:
- पारिवारिक एवं सामाजिक संबंध:
भौतिकवादी युग में संबंधों का आधार 'आत्मीयता' के स्थान पर 'उपयोगिता' बनता जा रहा है। "सुख के सब साथी, दुख में न कोय" की उक्ति सिद्ध करती है कि धन, पद और सामर्थ्य समाप्त होते ही तथाकथित हितैषी मुख मोड़ लेते हैं। - राजनीतिक अवसरवादिता एवं दलबदल:
सिद्धांतविहीन राजनीतिक गठबंधन, सत्ता प्राप्ति हेतु अनैतिक दलबदल तथा चुनाव जीतने हेतु तात्कालिक मुफ्तखोरी (Freebies) की राजनीति केवल व्यक्तिगत और दलीय स्वार्थ की पूर्ति का साधन बनकर रह गई है। - बाजारवाद एवं उपभोक्तावादी शोषण:
कॉर्पोरेट जगत द्वारा अधिक से अधिक लाभ (Profit Maximization) कमाने हेतु प्रकृति का अंधाधुंध दोहन, मिलावटखोरी और भ्रामक विज्ञापनों द्वारा उपभोक्ताओं का मानसिक शोषण। - अंतर्राष्ट्रीय संबंध (Realpolitik):
वैश्विक कूटनीति में लॉर्ड पामर्स्टन का यह कथन सटीक बैठता है कि—"राष्ट्रों का न कोई स्थायी मित्र होता है और न स्थायी शत्रु; केवल उनके स्थायी राष्ट्रीय स्वार्थ होते हैं।"
3. स्वार्थ से परमार्थ की ओर: भारतीय संस्कृति का उदात्त आदर्श:
सच्ची मानवता और सभ्यता का विकास इसी बात में है कि मनुष्य अपनी पाशविक स्वार्थ-वृत्ति पर विजय प्राप्त कर त्याग और सेवा का मार्ग चुने:
- रामचरितमानस में त्याग का प्रतिमान: तुलसीदास जी ने जहाँ एक ओर स्वार्थ की रीति बताई, वहीं दूसरी ओर भगवान श्री राम का सहर्ष राज-त्याग तथा भरत जी द्वारा चरण पादुकाओं को रखकर 14 वर्षों तक तपस्वी जीवन जीना स्वार्थहीन निश्छल प्रेम का सर्वोच्च शिखर प्रस्तुत करता है।
- प्रशासनिक आचरण में निःस्वार्थता (Selflessness): नोलन समिति (Nolan Committee) द्वारा लोक जीवन के 7 सिद्धांतों में 'निःस्वार्थता' को प्रथम स्थान दिया गया है, ताकि सिविल सेवक व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर केवल जनहित में निर्णय लें।
- महात्मा गांधी का 'ट्रस्टीशिप' (न्यास) सिद्धांत: धनवानों को अपनी संपत्ति का स्वामी नहीं, बल्कि समाज के निर्धनों के कल्याण हेतु 'संरक्षक' (Trustee) मानना चाहिए।
4. मध्य प्रदेश के इतिहास में निःस्वार्थ सेवा के अमर उदाहरण:
- पुण्यश्लोका राजमाता अहिल्याबाई होल्कर: मालवा की महारानी जिन्होंने राजकोष का एक भी रुपया अपने व्यक्तिगत विलास पर खर्च न कर, संपूर्ण भारत में घाटों, मंदिरों, कुओं और धर्मशालाओं का निर्माण कराया तथा स्वयं को भगवान शिव की दासी मानकर शासन किया।
- वीरांगना रानी दुर्गावती: मुगलों की विशाल सेना के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय गोंडवाना की स्वतंत्रता और स्वाभिमान हेतु रणभूमि में अपने प्राणों का उत्सर्ग किया।
- कैलाश सत्यार्थी (विदिशा): बाल श्रम की बेड़ियों में जकड़े लाखों मासूम बच्चों को मुक्त कराने हेतु अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
5. समकालीन समाज हेतु रणनीतिक संदेश (आगे की राह):
- प्रशासनिक सुशासन एवं भ्रष्टाचार-मुक्ति: स्वार्थ-प्रेरित लालफीताशाही और रिश्वतखोरी का अंत कर पारदर्शी लोक सेवा गारंटी सुनिश्चित करना।
- मूल्य-आधारित शिक्षा: प्राथमिक स्तर से ही बच्चों में त्याग, परोपकार, रक्तदान, श्रमदान और वृद्धों के सम्मान के संस्कार डालना।
- 'अहं' से 'वयम्' की ओर यात्रा: व्यक्तिगत संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठकर 'हम' और संपूर्ण समाज के कल्याण का चिंतन करना।
6. निष्कर्ष:
स्वार्थ पशु-प्रवृत्ति है, जबकि निःस्वार्थ परोपकार देवत्व का लक्षण है। जब तक मनुष्य केवल अपने स्वार्थ के लिए जिएगा, समाज में संघर्ष, ईर्ष्या और अकेलापन रहेगा; किन्तु जिस दिन व्यक्ति 'स्वारथ' को 'परमार्थ' में रूपांतरित कर देगा, उसी दिन पृथ्वी पर स्वर्ग का अवतरण होगा। निःस्वार्थ कर्तव्य-चेतना और सामाजिक समरसता ही 'विकसित भारत @2047' की प्राणवायु है।