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निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "वाचिक साहित्य"

202050M
Model Answer

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

वाचिक साहित्य: लोक-चेतना की अमर धरोहर, वाचिक परंपरा, भाषाई वैविध्य एवं मध्य प्रदेश का समृद्ध सांस्कृतिक वैभव

"लोकगीत किसी संस्कृति का जीता-जागता संगीत और उसकी आत्मा का निश्छल स्पंदन हैं; जहाँ लिपि मौन हो जाती है, वहाँ वाचिक साहित्य युगों की गाथा गाता है।" — देवेन्द्र सत्यार्थी
"श्रुति और स्मृति की वाचिक धारा ही भारतीय संस्कृति का मूल उद्गम है।"

1. प्रस्तावना एवं वाचिक साहित्य की अवधारणा:
वाचिक (मौखिक) साहित्य मानव समाज की वह जीवंत और अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है, जो बिना किसी लिखित लिपि के केवल कंठ-स्वर, स्मृति और श्रवण परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सदियों से प्रवाहित होती चली आ रही है। भारत में वाचिक साहित्य लिखित साहित्य का कोई गौण या अपरिपक्व रूप नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल जननी है। हमारे सर्वोच्च ग्रंथ 'वेद' भी सहस्रों वर्षों तक 'श्रुति' (सुनना) और 'स्मृति' (स्मरण रखना) के रूप में वाचिक परंपरा द्वारा ही अक्षुण्ण संरक्षित रहे।

2. वाचिक साहित्य के विविध एवं समृद्ध रूप (विधाएं):

  • 1. लोक-गाथाएँ एवं लोक-महाकाव्य (वीरगाथाएँ):
    बुंदेलखंड का विश्व-प्रसिद्ध 'आल्हा-खंड' (जगनेक कृत आल्हा-ऊदल के 52 युद्धों की ओजस्वी वीरगाथा जो वर्षा ऋतु में गाई जाती है), तथा छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश का 'पंडवानी' (तीजन बाई द्वारा प्रसिद्ध महाभारत की वाचिक प्रस्तुति)।
  • 2. संस्कार एवं ऋतुपरक लोकगीत:
    मानव जीवन के 16 संस्कारों से जुड़े मधुर गीत—सोहर (संतान जन्म पर), बन्ना-बन्नी / विदा गीत (विवाह के अवसर पर), तथा ऋतुओं के उल्लास को प्रकट करने वाले फाग (होली पर), कजरी, चैती एवं बारहमासा।
  • 3. लोककथाएँ एवं आख्यान:
    पीढ़ी-दर-पीढ़ी दादी-नानी द्वारा सुनाई जाने वाली नीतिपरक कहानियाँ, उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के न्याय की कथाएँ, पंचतंत्र की मूल मौखिक कथाएँ तथा गोंड जनजाति की 'बड़ा देव' सृष्टि उत्पत्ति कथाएँ।
  • 4. कहावतें, मुहावरे एवं पहेलियाँ (बुझौवल):
    ग्रामीण जीवन के सदियों के व्यावहारिक अनुभवों का सार। जैसे मौसम विज्ञान संबंधी 'घाघ और भड्डरी की कहावतें' (जैसे—"जब बरसेगा उत्तरा, नाज न खाए कुत्तरा" - अर्थात उत्तम फसल होना)।
  • 5. लोक-नाट्यों की वाचिक परंपरा:
    मालवा का माच, बुंदेलखंड का स्वांग, निमाड़ का गम्मत तथा बघेलखंड का रहस, जिनमें पात्र तात्कालिक वाचिक संवादों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते हैं।

3. मध्य प्रदेश की वाचिक संपदा: अंचलों का अनुपम लोक-वैभव:
मध्य प्रदेश देश का सर्वाधिक लोक-सांस्कृतिक वैविध्य वाला हृदय-प्रदेश है:

  • बुंदेलखंड अंचल: आल्हा गायन, ईसुरी की चौकड़िया फागें (ईसुरी के फाग), हरदौल की मनौती के गीत तथा दिवारी गायन।
  • मालवा अंचल: चिंकारा वाद्य पर राजा भरथरी व गोपीचंद के वैराग्य का भरथरी गायन, पशुपालकों का हीड़ गायन, संजा गीत तथा बरसाती बारसा।
  • निमाड़ अंचल: निर्गुणी संत सिंगाजी के आध्यात्मिक पद, तथा अखाड़ा परंपरा पर आधारित कलगी-तुर्रा की शास्त्रीय वाचिक प्रतिस्पर्धा।
  • बघेलखंड अंचल: हरबोले (बसदेवा) द्वारा सारंगी पर श्रवण कुमार की गाथा का बसदेवा गायन, तथा विरह व प्रेम से परिपूर्ण बिदेसिया व बिरहा गायन।
  • जनजातीय वाचिक निधि: परधान गायकों द्वारा बाना वाद्य पर गोंडी लोक-गाथाओं का गायन, भील जनजाति के रेलो गीत एवं बैगाओं के करमा गीत।

4. वाचिक साहित्य का सामाजिक एवं मानवीय महत्व:

  • ज्ञान का लोकतंत्रीकरण: यह बिना किसी औपचारिक विद्यालयी शिक्षा के समाज के अंतिम, निर्धन और निरक्षर व्यक्ति को भी ज्ञान, नीति और मनोरंजन से संपन्न बनाता है।
  • पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान का संरक्षण: जड़ी-बूटियों, वर्षा चक्र, जैव-विविधता और प्रकृति संरक्षण के ज्ञान को सुरक्षित रखना।
  • सामाजिक समरसता एवं अपनत्व: सामूहिक लोकगीत और चौपालों पर कथा-श्रवण से सामाजिक जुड़ाव और बंधुत्व प्रगाढ़ होता है।

5. आधुनिक संकट एवं संरक्षण के उपाय (आगे की राह):

  • संकट: स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में पारिवारिक संवाद का ह्रास, स्थानीय बोलियों (निमाड़ी, बघेली, मालवी, गोंडी) के प्रति हीनता का भाव, तथा पारंपरिक लोक गायकों का अभाव।
  • संरक्षण हेतु रणनीतिक कदम:
    • मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग एवं आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी (भोपाल) द्वारा लुप्तप्राय वाचिक परंपराओं का डिजिटल ऑडियो-वीडियो प्रलेखन।
    • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत प्राथमिक पाठ्यक्रमों में क्षेत्रीय वाचिक लोककथाओं और पहेलियों का अनिवार्य समावेश।
    • लोक कलाकारों को वित्तीय संरक्षण और पेंशन प्रदान कर युवा पीढ़ी को लोक गायन हेतु प्रेरित करना।

6. निष्कर्ष:
वाचिक साहित्य भारतीय जनमानस के हृदय का स्पंदन और हमारी सांस्कृतिक पहचान की जड़ है। यदि लिखित साहित्य वृक्ष के पत्ते और फूल हैं, तो वाचिक साहित्य उस वृक्ष को जीवन देने वाली भूमिगत जड़ें हैं। अपनी इस वाचिक विरासत का संरक्षण और संवर्धन कर ही भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहकर गर्व के साथ 'विकसित भारत @2047' का निर्माण कर सकता है।

हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "वाचिक साहित्य"

वाचिक साहित्य: लोक-चेतना की अमर धरोहर, वाचिक परंपरा, भाषाई वैविध्य एवं मध्य प्रदेश का समृद्ध सांस्कृतिक वैभव

"लोकगीत किसी संस्कृति का जीता-जागता संगीत और उसकी आत्मा का निश्छल स्पंदन हैं; जहाँ लिपि मौन हो जाती है, वहाँ वाचिक साहित्य युगों की गाथा गाता है।" — देवेन्द्र सत्यार्थी
"श्रुति और स्मृति की वाचिक धारा ही भारतीय संस्कृति का मूल उद्गम है।"

1. प्रस्तावना एवं वाचिक साहित्य की अवधारणा:
वाचिक (मौखिक) साहित्य मानव समाज की वह जीवंत और अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है, जो बिना किसी लिखित लिपि के केवल कंठ-स्वर, स्मृति और श्रवण परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सदियों से प्रवाहित होती चली आ रही है। भारत में वाचिक साहित्य लिखित साहित्य का कोई गौण या अपरिपक्व रूप नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल जननी है। हमारे सर्वोच्च ग्रंथ 'वेद' भी सहस्रों वर्षों तक 'श्रुति' (सुनना) और 'स्मृति' (स्मरण रखना) के रूप में वाचिक परंपरा द्वारा ही अक्षुण्ण संरक्षित रहे।

2. वाचिक साहित्य के विविध एवं समृद्ध रूप (विधाएं):

  • 1. लोक-गाथाएँ एवं लोक-महाकाव्य (वीरगाथाएँ):
    बुंदेलखंड का विश्व-प्रसिद्ध 'आल्हा-खंड' (जगनेक कृत आल्हा-ऊदल के 52 युद्धों की ओजस्वी वीरगाथा जो वर्षा ऋतु में गाई जाती है), तथा छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश का 'पंडवानी' (तीजन बाई द्वारा प्रसिद्ध महाभारत की वाचिक प्रस्तुति)।
  • 2. संस्कार एवं ऋतुपरक लोकगीत:
    मानव जीवन के 16 संस्कारों से जुड़े मधुर गीत—सोहर (संतान जन्म पर), बन्ना-बन्नी / विदा गीत (विवाह के अवसर पर), तथा ऋतुओं के उल्लास को प्रकट करने वाले फाग (होली पर), कजरी, चैती एवं बारहमासा।
  • 3. लोककथाएँ एवं आख्यान:
    पीढ़ी-दर-पीढ़ी दादी-नानी द्वारा सुनाई जाने वाली नीतिपरक कहानियाँ, उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के न्याय की कथाएँ, पंचतंत्र की मूल मौखिक कथाएँ तथा गोंड जनजाति की 'बड़ा देव' सृष्टि उत्पत्ति कथाएँ।
  • 4. कहावतें, मुहावरे एवं पहेलियाँ (बुझौवल):
    ग्रामीण जीवन के सदियों के व्यावहारिक अनुभवों का सार। जैसे मौसम विज्ञान संबंधी 'घाघ और भड्डरी की कहावतें' (जैसे—"जब बरसेगा उत्तरा, नाज न खाए कुत्तरा" - अर्थात उत्तम फसल होना)।
  • 5. लोक-नाट्यों की वाचिक परंपरा:
    मालवा का माच, बुंदेलखंड का स्वांग, निमाड़ का गम्मत तथा बघेलखंड का रहस, जिनमें पात्र तात्कालिक वाचिक संवादों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते हैं।

3. मध्य प्रदेश की वाचिक संपदा: अंचलों का अनुपम लोक-वैभव:
मध्य प्रदेश देश का सर्वाधिक लोक-सांस्कृतिक वैविध्य वाला हृदय-प्रदेश है:

  • बुंदेलखंड अंचल: आल्हा गायन, ईसुरी की चौकड़िया फागें (ईसुरी के फाग), हरदौल की मनौती के गीत तथा दिवारी गायन।
  • मालवा अंचल: चिंकारा वाद्य पर राजा भरथरी व गोपीचंद के वैराग्य का भरथरी गायन, पशुपालकों का हीड़ गायन, संजा गीत तथा बरसाती बारसा।
  • निमाड़ अंचल: निर्गुणी संत सिंगाजी के आध्यात्मिक पद, तथा अखाड़ा परंपरा पर आधारित कलगी-तुर्रा की शास्त्रीय वाचिक प्रतिस्पर्धा।
  • बघेलखंड अंचल: हरबोले (बसदेवा) द्वारा सारंगी पर श्रवण कुमार की गाथा का बसदेवा गायन, तथा विरह व प्रेम से परिपूर्ण बिदेसिया व बिरहा गायन।
  • जनजातीय वाचिक निधि: परधान गायकों द्वारा बाना वाद्य पर गोंडी लोक-गाथाओं का गायन, भील जनजाति के रेलो गीत एवं बैगाओं के करमा गीत।

4. वाचिक साहित्य का सामाजिक एवं मानवीय महत्व:

  • ज्ञान का लोकतंत्रीकरण: यह बिना किसी औपचारिक विद्यालयी शिक्षा के समाज के अंतिम, निर्धन और निरक्षर व्यक्ति को भी ज्ञान, नीति और मनोरंजन से संपन्न बनाता है।
  • पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान का संरक्षण: जड़ी-बूटियों, वर्षा चक्र, जैव-विविधता और प्रकृति संरक्षण के ज्ञान को सुरक्षित रखना।
  • सामाजिक समरसता एवं अपनत्व: सामूहिक लोकगीत और चौपालों पर कथा-श्रवण से सामाजिक जुड़ाव और बंधुत्व प्रगाढ़ होता है।

5. आधुनिक संकट एवं संरक्षण के उपाय (आगे की राह):

  • संकट: स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में पारिवारिक संवाद का ह्रास, स्थानीय बोलियों (निमाड़ी, बघेली, मालवी, गोंडी) के प्रति हीनता का भाव, तथा पारंपरिक लोक गायकों का अभाव।
  • संरक्षण हेतु रणनीतिक कदम:
    • मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग एवं आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी (भोपाल) द्वारा लुप्तप्राय वाचिक परंपराओं का डिजिटल ऑडियो-वीडियो प्रलेखन।
    • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत प्राथमिक पाठ्यक्रमों में क्षेत्रीय वाचिक लोककथाओं और पहेलियों का अनिवार्य समावेश।
    • लोक कलाकारों को वित्तीय संरक्षण और पेंशन प्रदान कर युवा पीढ़ी को लोक गायन हेतु प्रेरित करना।

6. निष्कर्ष:
वाचिक साहित्य भारतीय जनमानस के हृदय का स्पंदन और हमारी सांस्कृतिक पहचान की जड़ है। यदि लिखित साहित्य वृक्ष के पत्ते और फूल हैं, तो वाचिक साहित्य उस वृक्ष को जीवन देने वाली भूमिगत जड़ें हैं। अपनी इस वाचिक विरासत का संरक्षण और संवर्धन कर ही भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहकर गर्व के साथ 'विकसित भारत @2047' का निर्माण कर सकता है।

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