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निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "यूक्रेन संकट और विश्व व्यवस्था"

202025M
Model Answer

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.

यूक्रेन संकट और विश्व व्यवस्था: भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण, खाद्य व ऊर्जा सुरक्षा का संकट एवं भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

"आज का युग युद्ध का युग नहीं है; संवाद, कूटनीति और संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों का सम्मान ही स्थायी वैश्विक शांति का एकमात्र मार्ग है।" — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (समरकंद एससीओ शिखर सम्मेलन)

1. प्रस्तावना एवं युगीन भू-राजनीतिक संकट:
फरवरी 2022 में रूस और यूक्रेन के मध्य प्रारंभ हुआ सैन्य संघर्ष शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद का सबसे गंभीर भू-राजनीतिक संकट है। इस युद्ध ने केवल पूर्वी यूरोप की क्षेत्रीय सुरक्षा को ही ध्वस्त नहीं किया, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात स्थापित वैश्विक व्यवस्था (Global Order), आपूर्ति शृंखलाओं और बहुपक्षीय संस्थाओं की नींव को भी हिलाकर रख दिया है। इसने विश्व को एक नए बहुध्रुवीय (Multipolar) और अनिश्चित दौर में धकेल दिया है।

2. विश्व व्यवस्था पर यूक्रेन संकट के बहुआयामी प्रभाव:

  • गुटबाजी का पुनरुत्थान एवं 'नया शीतयुद्ध' (Cold War 2.0): एक तरफ अमेरिका व नाटो (NATO) समर्थित पश्चिमी देश और दूसरी तरफ रूस-चीन की 'असीमित रणनीतिक साझेदारी' के मध्य तीखा विभाजन।
  • नाटो (NATO) का विस्तार एवं शस्त्रीकरण: दशकों से तटस्थ रहे यूरोपीय देशों (जैसे फिनलैंड और स्वीडन) का नाटो में शामिल होना तथा रक्षा बजट में अभूतपूर्व वृद्धि।
  • संयुक्त राष्ट्र (UNSC) की विफलता: सुरक्षा परिषद में वीटो पावर के दुरुपयोग के कारण शांति स्थापित करने में विफलता, जिससे यूएन में व्यापक संरचनात्मक सुधारों की मांग तेज हुई।
  • वैश्विक वित्तीय शस्त्रीकरण एवं 'डी-डॉलरीकरण' (De-Dollarization): रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों और विदेशी मुद्रा भंडार को जब्त किए जाने के बाद विश्व भर में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाकर स्थानीय मुद्राओं (रुपया-रूबल, युआन) में व्यापार का चलन बढ़ना।

3. वैश्विक आर्थिक एवं मानवीय दुष्परिणाम:

  • वैश्विक खाद्य एवं उर्वरक संकट: रूस और यूक्रेन को 'विश्व की रोटी की टोकरी' (Breadbasket of the World) कहा जाता है। युद्ध के कारण गेहूं, सूरजमुखी तेल और पोटाश उर्वरकों की आपूर्ति बाधित होने से अफ्रीका और एशिया के निर्धन देशों में भुखमरी का खतरा बढ़ा।
  • ऊर्जा संकट एवं मुद्रास्फीति: रूसी गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बढ़ीं, जिससे विश्व भर में महंगाई का संकट उत्पन्न हुआ।

4. भारत की संतुलित कूटनीति एवं 'रणनीतिक स्वायत्तता':
भारत ने इस संकट के दौरान राष्ट्रहित और वैश्विक शांति के मध्य उत्कृष्ट संतुलन साधा है:

  • 'ऑपरेशन गंगा': युद्धग्रस्त यूक्रेन से 22,000 से अधिक भारतीय छात्रों व नागरिकों की सुरक्षित व सफल स्वदेश वापसी।
  • ऊर्जा सुरक्षा का संरक्षण: पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर 140 करोड़ देशवासियों को पेट्रोल-डीजल की महंगाई से बचाना।
  • शांति और कूटनीति का पक्षधर: भारत ने सदैव संयुक्त राष्ट्र चार्टर, क्षेत्रीय अखंडता और संवाद के माध्यम से युद्ध समाप्ति की वकालत की।
  • जी-20 में ऐतिहासिक सहमति (ग्लोबल साउथ की आवाज): भारत ने अपनी जी-20 अध्यक्षता के दौरान 'नई दिल्ली घोषणा-पत्र' पर सर्वसम्मति बनाकर विश्व के पूर्वी और पश्चिमी गुटों के मध्य सेतु का कार्य किया।

5. निष्कर्ष:
यूक्रेन संकट ने यह सिद्ध कर दिया है कि 21वीं सदी में सैन्य आक्रामकता किसी समस्या का समाधान नहीं है। भारत द्वारा अपनाई गई निष्पक्ष, स्वतंत्र और मानवीय कूटनीति ने देश को एक भरोसेमंद 'विश्व मित्र' (Global Peacemaker) के रूप में स्थापित किया है। संवाद और शांति का यह भारतीय दृष्टिकोण 'विकसित भारत @2047' और एक स्थिर विश्व व्यवस्था के निर्माण का मूल आधार है।

हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "यूक्रेन संकट और विश्व व्यवस्था"

यूक्रेन संकट और विश्व व्यवस्था: भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण, खाद्य व ऊर्जा सुरक्षा का संकट एवं भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

"आज का युग युद्ध का युग नहीं है; संवाद, कूटनीति और संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों का सम्मान ही स्थायी वैश्विक शांति का एकमात्र मार्ग है।" — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (समरकंद एससीओ शिखर सम्मेलन)

1. प्रस्तावना एवं युगीन भू-राजनीतिक संकट:
फरवरी 2022 में रूस और यूक्रेन के मध्य प्रारंभ हुआ सैन्य संघर्ष शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद का सबसे गंभीर भू-राजनीतिक संकट है। इस युद्ध ने केवल पूर्वी यूरोप की क्षेत्रीय सुरक्षा को ही ध्वस्त नहीं किया, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात स्थापित वैश्विक व्यवस्था (Global Order), आपूर्ति शृंखलाओं और बहुपक्षीय संस्थाओं की नींव को भी हिलाकर रख दिया है। इसने विश्व को एक नए बहुध्रुवीय (Multipolar) और अनिश्चित दौर में धकेल दिया है।

2. विश्व व्यवस्था पर यूक्रेन संकट के बहुआयामी प्रभाव:

  • गुटबाजी का पुनरुत्थान एवं 'नया शीतयुद्ध' (Cold War 2.0): एक तरफ अमेरिका व नाटो (NATO) समर्थित पश्चिमी देश और दूसरी तरफ रूस-चीन की 'असीमित रणनीतिक साझेदारी' के मध्य तीखा विभाजन।
  • नाटो (NATO) का विस्तार एवं शस्त्रीकरण: दशकों से तटस्थ रहे यूरोपीय देशों (जैसे फिनलैंड और स्वीडन) का नाटो में शामिल होना तथा रक्षा बजट में अभूतपूर्व वृद्धि।
  • संयुक्त राष्ट्र (UNSC) की विफलता: सुरक्षा परिषद में वीटो पावर के दुरुपयोग के कारण शांति स्थापित करने में विफलता, जिससे यूएन में व्यापक संरचनात्मक सुधारों की मांग तेज हुई।
  • वैश्विक वित्तीय शस्त्रीकरण एवं 'डी-डॉलरीकरण' (De-Dollarization): रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों और विदेशी मुद्रा भंडार को जब्त किए जाने के बाद विश्व भर में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाकर स्थानीय मुद्राओं (रुपया-रूबल, युआन) में व्यापार का चलन बढ़ना।

3. वैश्विक आर्थिक एवं मानवीय दुष्परिणाम:

  • वैश्विक खाद्य एवं उर्वरक संकट: रूस और यूक्रेन को 'विश्व की रोटी की टोकरी' (Breadbasket of the World) कहा जाता है। युद्ध के कारण गेहूं, सूरजमुखी तेल और पोटाश उर्वरकों की आपूर्ति बाधित होने से अफ्रीका और एशिया के निर्धन देशों में भुखमरी का खतरा बढ़ा।
  • ऊर्जा संकट एवं मुद्रास्फीति: रूसी गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बढ़ीं, जिससे विश्व भर में महंगाई का संकट उत्पन्न हुआ।

4. भारत की संतुलित कूटनीति एवं 'रणनीतिक स्वायत्तता':
भारत ने इस संकट के दौरान राष्ट्रहित और वैश्विक शांति के मध्य उत्कृष्ट संतुलन साधा है:

  • 'ऑपरेशन गंगा': युद्धग्रस्त यूक्रेन से 22,000 से अधिक भारतीय छात्रों व नागरिकों की सुरक्षित व सफल स्वदेश वापसी।
  • ऊर्जा सुरक्षा का संरक्षण: पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर 140 करोड़ देशवासियों को पेट्रोल-डीजल की महंगाई से बचाना।
  • शांति और कूटनीति का पक्षधर: भारत ने सदैव संयुक्त राष्ट्र चार्टर, क्षेत्रीय अखंडता और संवाद के माध्यम से युद्ध समाप्ति की वकालत की।
  • जी-20 में ऐतिहासिक सहमति (ग्लोबल साउथ की आवाज): भारत ने अपनी जी-20 अध्यक्षता के दौरान 'नई दिल्ली घोषणा-पत्र' पर सर्वसम्मति बनाकर विश्व के पूर्वी और पश्चिमी गुटों के मध्य सेतु का कार्य किया।

5. निष्कर्ष:
यूक्रेन संकट ने यह सिद्ध कर दिया है कि 21वीं सदी में सैन्य आक्रामकता किसी समस्या का समाधान नहीं है। भारत द्वारा अपनाई गई निष्पक्ष, स्वतंत्र और मानवीय कूटनीति ने देश को एक भरोसेमंद 'विश्व मित्र' (Global Peacemaker) के रूप में स्थापित किया है। संवाद और शांति का यह भारतीय दृष्टिकोण 'विकसित भारत @2047' और एक स्थिर विश्व व्यवस्था के निर्माण का मूल आधार है।

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