Home›MPPSC Mains (Eng)›General Hindi & Grammar›General Hindi & Grammar›Pallavan / Expansion of Idea (5 marks)›"परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।"

"परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।"

202210M
Model Answer

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.

भाव पल्लवन (Expansion of Idea):

सूक्ति: "परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।"

पल्लवन:
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रामचरितमानस में प्रतिपादित यह उक्ति भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के सर्वोच्च नैतिक सत्य को उद्घाटित करती है। इस संसार में परोपकार से बड़ा कोई पुण्य/धर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा पहुँचाने से बड़ा कोई पाप/अधर्म नहीं है।

संसार के समस्त धार्मिक अनुष्ठान, जप-तप, तीर्थाटन और व्रत तब तक निरर्थक हैं जब तक मनुष्य के हृदय में दुखी, असहाय और निर्बल प्राणियों के प्रति करुणा और सेवा का भाव न हो। महर्षि दधीचि द्वारा अपनी अस्थियों का दान, राजा शिवि का आत्म-बलिदान और भगवान बुद्ध व ईसा मसीह की करुणा परोपकार के अमर उदाहरण हैं। प्रकृति भी हमें यही सिखाती है—वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, मेघ दूसरों के लिए बरसते हैं।

इसके विपरीत, स्वार्थवश दूसरों का शोषण करना, उन्हें मानसिक या शारीरिक कष्ट देना मनुष्यता का सबसे घिनौना पतन (अधमता) है। अतः मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि वह स्वार्थ की संकीर्ण परिधि से बाहर निकलकर 'परहित' और 'लोकमंगल' को अपने जीवन का परम ध्येय बनाए।

हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

"परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।"

भाव पल्लवन (Expansion of Idea):

सूक्ति: "परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।"

पल्लवन:
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रामचरितमानस में प्रतिपादित यह उक्ति भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के सर्वोच्च नैतिक सत्य को उद्घाटित करती है। इस संसार में परोपकार से बड़ा कोई पुण्य/धर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा पहुँचाने से बड़ा कोई पाप/अधर्म नहीं है।

संसार के समस्त धार्मिक अनुष्ठान, जप-तप, तीर्थाटन और व्रत तब तक निरर्थक हैं जब तक मनुष्य के हृदय में दुखी, असहाय और निर्बल प्राणियों के प्रति करुणा और सेवा का भाव न हो। महर्षि दधीचि द्वारा अपनी अस्थियों का दान, राजा शिवि का आत्म-बलिदान और भगवान बुद्ध व ईसा मसीह की करुणा परोपकार के अमर उदाहरण हैं। प्रकृति भी हमें यही सिखाती है—वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, मेघ दूसरों के लिए बरसते हैं।

इसके विपरीत, स्वार्थवश दूसरों का शोषण करना, उन्हें मानसिक या शारीरिक कष्ट देना मनुष्यता का सबसे घिनौना पतन (अधमता) है। अतः मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि वह स्वार्थ की संकीर्ण परिधि से बाहर निकलकर 'परहित' और 'लोकमंगल' को अपने जीवन का परम ध्येय बनाए।

See this question in context →
Free Android App

Practice Better on the StatePYQ Mobile App

⚡ Error Diary · ⏱ Timed Mains Answer Pacer · 📴 Offline Revision Vault

Get it onGoogle Play