निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "भूकंप : एक प्राकृतिक आपदा"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
भूकंप : एक प्राकृतिक आपदा — भूगर्भीय कारण, भारत की संवेदनशीलता, विनाशकारी प्रभाव एवं आपदा प्रबंधन
"भूकंप स्वयं किसी की जान नहीं लेता; बल्कि असुरक्षित भवन, घटिया निर्माण और मानवीय लापरवाही लोगों की जान लेती है।"
1. प्रस्तावना एवं भूगर्भीय क्रियाविधि:
भूकंप पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) में अचानक उत्पन्न होने वाला वह तीव्र कंपन या दोलन है, जो भूगर्भ में चट्टानों के टूटने अथवा विवर्तनिक प्लेटों (Tectonic Plates) की हलचल से संचित प्रत्यास्थ ऊर्जा (Elastic Energy) के अचानक मुक्त होने से उत्पन्न होता है। यह ऊर्जा जिस आंतरिक बिंदु से मुक्त होती है उसे 'उद्गम केंद्र' (Focus / Hypocenter) तथा इसके ठीक ऊपर भू-सतह पर स्थित बिंदु को 'अधिकेंद्र' (Epicenter) कहते हैं। भूगर्भीय तरंगों (P, S एवं L तरंगें) के माध्यम से फैलने वाले इस कंपन का मापन सिस्मोग्राफ द्वारा रिक्टर पैमाने (परिमाण) तथा मरकेली पैमाने (तीव्रता) पर किया जाता है।
2. भारत की भू-गर्भीय संवेदनशीलता एवं जोन वर्गीकरण:
भारतीय भू-भाग का लगभग 58% क्षेत्र मध्यम से लेकर अत्यंत तीव्र भूकंपीय खतरे के अंतर्गत आता है। इसका मुख्य कारण भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के नीचे निरंतर 4 से 5 सेमी प्रतिवर्ष की गति से उत्तर की ओर खिसकना (Subduction) है, जिसके कारण हिमालयी क्षेत्र में अपार भूगर्भीय तनाव संचित हो रहा है।
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने देश को चार प्रमुख भूकंपीय जोनों में विभाजित किया है:
- जोन 5 (अति-उच्च जोखिम क्षेत्र): संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड तथा गुजरात का कच्छ (भुज) क्षेत्र।
- जोन 4 (उच्च जोखिम क्षेत्र): दिल्ली-NCR, उत्तरी बिहार तथा गंगा का मैदानी क्षेत्र।
- जोन 3 (मध्यम जोखिम क्षेत्र): मध्य प्रदेश के नर्मदा-सोन भ्रंश घाटी क्षेत्र सहित अधिकांश प्रायद्वीपीय भाग।
- जोन 2 (न्यून जोखिम क्षेत्र): दक्कन का अपेक्षाकृत स्थिर पठारी भू-भाग।
3. विनाशकारी प्रभाव एवं अनुषंगी खतरे:
- अवसंरचना का विनाश: मकानों, बहुमंजिला इमारतों, पुलों, बिजली व संचार ग्रिडों का क्षण भर में मलबे में तब्दील होना।
- द्वितीयक आपदाएं: पहाड़ी इलाकों में भीषण भूस्खलन (Landslides), नदियों का मार्ग अवरुद्ध होना, मृदा द्रवीकरण (Soil Liquefaction), तथा समुद्र में उठने वाली प्रलयंकारी सुनामी।
- अपार जन-धन की क्षति: हजारों निर्दोष नागरिकों की अकाल मृत्यु, परिवारों का बेघर होना तथा आर्थिक तंत्र का पंगु होना।
4. मध्य प्रदेश के संदर्भ में भूकंप का इतिहास:
मध्य प्रदेश में 22 मई 1997 को आया 5.8 तीव्रता का जबलपुर भूकंप नर्मदा भ्रंश रेखा (Narmada Rift Fault) की सक्रियता को रेखांकित करता है, जिसने राज्य में भूकंपरोधी निर्माण के महत्व को उजागर किया।
5. समग्र आपदा प्रबंधन एवं शमन की रणनीतियाँ (आगे की राह):
- भूकंपरोधी निर्माण संहिता का कड़ाई से पालन: नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) एवं BIS मानकों के अनुसार सभी नवीन शासकीय व निजी भवनों का भूकंपरोधी (Earthquake-Resistant) निर्माण अनिवार्य करना।
- सघन भूकंपीय माइक्रोजोनेशन एवं अर्ली वार्निंग: घनी आबादी वाले शहरों की विस्तृत मैपिंग तथा सेंसर आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम (EEWS) का विस्तार।
- त्वरित राहत एवं बचाव बल: राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) तथा म.प्र. राज्य आपदा आपातकालीन प्रतिक्रिया बल (SDERF) का अत्याधुनिक खोज एवं बचाव उपकरणों से सुसज्जीकरण।
- सामुदायिक प्रशिक्षण व मॉक ड्रिल: विद्यालयों, अस्पतालों व सार्वजनिक संस्थानों में नियमित रूप से 'झुको, ढंको और पकड़ो' (Drop, Cover, Hold On) जैसी सुरक्षा तकनीकों का अभ्यास।
- सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework) का अनुपालन: आपदा उपरांत पुनर्वास में 'बेहतर पुनर्निर्माण' (Build Back Better) की नीति।
6. निष्कर्ष:
हम प्राकृतिक आपदाओं को रोक नहीं सकते, किन्तु पूर्व-तैयारी, वैज्ञानिक निर्माण तकनीकों और जन-जागरूकता के समन्वय से भूकंप के विनाशकारी प्रभाव को न्यूनतम अवश्य कर सकते हैं। सुनियोजित आपदा प्रबंधन ही मानव जीवन और राष्ट्र की सुरक्षा का सबसे सशक्त कवच है।
हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "भूकंप : एक प्राकृतिक आपदा"
भूकंप : एक प्राकृतिक आपदा — भूगर्भीय कारण, भारत की संवेदनशीलता, विनाशकारी प्रभाव एवं आपदा प्रबंधन
"भूकंप स्वयं किसी की जान नहीं लेता; बल्कि असुरक्षित भवन, घटिया निर्माण और मानवीय लापरवाही लोगों की जान लेती है।"
1. प्रस्तावना एवं भूगर्भीय क्रियाविधि:
भूकंप पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) में अचानक उत्पन्न होने वाला वह तीव्र कंपन या दोलन है, जो भूगर्भ में चट्टानों के टूटने अथवा विवर्तनिक प्लेटों (Tectonic Plates) की हलचल से संचित प्रत्यास्थ ऊर्जा (Elastic Energy) के अचानक मुक्त होने से उत्पन्न होता है। यह ऊर्जा जिस आंतरिक बिंदु से मुक्त होती है उसे 'उद्गम केंद्र' (Focus / Hypocenter) तथा इसके ठीक ऊपर भू-सतह पर स्थित बिंदु को 'अधिकेंद्र' (Epicenter) कहते हैं। भूगर्भीय तरंगों (P, S एवं L तरंगें) के माध्यम से फैलने वाले इस कंपन का मापन सिस्मोग्राफ द्वारा रिक्टर पैमाने (परिमाण) तथा मरकेली पैमाने (तीव्रता) पर किया जाता है।
2. भारत की भू-गर्भीय संवेदनशीलता एवं जोन वर्गीकरण:
भारतीय भू-भाग का लगभग 58% क्षेत्र मध्यम से लेकर अत्यंत तीव्र भूकंपीय खतरे के अंतर्गत आता है। इसका मुख्य कारण भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के नीचे निरंतर 4 से 5 सेमी प्रतिवर्ष की गति से उत्तर की ओर खिसकना (Subduction) है, जिसके कारण हिमालयी क्षेत्र में अपार भूगर्भीय तनाव संचित हो रहा है।
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने देश को चार प्रमुख भूकंपीय जोनों में विभाजित किया है:
- जोन 5 (अति-उच्च जोखिम क्षेत्र): संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड तथा गुजरात का कच्छ (भुज) क्षेत्र।
- जोन 4 (उच्च जोखिम क्षेत्र): दिल्ली-NCR, उत्तरी बिहार तथा गंगा का मैदानी क्षेत्र।
- जोन 3 (मध्यम जोखिम क्षेत्र): मध्य प्रदेश के नर्मदा-सोन भ्रंश घाटी क्षेत्र सहित अधिकांश प्रायद्वीपीय भाग।
- जोन 2 (न्यून जोखिम क्षेत्र): दक्कन का अपेक्षाकृत स्थिर पठारी भू-भाग।
3. विनाशकारी प्रभाव एवं अनुषंगी खतरे:
- अवसंरचना का विनाश: मकानों, बहुमंजिला इमारतों, पुलों, बिजली व संचार ग्रिडों का क्षण भर में मलबे में तब्दील होना।
- द्वितीयक आपदाएं: पहाड़ी इलाकों में भीषण भूस्खलन (Landslides), नदियों का मार्ग अवरुद्ध होना, मृदा द्रवीकरण (Soil Liquefaction), तथा समुद्र में उठने वाली प्रलयंकारी सुनामी।
- अपार जन-धन की क्षति: हजारों निर्दोष नागरिकों की अकाल मृत्यु, परिवारों का बेघर होना तथा आर्थिक तंत्र का पंगु होना।
4. मध्य प्रदेश के संदर्भ में भूकंप का इतिहास:
मध्य प्रदेश में 22 मई 1997 को आया 5.8 तीव्रता का जबलपुर भूकंप नर्मदा भ्रंश रेखा (Narmada Rift Fault) की सक्रियता को रेखांकित करता है, जिसने राज्य में भूकंपरोधी निर्माण के महत्व को उजागर किया।
5. समग्र आपदा प्रबंधन एवं शमन की रणनीतियाँ (आगे की राह):
- भूकंपरोधी निर्माण संहिता का कड़ाई से पालन: नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) एवं BIS मानकों के अनुसार सभी नवीन शासकीय व निजी भवनों का भूकंपरोधी (Earthquake-Resistant) निर्माण अनिवार्य करना।
- सघन भूकंपीय माइक्रोजोनेशन एवं अर्ली वार्निंग: घनी आबादी वाले शहरों की विस्तृत मैपिंग तथा सेंसर आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम (EEWS) का विस्तार।
- त्वरित राहत एवं बचाव बल: राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) तथा म.प्र. राज्य आपदा आपातकालीन प्रतिक्रिया बल (SDERF) का अत्याधुनिक खोज एवं बचाव उपकरणों से सुसज्जीकरण।
- सामुदायिक प्रशिक्षण व मॉक ड्रिल: विद्यालयों, अस्पतालों व सार्वजनिक संस्थानों में नियमित रूप से 'झुको, ढंको और पकड़ो' (Drop, Cover, Hold On) जैसी सुरक्षा तकनीकों का अभ्यास।
- सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework) का अनुपालन: आपदा उपरांत पुनर्वास में 'बेहतर पुनर्निर्माण' (Build Back Better) की नीति।
6. निष्कर्ष:
हम प्राकृतिक आपदाओं को रोक नहीं सकते, किन्तु पूर्व-तैयारी, वैज्ञानिक निर्माण तकनीकों और जन-जागरूकता के समन्वय से भूकंप के विनाशकारी प्रभाव को न्यूनतम अवश्य कर सकते हैं। सुनियोजित आपदा प्रबंधन ही मानव जीवन और राष्ट्र की सुरक्षा का सबसे सशक्त कवच है।