विज्ञान मनुष्य को सभ्यता की सीढ़ी पर चढ़ाता है और साहित्य उसे मानवता के उच्च शिखर पर।
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.
भाव पल्लवन (Expansion of Idea):
सूक्ति: "विज्ञान मनुष्य को सभ्यता की सीढ़ी पर चढ़ाता है और साहित्य उसे मानवता के उच्च शिखर पर।"
पल्लवन:
मानव जीवन के सर्वांगीण विकास में विज्ञान और साहित्य दोनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और परस्पर पूरक है। जहाँ विज्ञान भौतिक प्रगति का आधार है, वहीं साहित्य मनुष्य की आत्मिक और नैतिक चेतना का उन्नयन करता है।
विज्ञान और सभ्यता: विज्ञान तर्क, प्रयोग और अन्वेषण के बल पर मनुष्य को भौतिक सुख-सुविधाएँ, तीव्र संचार माध्यम, चिकित्सा तकनीक और उन्नत साधन प्रदान करता है। यह मनुष्य के आदिम जीवन को परिष्कृत कर उसे 'सभ्य' बनाता है और सभ्यता के विकास की सीढ़ियों पर आगे ले जाता है।
साहित्य और मानवता: किन्तु केवल भौतिक उन्नति से मनुष्य संवेदनशील नहीं बन सकता। यदि विज्ञान के पास संवेदना और नैतिक अंकुश न हो, तो वह विनाशकारी (जैसे—परमाणु अस्त्र) बन सकता है। यहाँ साहित्य की भूमिका प्रारंभ होती है। साहित्य मनुष्य के हृदय में प्रेम, करुणा, दया, भ्रातृत्व, सहानुभूति और त्याग जैसे उदात्त मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करता है। साहित्य सहृदयता का संचार कर मनुष्य को संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठाकर 'मानवता के सर्वोच्च शिखर' पर प्रतिष्ठित करता है।
अतः एक आदर्श और संतुलित समाज के निर्माण के लिए विज्ञान द्वारा प्रदत्त भौतिक सामर्थ्य और साहित्य द्वारा प्रदत्त मानवीय संवेदना—दोनों का समन्वय अपरिहार्य है।
हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
विज्ञान मनुष्य को सभ्यता की सीढ़ी पर चढ़ाता है और साहित्य उसे मानवता के उच्च शिखर पर।
भाव पल्लवन (Expansion of Idea):
सूक्ति: "विज्ञान मनुष्य को सभ्यता की सीढ़ी पर चढ़ाता है और साहित्य उसे मानवता के उच्च शिखर पर।"
पल्लवन:
मानव जीवन के सर्वांगीण विकास में विज्ञान और साहित्य दोनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और परस्पर पूरक है। जहाँ विज्ञान भौतिक प्रगति का आधार है, वहीं साहित्य मनुष्य की आत्मिक और नैतिक चेतना का उन्नयन करता है।
विज्ञान और सभ्यता: विज्ञान तर्क, प्रयोग और अन्वेषण के बल पर मनुष्य को भौतिक सुख-सुविधाएँ, तीव्र संचार माध्यम, चिकित्सा तकनीक और उन्नत साधन प्रदान करता है। यह मनुष्य के आदिम जीवन को परिष्कृत कर उसे 'सभ्य' बनाता है और सभ्यता के विकास की सीढ़ियों पर आगे ले जाता है।
साहित्य और मानवता: किन्तु केवल भौतिक उन्नति से मनुष्य संवेदनशील नहीं बन सकता। यदि विज्ञान के पास संवेदना और नैतिक अंकुश न हो, तो वह विनाशकारी (जैसे—परमाणु अस्त्र) बन सकता है। यहाँ साहित्य की भूमिका प्रारंभ होती है। साहित्य मनुष्य के हृदय में प्रेम, करुणा, दया, भ्रातृत्व, सहानुभूति और त्याग जैसे उदात्त मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करता है। साहित्य सहृदयता का संचार कर मनुष्य को संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठाकर 'मानवता के सर्वोच्च शिखर' पर प्रतिष्ठित करता है।
अतः एक आदर्श और संतुलित समाज के निर्माण के लिए विज्ञान द्वारा प्रदत्त भौतिक सामर्थ्य और साहित्य द्वारा प्रदत्त मानवीय संवेदना—दोनों का समन्वय अपरिहार्य है।