निम्नलिखित विषय पर लगभग 1000 शब्दों में निबंध लिखिए : "ग्लोबल वार्मिंग : कारण एवं परिणाम"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
ग्लोबल वार्मिंग: मानव-जनित कारण, विनाशकारी पारिस्थितिक परिणाम एवं समग्र निवारण रणनीति
"प्रकृति प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता की पूर्ति कर सकती है, किन्तु उसके लालच की नहीं।" — महात्मा गांधी
"ग्लोबल वार्मिंग का युग समाप्त हो चुका है; अब 'ग्लोबल बॉयलिंग' (वैश्विक खदबदाहट) का भयावह दौर प्रारंभ हो चुका है।" — एंटोनियो गुटेरेस, संयुक्त राष्ट्र महासचिव
1. प्रस्तावना एवं वैश्विक संकट की गंभीरता:
ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक तापन) से तात्पर्य औद्योगिक क्रांति के पश्चात मानवीय गतिविधियों के कारण पृथ्वी के औसत सतही तापमान में हो रही अभूतपूर्व एवं निरंतर वृद्धि से है। जीवाश्म ईंधनों के अनियंत्रित दोहन तथा ग्रीनहाउस गैसों—मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄), नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O), और हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs)—के वायुमंडलीय सांद्रण ने पृथ्वी के चारों ओर एक ऐसा तापीय आवरण निर्मित कर दिया है, जो परावर्तित अवरक्त किरणों (Infrared Radiation) को रोककर धरातल को तप्त कर रहा है। 'जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल' (IPCC) की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट (AR6) के अनुसार, पृथ्वी का औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगभग 1.1°C बढ़ चुका है, जो संपूर्ण जैव-मंडल को अस्तित्व के संकट की ओर धकेल रहा है।
2. ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख मानव-जनित कारण:
- जीवाश्म ईंधनों का अनियंत्रित दहन: ताप विद्युत गृहों, इस्पात कारखानों तथा पेट्रोल-डीजल वाहनों द्वारा होने वाला ऊर्जा उपभोग, जो कुल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के 75% से अधिक हेतु उत्तरदायी है।
- वनों की अंधाधुंध कटाई (Deforestation): अमेजन वर्षावनों सहित विश्व भर में कृषि और कंक्रीट के शहरीकरण हेतु वनों का विनाश, जिससे पृथ्वी के प्राकृतिक 'कार्बन सिंक' (अवशोषक) नष्ट हो रहे हैं।
- गहन कृषि एवं पशुपालन: जुगाली करने वाले मवेशियों के पाचन तंत्र से मीथेन उत्सर्जन, जलभराव वाले धान के खेत, तथा रासायनिक नाइट्रोजनी उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से निकलने वाली घातक N₂O गैस।
- अपशिष्ट प्रबंधन का अभाव व लैंडफिल्स: नगरीय ठोस कचरे के डंपिंग यार्डों में जैविक कचरे के सड़ने से भारी मात्रा में मीथेन गैस का रिसाव।
- उपभोक्तावादी जीवन-शैली: एयर कंडीशनर, प्रशीतक (Refrigerators) तथा अत्यधिक ऊर्जा-सघन विलासितापूर्ण जीवन-शैली।
3. विनाशकारी पर्यावरणीय एवं सामाजिक-आर्थिक परिणाम:
- ग्लेशियरों का पिघलना एवं समुद्र स्तर में वृद्धि: ध्रुवीय बर्फ और हिमालयी ग्लेशियरों (तीसरा ध्रुव) के द्रुत गति से पिघलने से गंगा-सिंधु बेसिन में जल संकट, तथा मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे तटीय महानगरों के जलमग्न होने का खतरा।
- चरम मौसमी घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि: भयंकर चक्रवातों (जैसे बिपरजॉय, मोचा), बेमौसम अतिवृष्टि, विनाशकारी बादलों के फटने, तथा 50°C पार करती जानलेवा लू (Heatwaves) की आवृत्ति में वृद्धि।
- कृषि एवं खाद्य सुरक्षा पर आघात: तापमान बढ़ने से गेहूं, धान व दलहन की उत्पादकता में तीव्र गिरावट, कीटों के प्रकोप में वृद्धि, तथा भू-जल स्तर का रसातल में जाना।
- जैव-विविधता का विनाश: समुद्री अम्लीकरण, प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) का विरंजन (Bleaching), तथा बदलते आवास के कारण वन्यजीव प्रजातियों का विलुप्त होना।
- जलवायु शरणार्थी संकट: तटीय व द्वीपीय क्षेत्रों से विस्थापन, तथा भारत जैसे विकासशील देशों की GDP में प्रतिवर्ष 2 से 4% तक की अनुमानित क्षति।
4. मध्य प्रदेश के पर्यावरण पर प्रभाव:
भू-आवेष्ठित राज्य होने के कारण मध्य प्रदेश पर जलवायु परिवर्तन का गहरा प्रभाव पड़ रहा है:
- दीर्घकालिक सूखा: बुंदेलखंड व बघेलखंड अंचलों में भीषण जल संकट, जिसके समाधान हेतु केन-बेतवा लिंक परियोजना व अमृत सरोवरों का निर्माण किया जा रहा है।
- अनियमित मानसूनी वर्षा: नर्मदा व चंबल नदी घाटियों में अल्प समय में अतिवृष्टि से अचानक बाढ़ (Flash Floods) की स्थिति।
- वन पारिस्थितिकी पर संकट: सतपुड़ा और विंध्याचल के घने जंगलों में सागौन और साल के वृक्षों पर सूखे व कीटों का प्रभाव।
5. वैश्विक प्रयास एवं भारत की 'पंचामृत' प्रतिबद्धता:
- अंतर्राष्ट्रीय मंच: पेरिस जलवायु समझौता (2015) जिसके तहत तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करने का लक्ष्य है; COP28 का जीवाश्म ईंधन से हरित ऊर्जा की ओर संक्रमण का आह्वान।
- भारत के 'पंचामृत' संकल्प (COP26 ग्लासगो):
- 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करना।
- 2030 तक अपनी 50% ऊर्जा आवश्यकताएं नवीकरणीय ऊर्जा से पूरी करना।
- 2030 तक कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 अरब टन की कटौती।
- 2030 तक अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता में 45% से अधिक की कमी।
- वर्ष 2070 तक 'नेट-जीरो' (शुद्ध शून्य उत्सर्जन) का लक्ष्य प्राप्त करना।
- राष्ट्रीय अभियान: अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, PM-कुसुम योजना, तथा वैश्विक स्तर पर भारत द्वारा प्रस्तुत 'मिशन लाइफ' (Mission LiFE - Lifestyle for Environment)।
- मध्य प्रदेश की हरित उपलब्धियां: रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर प्रोजेक्ट (750 MW - जो दिल्ली मेट्रो को भी बिजली देता है), ओंकारेश्वर फ्लोटिंग सोलर परियोजना (600 MW), तथा नर्मदा संरक्षण हेतु व्यापक वनीकरण।
6. रणनीतिक समाधान एवं आगे की राह:
- नवीकरणीय ऊर्जा का तीव्र विस्तार: सौर, पवन, बायोमास और ग्रीन हाइड्रोजन का बड़े पैमाने पर ग्रिड एकीकरण।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy): उद्योगों में 'कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज' (CCUS) तकनीक को अनिवार्य बनाना।
- जलवायु-अनुकूल कृषि: सूक्ष्म सिंचाई, जैविक खेती, तथा कम पानी वाली पौष्टिक मोटे अनाजों ('श्री अन्न'/मिलेट्स) की खेती को प्रोत्साहन।
- जन-भागीदारी एवं मिशन लाइफ: ऊर्जा की बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, तथा प्लास्टिक निषेध को दैनिक जीवन का अंग बनाना।
7. निष्कर्ष:
ग्लोबल वार्मिंग अब कोई भविष्य का अमूर्त खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की दहलीज पर खड़ा अस्तित्वगत संकट है। तकनीकी नवाचार, नीतिगत कठोरता और प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने वाली भारतीय जीवन-दृष्टि के समन्वय से ही हम जलवायु न्याय सुनिश्चित कर सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित, सुरक्षित और जीवंत वसुंधरा छोड़ सकते हैं।
हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
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ग्लोबल वार्मिंग: मानव-जनित कारण, विनाशकारी पारिस्थितिक परिणाम एवं समग्र निवारण रणनीति
"प्रकृति प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता की पूर्ति कर सकती है, किन्तु उसके लालच की नहीं।" — महात्मा गांधी
"ग्लोबल वार्मिंग का युग समाप्त हो चुका है; अब 'ग्लोबल बॉयलिंग' (वैश्विक खदबदाहट) का भयावह दौर प्रारंभ हो चुका है।" — एंटोनियो गुटेरेस, संयुक्त राष्ट्र महासचिव
1. प्रस्तावना एवं वैश्विक संकट की गंभीरता:
ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक तापन) से तात्पर्य औद्योगिक क्रांति के पश्चात मानवीय गतिविधियों के कारण पृथ्वी के औसत सतही तापमान में हो रही अभूतपूर्व एवं निरंतर वृद्धि से है। जीवाश्म ईंधनों के अनियंत्रित दोहन तथा ग्रीनहाउस गैसों—मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄), नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O), और हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs)—के वायुमंडलीय सांद्रण ने पृथ्वी के चारों ओर एक ऐसा तापीय आवरण निर्मित कर दिया है, जो परावर्तित अवरक्त किरणों (Infrared Radiation) को रोककर धरातल को तप्त कर रहा है। 'जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल' (IPCC) की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट (AR6) के अनुसार, पृथ्वी का औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगभग 1.1°C बढ़ चुका है, जो संपूर्ण जैव-मंडल को अस्तित्व के संकट की ओर धकेल रहा है।
2. ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख मानव-जनित कारण:
- जीवाश्म ईंधनों का अनियंत्रित दहन: ताप विद्युत गृहों, इस्पात कारखानों तथा पेट्रोल-डीजल वाहनों द्वारा होने वाला ऊर्जा उपभोग, जो कुल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के 75% से अधिक हेतु उत्तरदायी है।
- वनों की अंधाधुंध कटाई (Deforestation): अमेजन वर्षावनों सहित विश्व भर में कृषि और कंक्रीट के शहरीकरण हेतु वनों का विनाश, जिससे पृथ्वी के प्राकृतिक 'कार्बन सिंक' (अवशोषक) नष्ट हो रहे हैं।
- गहन कृषि एवं पशुपालन: जुगाली करने वाले मवेशियों के पाचन तंत्र से मीथेन उत्सर्जन, जलभराव वाले धान के खेत, तथा रासायनिक नाइट्रोजनी उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से निकलने वाली घातक N₂O गैस।
- अपशिष्ट प्रबंधन का अभाव व लैंडफिल्स: नगरीय ठोस कचरे के डंपिंग यार्डों में जैविक कचरे के सड़ने से भारी मात्रा में मीथेन गैस का रिसाव।
- उपभोक्तावादी जीवन-शैली: एयर कंडीशनर, प्रशीतक (Refrigerators) तथा अत्यधिक ऊर्जा-सघन विलासितापूर्ण जीवन-शैली।
3. विनाशकारी पर्यावरणीय एवं सामाजिक-आर्थिक परिणाम:
- ग्लेशियरों का पिघलना एवं समुद्र स्तर में वृद्धि: ध्रुवीय बर्फ और हिमालयी ग्लेशियरों (तीसरा ध्रुव) के द्रुत गति से पिघलने से गंगा-सिंधु बेसिन में जल संकट, तथा मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे तटीय महानगरों के जलमग्न होने का खतरा।
- चरम मौसमी घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि: भयंकर चक्रवातों (जैसे बिपरजॉय, मोचा), बेमौसम अतिवृष्टि, विनाशकारी बादलों के फटने, तथा 50°C पार करती जानलेवा लू (Heatwaves) की आवृत्ति में वृद्धि।
- कृषि एवं खाद्य सुरक्षा पर आघात: तापमान बढ़ने से गेहूं, धान व दलहन की उत्पादकता में तीव्र गिरावट, कीटों के प्रकोप में वृद्धि, तथा भू-जल स्तर का रसातल में जाना।
- जैव-विविधता का विनाश: समुद्री अम्लीकरण, प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) का विरंजन (Bleaching), तथा बदलते आवास के कारण वन्यजीव प्रजातियों का विलुप्त होना।
- जलवायु शरणार्थी संकट: तटीय व द्वीपीय क्षेत्रों से विस्थापन, तथा भारत जैसे विकासशील देशों की GDP में प्रतिवर्ष 2 से 4% तक की अनुमानित क्षति।
4. मध्य प्रदेश के पर्यावरण पर प्रभाव:
भू-आवेष्ठित राज्य होने के कारण मध्य प्रदेश पर जलवायु परिवर्तन का गहरा प्रभाव पड़ रहा है:
- दीर्घकालिक सूखा: बुंदेलखंड व बघेलखंड अंचलों में भीषण जल संकट, जिसके समाधान हेतु केन-बेतवा लिंक परियोजना व अमृत सरोवरों का निर्माण किया जा रहा है।
- अनियमित मानसूनी वर्षा: नर्मदा व चंबल नदी घाटियों में अल्प समय में अतिवृष्टि से अचानक बाढ़ (Flash Floods) की स्थिति।
- वन पारिस्थितिकी पर संकट: सतपुड़ा और विंध्याचल के घने जंगलों में सागौन और साल के वृक्षों पर सूखे व कीटों का प्रभाव।
5. वैश्विक प्रयास एवं भारत की 'पंचामृत' प्रतिबद्धता:
- अंतर्राष्ट्रीय मंच: पेरिस जलवायु समझौता (2015) जिसके तहत तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करने का लक्ष्य है; COP28 का जीवाश्म ईंधन से हरित ऊर्जा की ओर संक्रमण का आह्वान।
- भारत के 'पंचामृत' संकल्प (COP26 ग्लासगो):
- 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करना।
- 2030 तक अपनी 50% ऊर्जा आवश्यकताएं नवीकरणीय ऊर्जा से पूरी करना।
- 2030 तक कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 अरब टन की कटौती।
- 2030 तक अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता में 45% से अधिक की कमी।
- वर्ष 2070 तक 'नेट-जीरो' (शुद्ध शून्य उत्सर्जन) का लक्ष्य प्राप्त करना।
- राष्ट्रीय अभियान: अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, PM-कुसुम योजना, तथा वैश्विक स्तर पर भारत द्वारा प्रस्तुत 'मिशन लाइफ' (Mission LiFE - Lifestyle for Environment)।
- मध्य प्रदेश की हरित उपलब्धियां: रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर प्रोजेक्ट (750 MW - जो दिल्ली मेट्रो को भी बिजली देता है), ओंकारेश्वर फ्लोटिंग सोलर परियोजना (600 MW), तथा नर्मदा संरक्षण हेतु व्यापक वनीकरण।
6. रणनीतिक समाधान एवं आगे की राह:
- नवीकरणीय ऊर्जा का तीव्र विस्तार: सौर, पवन, बायोमास और ग्रीन हाइड्रोजन का बड़े पैमाने पर ग्रिड एकीकरण।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy): उद्योगों में 'कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज' (CCUS) तकनीक को अनिवार्य बनाना।
- जलवायु-अनुकूल कृषि: सूक्ष्म सिंचाई, जैविक खेती, तथा कम पानी वाली पौष्टिक मोटे अनाजों ('श्री अन्न'/मिलेट्स) की खेती को प्रोत्साहन।
- जन-भागीदारी एवं मिशन लाइफ: ऊर्जा की बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, तथा प्लास्टिक निषेध को दैनिक जीवन का अंग बनाना।
7. निष्कर्ष:
ग्लोबल वार्मिंग अब कोई भविष्य का अमूर्त खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की दहलीज पर खड़ा अस्तित्वगत संकट है। तकनीकी नवाचार, नीतिगत कठोरता और प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने वाली भारतीय जीवन-दृष्टि के समन्वय से ही हम जलवायु न्याय सुनिश्चित कर सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित, सुरक्षित और जीवंत वसुंधरा छोड़ सकते हैं।