Home›MPPSC Mains (Eng)›General Hindi & Grammar›General Hindi & Grammar›Rasa & Chhanda (10 marks)›निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्न का उत्तर दीजिए

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्न का उत्तर दीजिए :
"समालोचक के रूप में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने किसी नूतन शैली की उद्भावना नहीं की। पूर्व और पश्चिम के आलोचना-शास्त्रों से समन्वित कोई आलोचना सिद्धान्त नहीं लिखा, पर सामयिक पुस्तकों के भाषा-दोषों को उभार-उभार कर बतलाने का यह परिणाम हुआ कि हिन्दी लेखक परिष्कृत भाषा लिखने की ओर अधिक से अधिक प्रवृत्त हुए। भाषा की स्थिरता पर सजग प्रहरी के समान बराबर दृष्टि जमाए रहते थे। वे 'कला कला के लिए' सिद्धांत को मानने वालों में नहीं थे। जिन्होंने एक जगह लिखा है - 'मनोरंजन मात्र के लिए प्रस्तुत किये गए साहित्य में भी चरित्र गठन को हानि नहीं पहुँचनी चाहिए।' आलस्य, अनुद्योग और विलासिता को उद्बोधित करने वाला साहित्य उन्हें बिल्कुल नहीं रुचता था। इसीलिए हिन्दी में वे सात्विक साहित्यिक आदर्शवाद के प्रतिपादक माने जाते हैं, जिसका पल्लवित रूप प्रेमचंद में बहुत स्पष्टता से दिखाई देता है। आदर्शवाद के आग्रह के कारण उनके युग का साहित्य उपदेशात्मक अधिक हो गया है, जिसकी प्रतिक्रिया छायावाद-युग में दिखाई देती है।"

प्रश्न: द्विवेदी जी के विचार में साहित्य का उद्देश्य क्या है?

20243M
Model Answer

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.

उत्तर:

द्विवेदी जी के विचार में साहित्य का उद्देश्य मात्र मनोरंजन करना नहीं, अपितु चरित्र-गठन, सात्विक आदर्शों की प्रतिष्ठा तथा सामाजिक चेतना का परिष्कार करना है। वे ऐसे साहित्य के विरोधी थे जो आलस्य, अनुद्योग और विलासिता को बढ़ावा दे।

हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्न का उत्तर दीजिए :
"समालोचक के रूप में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने किसी नूतन शैली की उद्भावना नहीं की। पूर्व और पश्चिम के आलोचना-शास्त्रों से समन्वित कोई आलोचना सिद्धान्त नहीं लिखा, पर सामयिक पुस्तकों के भाषा-दोषों को उभार-उभार कर बतलाने का यह परिणाम हुआ कि हिन्दी लेखक परिष्कृत भाषा लिखने की ओर अधिक से अधिक प्रवृत्त हुए। भाषा की स्थिरता पर सजग प्रहरी के समान बराबर दृष्टि जमाए रहते थे। वे 'कला कला के लिए' सिद्धांत को मानने वालों में नहीं थे। जिन्होंने एक जगह लिखा है - 'मनोरंजन मात्र के लिए प्रस्तुत किये गए साहित्य में भी चरित्र गठन को हानि नहीं पहुँचनी चाहिए।' आलस्य, अनुद्योग और विलासिता को उद्बोधित करने वाला साहित्य उन्हें बिल्कुल नहीं रुचता था। इसीलिए हिन्दी में वे सात्विक साहित्यिक आदर्शवाद के प्रतिपादक माने जाते हैं, जिसका पल्लवित रूप प्रेमचंद में बहुत स्पष्टता से दिखाई देता है। आदर्शवाद के आग्रह के कारण उनके युग का साहित्य उपदेशात्मक अधिक हो गया है, जिसकी प्रतिक्रिया छायावाद-युग में दिखाई देती है।"

प्रश्न: द्विवेदी जी के विचार में साहित्य का उद्देश्य क्या है?

उत्तर:

द्विवेदी जी के विचार में साहित्य का उद्देश्य मात्र मनोरंजन करना नहीं, अपितु चरित्र-गठन, सात्विक आदर्शों की प्रतिष्ठा तथा सामाजिक चेतना का परिष्कार करना है। वे ऐसे साहित्य के विरोधी थे जो आलस्य, अनुद्योग और विलासिता को बढ़ावा दे।

See this question in context →
Free Android App

Practice Better on the StatePYQ Mobile App

⚡ Error Diary · ⏱ Timed Mains Answer Pacer · 📴 Offline Revision Vault

Get it onGoogle Play