निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्न का उत्तर दीजिए :
"नाटक प्राचीनकाल से ही कला जगत् में सर्वाधिक मनोरम और आकर्षक कला-माध्यम माना जाता रहा है। साहित्य के अन्तर्गत नाटक सबसे अधिक सुन्दर और आनन्ददायी विधा है जिसका भव्य आयोजन करके गुणी और मर्मज्ञ आनन्द का अनुभव करते हैं। यह मान्यता यद्यपि अत्यन्त प्राचीन है किन्तु आज भी इसकी सत्यता को चुनौती देना संभव नहीं है। नाटक के आयोजन में जो सुकुमारता और कला-सूक्ष्मता है वह आज के युग में भी सर्वश्रेष्ठ कला बनाए हुए है। नाटक का शिल्पविधान और उसकी रचना की बारीकियाँ उसे एक अप्रतिम आकर्षक का विषय बना देती हैं। सबसे प्रमुख बात तो यह है कि नाटक का शिल्पविधान एक सामूहिक विधान है जिसमें नाटककार के साथ-साथ निर्देशक तथा विभिन्न अभिनेताओं का भरपूर सहयोग प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, नाटक के इस भव्य आयोजन में हजार-हजार दर्शक समूह भी अपना महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करता है जिससे नाटक की मंच प्रस्तुति निर्बाध रूप से सम्पन्न होती है। इन सबके समवेत प्रयास तथा इन सबकी समवेत प्रतिभा के योग से ही नाटक की प्रस्तुति सम्भव होती है। यह सही है कि कला की सबसे जीवन्त और सार्थक भूमिका नाटक ही निभाता है क्योंकि वह व्यापक रूप से जनचेतना का अंग और बहुत हद तक उसका प्रतिरूप है।"
प्रश्न: नाटक की सफलता में किन का योगदान होता है?
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.
उत्तर:
नाटक की सफलता में नाटककार, निर्देशक और अभिनेताओं के साथ-साथ सभागार में उपस्थित हजारों दर्शकों के समूह (सहृदय दर्शक-वृन्द) का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है, जिनकी संवेदनात्मक सहभागिता से मंच-प्रस्तुति निर्बाध और प्रभावी बनती है।
हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्न का उत्तर दीजिए :
"नाटक प्राचीनकाल से ही कला जगत् में सर्वाधिक मनोरम और आकर्षक कला-माध्यम माना जाता रहा है। साहित्य के अन्तर्गत नाटक सबसे अधिक सुन्दर और आनन्ददायी विधा है जिसका भव्य आयोजन करके गुणी और मर्मज्ञ आनन्द का अनुभव करते हैं। यह मान्यता यद्यपि अत्यन्त प्राचीन है किन्तु आज भी इसकी सत्यता को चुनौती देना संभव नहीं है। नाटक के आयोजन में जो सुकुमारता और कला-सूक्ष्मता है वह आज के युग में भी सर्वश्रेष्ठ कला बनाए हुए है। नाटक का शिल्पविधान और उसकी रचना की बारीकियाँ उसे एक अप्रतिम आकर्षक का विषय बना देती हैं। सबसे प्रमुख बात तो यह है कि नाटक का शिल्पविधान एक सामूहिक विधान है जिसमें नाटककार के साथ-साथ निर्देशक तथा विभिन्न अभिनेताओं का भरपूर सहयोग प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, नाटक के इस भव्य आयोजन में हजार-हजार दर्शक समूह भी अपना महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करता है जिससे नाटक की मंच प्रस्तुति निर्बाध रूप से सम्पन्न होती है। इन सबके समवेत प्रयास तथा इन सबकी समवेत प्रतिभा के योग से ही नाटक की प्रस्तुति सम्भव होती है। यह सही है कि कला की सबसे जीवन्त और सार्थक भूमिका नाटक ही निभाता है क्योंकि वह व्यापक रूप से जनचेतना का अंग और बहुत हद तक उसका प्रतिरूप है।"
प्रश्न: नाटक की सफलता में किन का योगदान होता है?
उत्तर:
नाटक की सफलता में नाटककार, निर्देशक और अभिनेताओं के साथ-साथ सभागार में उपस्थित हजारों दर्शकों के समूह (सहृदय दर्शक-वृन्द) का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है, जिनकी संवेदनात्मक सहभागिता से मंच-प्रस्तुति निर्बाध और प्रभावी बनती है।