निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारत में पारिवारिक विघटन"
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 6 (Hindi Essay and Administrative Drafting / हिन्दी निबंध एवं प्रारूप लेखन) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script) by all candidates regardless of their opted medium for GS1–GS4. Answers written in English are not evaluated in the actual examination. The authentic Hindi model answer is provided below for your preparation.
भारत में पारिवारिक विघटन: समाजशास्त्रीय कारण, बहुआयामी प्रभाव एवं सुधारात्मक उपाय
"परिवार भारतीय सामाजिक व्यवस्था की मूल इकाई है; इसकी भावनात्मक सुदृढ़ता ही सामाजिक सुरक्षा और सांस्कृतिक निरंतरता की संवाहक है।"
1. प्रस्तावना एवं संरचनात्मक परिवर्तन:
भारतीय संस्कृति में परिवार केवल एक सामाजिक संगठन नहीं, बल्कि प्राथमिक समाजीकरण, आर्थिक सुरक्षा तथा भावनात्मक संबल का पवित्र केंद्र रहा है। ऐतिहासिक रूप से भारतीय समाज की पहचान 'संयुक्त परिवार प्रणाली' रही है, जिसमें परस्पर सहयोग, त्याग और बुजुर्गों का मार्गदर्शन सर्वोपरि था। किन्तु आधुनिक औद्योगीकरण, पश्चिमीकरण और तीव्र सामाजिक बदलावों के प्रभाव से संयुक्त परिवार एकल परिवारों में और एकल परिवार अब 'पारिवारिक विघटन' (Family Disintegration) की ओर बढ़ रहे हैं।
2. पारिवारिक विघटन के प्रमुख कारण:
- तीव्र नगरीकरण एवं आजीविका जनित प्रवास: रोजगार और उच्च शिक्षा की तलाश में युवाओं का महानगरों की ओर पलायन, जिससे वे मूल पारिवारिक परिवेश से कट जाते हैं।
- अति-व्यक्तिवादिता एवं उपभोक्तावादी संस्कृति: भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ तथा 'सामूहिकता' के स्थान पर 'स्व-केंद्रित' सोच का हावी होना।
- आर्थिक तनाव एवं कार्य-जीवन असंतुलन: आधुनिक जीवनशैली की आपाधापी, अत्यधिक कार्यभार तथा समय की कमी के कारण पति-पत्नी व परिजनों में संवादहीनता।
- डिजिटल अलगाव एवं पीढ़ीगत अंतराल: स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से घर के भीतर 'डिजिटल एकाकीपन' बढ़ा है, जिसने आपसी संवाद को सीमित कर दिया है।
- सहनशीलता व समझौते की भावना में कमी: पारंपरिक पारिवारिक मध्यस्थता की समाप्ति से वैवाहिक कलह और तलाक के मामलों में तीव्र वृद्धि।
3. समाज एवं व्यक्तियों पर बहुआयामी प्रभाव:
- वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा: माता-पिता का भावनात्मक एकाकीपन, शारीरिक असुरक्षा तथा वृद्धाश्रमों पर बढ़ती निर्भरता एक गंभीर मानवीय संकट बन रही है।
- बाल मनोविज्ञान पर दुष्प्रभाव: विखंडित परिवारों के बच्चों में भावनात्मक असुरक्षा, अवसाद, आक्रामक व्यवहार तथा संस्कारों की कमी देखी जा रही है।
- सामाजिक सुरक्षा तंत्र का क्षरण: परिवार रूपी अनौपचारिक सुरक्षा कवच के टूटने से मानसिक तनाव, आत्महत्या और सामाजिक अव्यवस्था में वृद्धि।
4. वैधानिक एवं संस्थागत संरक्षण (राष्ट्रीय व मध्य प्रदेश स्तर):
- माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम, 2007: संतानों द्वारा बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना तथा उप-संभागीय स्तर पर भरण-पोषण अधिकरणों की स्थापना।
- पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984: वैवाहिक व पारिवारिक विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान हेतु अनिवार्य मध्यस्थता व परामर्श केंद्र।
- मध्य प्रदेश शासन के विशिष्ट प्रयास: नागरिकों में मानसिक शांति व पारिवारिक समरसता को बढ़ावा देने हेतु देश के पहले 'आनंद विभाग' (Department of Happiness) का गठन, तथा बुजुर्गों के सम्मान हेतु 'मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन योजना'।
5. समाधान एवं आगे की राह:
- मूल्यपरक नैतिक शिक्षा: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के अंतर्गत प्राथमिक स्तर से ही पारिवारिक मूल्यों, बड़ों के सम्मान और आपसी सहयोग की शिक्षा।
- व्यापक पारिवारिक परामर्श केंद्र: जिला व तहसील स्तर पर प्रशिक्षित समाजशास्त्रियों व मनोवैज्ञानिकों के माध्यम से सुलभ काउंसलिंग व्यवस्था।
- कार्य-जीवन संतुलन: कॉर्पोरेट व शासकीय क्षेत्र में कार्य-संस्कृति को परिवार-अनुकूल बनाना।
6. निष्कर्ष:
आर्थिक समृद्धि तभी सार्थक है जब समाज की मौलिक इकाई 'परिवार' स्वस्थ और एकजुट रहे। भारतीय परिवार व्यवस्था के पारंपरिक संस्कारों, परस्पर संवाद और भावनात्मक अपनत्व को पुनर्जीवित करना एक सशक्त, संवेदनशील और समरस भारत के निर्माण की प्राथमिक आवश्यकता है।
हिंदी में प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
निम्नलिखित विषय पर लगभग 500 शब्दों में निबंध लिखिए : "भारत में पारिवारिक विघटन"
भारत में पारिवारिक विघटन: समाजशास्त्रीय कारण, बहुआयामी प्रभाव एवं सुधारात्मक उपाय
"परिवार भारतीय सामाजिक व्यवस्था की मूल इकाई है; इसकी भावनात्मक सुदृढ़ता ही सामाजिक सुरक्षा और सांस्कृतिक निरंतरता की संवाहक है।"
1. प्रस्तावना एवं संरचनात्मक परिवर्तन:
भारतीय संस्कृति में परिवार केवल एक सामाजिक संगठन नहीं, बल्कि प्राथमिक समाजीकरण, आर्थिक सुरक्षा तथा भावनात्मक संबल का पवित्र केंद्र रहा है। ऐतिहासिक रूप से भारतीय समाज की पहचान 'संयुक्त परिवार प्रणाली' रही है, जिसमें परस्पर सहयोग, त्याग और बुजुर्गों का मार्गदर्शन सर्वोपरि था। किन्तु आधुनिक औद्योगीकरण, पश्चिमीकरण और तीव्र सामाजिक बदलावों के प्रभाव से संयुक्त परिवार एकल परिवारों में और एकल परिवार अब 'पारिवारिक विघटन' (Family Disintegration) की ओर बढ़ रहे हैं।
2. पारिवारिक विघटन के प्रमुख कारण:
- तीव्र नगरीकरण एवं आजीविका जनित प्रवास: रोजगार और उच्च शिक्षा की तलाश में युवाओं का महानगरों की ओर पलायन, जिससे वे मूल पारिवारिक परिवेश से कट जाते हैं।
- अति-व्यक्तिवादिता एवं उपभोक्तावादी संस्कृति: भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ तथा 'सामूहिकता' के स्थान पर 'स्व-केंद्रित' सोच का हावी होना।
- आर्थिक तनाव एवं कार्य-जीवन असंतुलन: आधुनिक जीवनशैली की आपाधापी, अत्यधिक कार्यभार तथा समय की कमी के कारण पति-पत्नी व परिजनों में संवादहीनता।
- डिजिटल अलगाव एवं पीढ़ीगत अंतराल: स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से घर के भीतर 'डिजिटल एकाकीपन' बढ़ा है, जिसने आपसी संवाद को सीमित कर दिया है।
- सहनशीलता व समझौते की भावना में कमी: पारंपरिक पारिवारिक मध्यस्थता की समाप्ति से वैवाहिक कलह और तलाक के मामलों में तीव्र वृद्धि।
3. समाज एवं व्यक्तियों पर बहुआयामी प्रभाव:
- वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा: माता-पिता का भावनात्मक एकाकीपन, शारीरिक असुरक्षा तथा वृद्धाश्रमों पर बढ़ती निर्भरता एक गंभीर मानवीय संकट बन रही है।
- बाल मनोविज्ञान पर दुष्प्रभाव: विखंडित परिवारों के बच्चों में भावनात्मक असुरक्षा, अवसाद, आक्रामक व्यवहार तथा संस्कारों की कमी देखी जा रही है।
- सामाजिक सुरक्षा तंत्र का क्षरण: परिवार रूपी अनौपचारिक सुरक्षा कवच के टूटने से मानसिक तनाव, आत्महत्या और सामाजिक अव्यवस्था में वृद्धि।
4. वैधानिक एवं संस्थागत संरक्षण (राष्ट्रीय व मध्य प्रदेश स्तर):
- माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम, 2007: संतानों द्वारा बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना तथा उप-संभागीय स्तर पर भरण-पोषण अधिकरणों की स्थापना।
- पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984: वैवाहिक व पारिवारिक विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान हेतु अनिवार्य मध्यस्थता व परामर्श केंद्र।
- मध्य प्रदेश शासन के विशिष्ट प्रयास: नागरिकों में मानसिक शांति व पारिवारिक समरसता को बढ़ावा देने हेतु देश के पहले 'आनंद विभाग' (Department of Happiness) का गठन, तथा बुजुर्गों के सम्मान हेतु 'मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन योजना'।
5. समाधान एवं आगे की राह:
- मूल्यपरक नैतिक शिक्षा: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के अंतर्गत प्राथमिक स्तर से ही पारिवारिक मूल्यों, बड़ों के सम्मान और आपसी सहयोग की शिक्षा।
- व्यापक पारिवारिक परामर्श केंद्र: जिला व तहसील स्तर पर प्रशिक्षित समाजशास्त्रियों व मनोवैज्ञानिकों के माध्यम से सुलभ काउंसलिंग व्यवस्था।
- कार्य-जीवन संतुलन: कॉर्पोरेट व शासकीय क्षेत्र में कार्य-संस्कृति को परिवार-अनुकूल बनाना।
6. निष्कर्ष:
आर्थिक समृद्धि तभी सार्थक है जब समाज की मौलिक इकाई 'परिवार' स्वस्थ और एकजुट रहे। भारतीय परिवार व्यवस्था के पारंपरिक संस्कारों, परस्पर संवाद और भावनात्मक अपनत्व को पुनर्जीवित करना एक सशक्त, संवेदनशील और समरस भारत के निर्माण की प्राथमिक आवश्यकता है।