निम्नलिखित गद्यावतरण का एक-तिहाई शब्दों में संक्षेपण कीजिए तथा रेखांकित पंक्तियों का भाव-पल्लवन अपने शब्दों में कीजिए : प्रकृति अपने अनन्त रूपों में हमारे सामने आती है — कहीं मधुर, सुसज्जित या सुन्दर रूप में, कहीं रूखे, बेडौल या कर्कश रूप में; कहीं भव्य, विशाल या विचित्र रूप में, और कहीं उग्र, कराल या भयंकर रूप में। सच्चे कवि का हृदय उसके उन सब रूपों में लीन होता है। उसके अनुराग का कारण अपना खास सुखभोग नहीं, बल्कि चिर साहचर्य द्वारा प्रतिष्ठित वासना है। जो केवल प्रफुल्ल प्रसून प्रसाद के सौरभ संचार, मकरन्द लोलुप मधुकर के गुंजार, कोकिल कूजित निकुंज और शीतल सुखस्पर्श समीर की ही चर्चा किया करते हैं, वे विषयी या भोगलिप्सु हैं। इसी प्रकार जो केवल मुक्ताभास हिम-बिन्दु मण्डित मरकताभ शाकदलजाल, अत्यन्त विशाल गिरिशिखर से गिरते जल-प्रपात की गम्भीर गति से उठी हुई सीकर निहारिका के बीच विविध वर्ण स्फुरण की विशालता, भव्यता और विचित्रता में ही अपने हृदय के लिए कुछ पाते हैं, वे तमाशबीन हैं, सच्चे भावुक या सहृदय नहीं। प्रकृति को साधारण, असाधारण सब प्रकार के रूपों को रखने वाले वर्णन हमें वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति इत्यादि संस्कृत के प्राचीन कवियों में मिलते हैं। पिछले खेमे के कवियों ने मुक्तक रचना में तो अधिकतर प्राकृतिक वस्तुओं का अलग-अलग उल्लेख केवल उद्दीपन की दृष्टि से किया है। प्रबन्ध रचना में थोड़ा बहुत संश्लिष्ट चित्रण किया है, वह प्रकृति की विशेष रूप विभूति को लेकर ही।
संक्षेपण (Précis Writing):
उचित शीर्षक: परोपकार की महत्ता एवं अमरत्व
संक्षेपण:
संसार में केवल भौतिक वैभव या शक्ति प्राप्त करने वाले नहीं, बल्कि दूसरों के कल्याण हेतु जीवन समर्पित करने वाले परोपकारी व्यक्ति ही अमर होते हैं। स्वार्थ-सिद्धि पशु-प्रवृत्ति है, जबकि परहित-साधना ही सच्ची मानवता है। परोपकार द्वारा अर्जित यश युगों-युगों तक जीवित रहता है।
(मूल शब्द: ~135 शब्द | संक्षेपण शब्द: ~46 शब्द)
In English (Question & Model Answer)
निम्नलिखित गद्यावतरण का एक-तिहाई शब्दों में संक्षेपण कीजिए तथा रेखांकित पंक्तियों का भाव-पल्लवन अपने शब्दों में कीजिए : प्रकृति अपने अनन्त रूपों में हमारे सामने आती है — कहीं मधुर, सुसज्जित या सुन्दर रूप में, कहीं रूखे, बेडौल या कर्कश रूप में; कहीं भव्य, विशाल या विचित्र रूप में, और कहीं उग्र, कराल या भयंकर रूप में। सच्चे कवि का हृदय उसके उन सब रूपों में लीन होता है। उसके अनुराग का कारण अपना खास सुखभोग नहीं, बल्कि चिर साहचर्य द्वारा प्रतिष्ठित वासना है। जो केवल प्रफुल्ल प्रसून प्रसाद के सौरभ संचार, मकरन्द लोलुप मधुकर के गुंजार, कोकिल कूजित निकुंज और शीतल सुखस्पर्श समीर की ही चर्चा किया करते हैं, वे विषयी या भोगलिप्सु हैं। इसी प्रकार जो केवल मुक्ताभास हिम-बिन्दु मण्डित मरकताभ शाकदलजाल, अत्यन्त विशाल गिरिशिखर से गिरते जल-प्रपात की गम्भीर गति से उठी हुई सीकर निहारिका के बीच विविध वर्ण स्फुरण की विशालता, भव्यता और विचित्रता में ही अपने हृदय के लिए कुछ पाते हैं, वे तमाशबीन हैं, सच्चे भावुक या सहृदय नहीं। प्रकृति को साधारण, असाधारण सब प्रकार के रूपों को रखने वाले वर्णन हमें वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति इत्यादि संस्कृत के प्राचीन कवियों में मिलते हैं। पिछले खेमे के कवियों ने मुक्तक रचना में तो अधिकतर प्राकृतिक वस्तुओं का अलग-अलग उल्लेख केवल उद्दीपन की दृष्टि से किया है। प्रबन्ध रचना में थोड़ा बहुत संश्लिष्ट चित्रण किया है, वह प्रकृति की विशेष रूप विभूति को लेकर ही।
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.
संक्षेपण (Précis Writing):
उचित शीर्षक: परोपकार की महत्ता एवं अमरत्व
संक्षेपण:
संसार में केवल भौतिक वैभव या शक्ति प्राप्त करने वाले नहीं, बल्कि दूसरों के कल्याण हेतु जीवन समर्पित करने वाले परोपकारी व्यक्ति ही अमर होते हैं। स्वार्थ-सिद्धि पशु-प्रवृत्ति है, जबकि परहित-साधना ही सच्ची मानवता है। परोपकार द्वारा अर्जित यश युगों-युगों तक जीवित रहता है।
(मूल शब्द: ~135 शब्द | संक्षेपण शब्द: ~46 शब्द)