मुख्य›MPPSC Mains (हिन्दी)›सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण›सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण›पल्लवन›साहित्य मुर्दों को जीवित बनाने वाली संजीवनी औषधि की खान है। जिस

साहित्य मुर्दों को जीवित बनाने वाली संजीवनी औषधि की खान है। जिस प्रकार संजीवनी औषधि मुर्दों को जीवित बना देती है, उसी प्रकार यह साहित्य अपनी प्रेरणा एवं संजीवनी शक्ति द्वारा मृत जातियों एवं राष्ट्रों में जीवन का संचार कर देता है। साहित्य में इतनी शक्ति है कि वह पतनोन्मुख जातियों एवं राष्ट्रों को उठा देता है और उठे हुए लोगों के मस्तक को गौरव से ऊँचा कर देता है। जो राष्ट्र या जाति ऐसे साहित्य की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्न नहीं करती है, वह अज्ञानरूपी अन्धकार के गड्ढे में गिरकर अपनी सत्ता समाप्त कर देती है। इसलिए साहित्य-सर्जन की क्षमता रखते हुए भी जो मनुष्य इतने महत्वपूर्ण साहित्य की सेवा नहीं करता, जो मनुष्य इतने महत्वपूर्ण साहित्य की अभिवृद्धि का प्रयत्न नहीं करता, इतने महत्वपूर्ण साहित्य से प्रेम नहीं रखता, वह अप्रत्यक्ष रूप में अपने देश, अपनी जाति, अपने समाज से ही द्रोह नहीं करता, बल्कि अपने से भी द्रोह करता है। वह व्यक्ति केवल आत्मद्रोही नहीं बल्कि वह अपने सर्वनाश का कर्ता भी कहा जा सकता है। इसलिए आत्मघातक बनने से बचने के लिए हमें अपनी शक्ति के अनुसार सद्साहित्य की वृद्धि करनी चाहिए।

201515M
आदर्श उत्तर

संक्षेपण (Précis Writing):

उचित शीर्षक: साहित्य: समाज की संजीवनी एवं नवचेतना का स्रोत

संक्षेपण:
साहित्य समाज के लिए संजीवनी औषधि के समान है जो मृतप्राय, हताश और दिशाहीन समाज में नवजीवन, स्फूर्ति और उच्च आदर्शों का संचार करता है। साहित्यकार की रचनाएँ जनमानस के अंधकार को मिटाकर उसे स्वाभिमान, राष्ट्र-प्रेम और सत्कर्मों की ओर प्रेरित करती हैं।

(मूल शब्द: ~140 शब्द | संक्षेपण शब्द: ~48 शब्द)

In English (Question & Model Answer)

साहित्य मुर्दों को जीवित बनाने वाली संजीवनी औषधि की खान है। जिस प्रकार संजीवनी औषधि मुर्दों को जीवित बना देती है, उसी प्रकार यह साहित्य अपनी प्रेरणा एवं संजीवनी शक्ति द्वारा मृत जातियों एवं राष्ट्रों में जीवन का संचार कर देता है। साहित्य में इतनी शक्ति है कि वह पतनोन्मुख जातियों एवं राष्ट्रों को उठा देता है और उठे हुए लोगों के मस्तक को गौरव से ऊँचा कर देता है। जो राष्ट्र या जाति ऐसे साहित्य की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्न नहीं करती है, वह अज्ञानरूपी अन्धकार के गड्ढे में गिरकर अपनी सत्ता समाप्त कर देती है। इसलिए साहित्य-सर्जन की क्षमता रखते हुए भी जो मनुष्य इतने महत्वपूर्ण साहित्य की सेवा नहीं करता, जो मनुष्य इतने महत्वपूर्ण साहित्य की अभिवृद्धि का प्रयत्न नहीं करता, इतने महत्वपूर्ण साहित्य से प्रेम नहीं रखता, वह अप्रत्यक्ष रूप में अपने देश, अपनी जाति, अपने समाज से ही द्रोह नहीं करता, बल्कि अपने से भी द्रोह करता है। वह व्यक्ति केवल आत्मद्रोही नहीं बल्कि वह अपने सर्वनाश का कर्ता भी कहा जा सकता है। इसलिए आत्मघातक बनने से बचने के लिए हमें अपनी शक्ति के अनुसार सद्साहित्य की वृद्धि करनी चाहिए।

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.

संक्षेपण (Précis Writing):

उचित शीर्षक: साहित्य: समाज की संजीवनी एवं नवचेतना का स्रोत

संक्षेपण:
साहित्य समाज के लिए संजीवनी औषधि के समान है जो मृतप्राय, हताश और दिशाहीन समाज में नवजीवन, स्फूर्ति और उच्च आदर्शों का संचार करता है। साहित्यकार की रचनाएँ जनमानस के अंधकार को मिटाकर उसे स्वाभिमान, राष्ट्र-प्रेम और सत्कर्मों की ओर प्रेरित करती हैं।

(मूल शब्द: ~140 शब्द | संक्षेपण शब्द: ~48 शब्द)

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