रेखांकित अथवा दी गई पंक्तियों का पल्लवन अथवा भाव पल्लवन कीजिए :
'प्रतिभा-श्रम और अभ्यास के तटों में बँधकर बहती है ।
प्रतिभा और श्रम तथा अभ्यास का संबंध प्रतिभा बुद्धि है - कला - विज्ञान का कारण - मूल्यों की स्थापना - आदि करना है ।'
भाव पल्लवन (Expansion of Idea):
सूक्ति: "प्रतिभा-श्रम और अभ्यास के तटों में बँधकर बहती है।"
पल्लवन:
प्रतिभा ईश्वर-प्रदत्त बीज या आंतरिक क्षमता अवश्य है, किन्तु कठोर परिश्रम और निरंतर अभ्यास के बिना उसका प्रस्फुटन और सार्थक विकास असंभव है। जिस प्रकार एक तीव्रगामी नदी यदि दोनों तटों से मर्यादित और बंधी न हो, तो वह विनाशकारी बाढ़ बन जाती है और उसका जल व्यर्थ बिखर जाता है; ठीक उसी प्रकार अनियंत्रित या आलसी प्रतिभा भी बिना श्रम और अनुशासन के नष्ट हो जाती है।
कला, साहित्य, विज्ञान, खेल अथवा ज्ञान का कोई भी क्षेत्र हो—प्रतिभा को निखारने का एकमात्र मार्ग सतत अभ्यास ही है। गोस्वामी तुलसीदास, महर्षि पाणिनि, कालिदास, वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन और संगीत-साधकों की सफलता इसका साक्षात प्रमाण है कि प्रतिभा केवल 1% प्रेरणा है और 99% पसीना (परिश्रम) है। जैसा कि प्रसिद्ध लोकोक्ति है—"करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।"
अतः श्रम और अभ्यास वे दो सुदृढ़ किनारे (तट) हैं जो प्रतिभा रूपी जल-धारा को सही दिशा, गति और सार्थकता प्रदान कर उसे महान उपलब्धि एवं लोक-कल्याण के सागर तक पहुँचाते हैं।
In English (Question & Model Answer)
रेखांकित अथवा दी गई पंक्तियों का पल्लवन अथवा भाव पल्लवन कीजिए :
'प्रतिभा-श्रम और अभ्यास के तटों में बँधकर बहती है ।
प्रतिभा और श्रम तथा अभ्यास का संबंध प्रतिभा बुद्धि है - कला - विज्ञान का कारण - मूल्यों की स्थापना - आदि करना है ।'
[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.
भाव पल्लवन (Expansion of Idea):
सूक्ति: "प्रतिभा-श्रम और अभ्यास के तटों में बँधकर बहती है।"
पल्लवन:
प्रतिभा ईश्वर-प्रदत्त बीज या आंतरिक क्षमता अवश्य है, किन्तु कठोर परिश्रम और निरंतर अभ्यास के बिना उसका प्रस्फुटन और सार्थक विकास असंभव है। जिस प्रकार एक तीव्रगामी नदी यदि दोनों तटों से मर्यादित और बंधी न हो, तो वह विनाशकारी बाढ़ बन जाती है और उसका जल व्यर्थ बिखर जाता है; ठीक उसी प्रकार अनियंत्रित या आलसी प्रतिभा भी बिना श्रम और अनुशासन के नष्ट हो जाती है।
कला, साहित्य, विज्ञान, खेल अथवा ज्ञान का कोई भी क्षेत्र हो—प्रतिभा को निखारने का एकमात्र मार्ग सतत अभ्यास ही है। गोस्वामी तुलसीदास, महर्षि पाणिनि, कालिदास, वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन और संगीत-साधकों की सफलता इसका साक्षात प्रमाण है कि प्रतिभा केवल 1% प्रेरणा है और 99% पसीना (परिश्रम) है। जैसा कि प्रसिद्ध लोकोक्ति है—"करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।"
अतः श्रम और अभ्यास वे दो सुदृढ़ किनारे (तट) हैं जो प्रतिभा रूपी जल-धारा को सही दिशा, गति और सार्थकता प्रदान कर उसे महान उपलब्धि एवं लोक-कल्याण के सागर तक पहुँचाते हैं।