मुख्य›MPPSC Mains (हिन्दी)›सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण›सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण›पल्लवन›सबै दिन होत न एक समान।

सबै दिन होत न एक समान।

202310M
आदर्श उत्तर

भाव पल्लवन (Expansion of Idea):

सूक्ति: "सबै दिन होत न एक समान।"

पल्लवन:
संसार परिवर्तनशील और कालचक्र के अधीन है। मानव जीवन में परिस्थितियाँ कभी भी एक जैसी या स्थिर नहीं रहतीं। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन का आगमन निश्चित है, वैसे ही मानव जीवन में सुख और दुःख, उत्थान और पतन, अनुकूलता और प्रतिकूलता का चक्र निरंतर घूमता रहता है।

राजा हरिश्चंद्र, भगवान श्रीराम और पांडवों जैसे महापुरुषों का जीवन इस सत्य का साक्षात प्रमाण है कि समय सदा एक जैसा नहीं रहता। चक्रवर्ती सम्राटों को भी वन-वन भटकना पड़ा और कठिन आपदाएँ झेलनी पड़ीं। अतः इस परिवर्तनशील जीवन-सत्य से मनुष्य को दो प्रमुख सीखें मिलती हैं:

  1. सुख और समृद्धि में विनम्रता: जब अनुकूल समय और वैभव प्राप्त हो, तो मनुष्य को कभी अहंकार या मद में नहीं आना चाहिए, क्योंकि वैभव क्षणभंगुर है।
  2. दुःख और संकट में धैर्य: जब प्रतिकूल समय और विपत्तियाँ घेर लें, तो मनुष्य को निराश या हताश होने के स्थान पर धैर्य और साहस बनाए रखना चाहिए, क्योंकि यह बुरा समय भी सदा नहीं रहेगा।

समत्व भाव से जीवन जीने वाला मनुष्य ही हर परिस्थिति में अडिग रहकर वास्तविक आनंद और सफलता प्राप्त करता है।

In English (Question & Model Answer)

सबै दिन होत न एक समान।

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.

भाव पल्लवन (Expansion of Idea):

सूक्ति: "सबै दिन होत न एक समान।"

पल्लवन:
संसार परिवर्तनशील और कालचक्र के अधीन है। मानव जीवन में परिस्थितियाँ कभी भी एक जैसी या स्थिर नहीं रहतीं। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन का आगमन निश्चित है, वैसे ही मानव जीवन में सुख और दुःख, उत्थान और पतन, अनुकूलता और प्रतिकूलता का चक्र निरंतर घूमता रहता है।

राजा हरिश्चंद्र, भगवान श्रीराम और पांडवों जैसे महापुरुषों का जीवन इस सत्य का साक्षात प्रमाण है कि समय सदा एक जैसा नहीं रहता। चक्रवर्ती सम्राटों को भी वन-वन भटकना पड़ा और कठिन आपदाएँ झेलनी पड़ीं। अतः इस परिवर्तनशील जीवन-सत्य से मनुष्य को दो प्रमुख सीखें मिलती हैं:

  1. सुख और समृद्धि में विनम्रता: जब अनुकूल समय और वैभव प्राप्त हो, तो मनुष्य को कभी अहंकार या मद में नहीं आना चाहिए, क्योंकि वैभव क्षणभंगुर है।
  2. दुःख और संकट में धैर्य: जब प्रतिकूल समय और विपत्तियाँ घेर लें, तो मनुष्य को निराश या हताश होने के स्थान पर धैर्य और साहस बनाए रखना चाहिए, क्योंकि यह बुरा समय भी सदा नहीं रहेगा।

समत्व भाव से जीवन जीने वाला मनुष्य ही हर परिस्थिति में अडिग रहकर वास्तविक आनंद और सफलता प्राप्त करता है।

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