मुख्य›MPPSC Mains (हिन्दी)›सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण›सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण›पल्लवन›गुरू से ज्ञान प्राप्त करने के केवल तीन उपाय हैं; नम्रता, जिज्ञासा और

गुरू से ज्ञान प्राप्त करने के केवल तीन उपाय हैं; नम्रता, जिज्ञासा और सेवा। इनमें नम्रता का स्थान प्रथम है। अतः एक आदर्श विद्यार्थी को विनम्र होना चाहिए। नम्रता के साथ-साथ उसे अनुशासनप्रिय होना चाहिए। जो विद्यार्थी अनुशासनहीन होते हैं, वे अपने देश, अपनी जाति, अपने माता-पिता, अपने और कॉलेज के लिए प्रतिष्ठाकारक होते हैं। अनुशासनहीन छात्र का न तो मानसिक विकास हो पाता है और न ही बौद्धिक विकास। वह उन गुणों से सदैव-सदैव के लिए वंचित हो जाता है, जो मनुष्य को प्रतिष्ठा के अवसर प्रदान करते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में अनुशासन का विशेष महत्व है। अनुशासन से ही छात्र आदर्श विद्यार्थी की श्रेणी में आ सकता है। आज के युग का छात्र अनुशासनहीनता दिखाने में अपना गौरव समझता है, इसीलिए देश में सभ्य नागरिकों का अभाव-सा होता चला जा रहा है, क्योंकि आज का विद्यार्थी ही कल का नागरिक बनता है।

202310M
आदर्श उत्तर

संक्षेपण (Précis Writing):

उचित शीर्षक: ज्ञान-प्राप्ति के साधन एवं विद्यार्थी जीवन में अनुशासन

संक्षेपण:
गुरु से ज्ञान-अर्जन के लिए नम्रता, जिज्ञासा और सेवा—ये तीन प्रमुख गुण आवश्यक हैं, जिनमें नम्रता सर्वोपरि है। एक आदर्श विद्यार्थी के लिए नम्रता के साथ-साथ अनुशासनप्रिय होना अनिवार्य है। अनुशासनहीनता विद्यार्थी के मानसिक और बौद्धिक विकास को अवरुद्ध कर उसे समाज में अप्रतिष्ठा की ओर ले जाती है। आज के विद्यार्थी ही कल के देश-निर्माता हैं, अतः राष्ट्र के सभ्य व समर्थ भविष्य के लिए विद्यार्थियों में अनुशासन और उच्च संस्कारों का होना अत्यंत आवश्यक है।

(मूल शब्द: ~125 शब्द | संक्षेपण शब्द: ~55 शब्द)

In English (Question & Model Answer)

गुरू से ज्ञान प्राप्त करने के केवल तीन उपाय हैं; नम्रता, जिज्ञासा और सेवा। इनमें नम्रता का स्थान प्रथम है। अतः एक आदर्श विद्यार्थी को विनम्र होना चाहिए। नम्रता के साथ-साथ उसे अनुशासनप्रिय होना चाहिए। जो विद्यार्थी अनुशासनहीन होते हैं, वे अपने देश, अपनी जाति, अपने माता-पिता, अपने और कॉलेज के लिए प्रतिष्ठाकारक होते हैं। अनुशासनहीन छात्र का न तो मानसिक विकास हो पाता है और न ही बौद्धिक विकास। वह उन गुणों से सदैव-सदैव के लिए वंचित हो जाता है, जो मनुष्य को प्रतिष्ठा के अवसर प्रदान करते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में अनुशासन का विशेष महत्व है। अनुशासन से ही छात्र आदर्श विद्यार्थी की श्रेणी में आ सकता है। आज के युग का छात्र अनुशासनहीनता दिखाने में अपना गौरव समझता है, इसीलिए देश में सभ्य नागरिकों का अभाव-सा होता चला जा रहा है, क्योंकि आज का विद्यार्थी ही कल का नागरिक बनता है।

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.

संक्षेपण (Précis Writing):

उचित शीर्षक: ज्ञान-प्राप्ति के साधन एवं विद्यार्थी जीवन में अनुशासन

संक्षेपण:
गुरु से ज्ञान-अर्जन के लिए नम्रता, जिज्ञासा और सेवा—ये तीन प्रमुख गुण आवश्यक हैं, जिनमें नम्रता सर्वोपरि है। एक आदर्श विद्यार्थी के लिए नम्रता के साथ-साथ अनुशासनप्रिय होना अनिवार्य है। अनुशासनहीनता विद्यार्थी के मानसिक और बौद्धिक विकास को अवरुद्ध कर उसे समाज में अप्रतिष्ठा की ओर ले जाती है। आज के विद्यार्थी ही कल के देश-निर्माता हैं, अतः राष्ट्र के सभ्य व समर्थ भविष्य के लिए विद्यार्थियों में अनुशासन और उच्च संस्कारों का होना अत्यंत आवश्यक है।

(मूल शब्द: ~125 शब्द | संक्षेपण शब्द: ~55 शब्द)

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