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लोभ चाहे जिस वस्तु का हो, जब वह बहुत बढ़ जाता है तब उस वस्तु की प्राप्ति, सात्रिध्य या उपयोग से जी नहीं भरता। मनुष्य चाहता है कि वह बार-बार मिले या बराबर मिलती रहे। धन का लोभ जब रोग होकर चित्त में घर कर लेता है, तब प्राप्ति होने पर भी, और प्राप्ति की इच्छा बराबर बनी रहती है। जिससे मनुष्य सदा आतुर और प्राप्ति के आनन्द से विमुख रहता है। उसका अन्तःकरण सदा अभावग्रस्त रहता है। उसके लिए जो है, वह भी नहीं है। असन्तोष या अभाव कल्पना से उत्पन्न दुःख है। अतः जिस किसी में यह काल्पनिक अभाव या असन्तोष रहेगा, उसका सुख से नाता सब दिन के लिए टूट जाता है।

202310M
आदर्श उत्तर

संक्षेपण (Précis Writing):

उचित शीर्षक: लोभ का दुष्परिणाम एवं असंतोष का संकट

संक्षेपण:
जब किसी वस्तु के प्रति लोभ अत्यधिक बढ़ जाता है, तो उसकी प्राप्ति के बाद भी मनुष्य की तृष्णा शांत नहीं होती। धन का लोभ चित्त का ऐसा असाध्य रोग है जो व्यक्ति को निरंतर अभावग्रस्त और अतृप्त बनाए रखता है, जिससे वह वर्तमान सुख के वास्तविक आनंद से सदा वंचित रहता है। काल्पनिक अभाव और असंतोष से उत्पन्न यह दुःख मनुष्य के जीवन से स्थाई सुख और शांति को हमेशा के लिए छीन लेता है।

(मूल शब्द: ~110 शब्द | संक्षेपण शब्द: ~52 शब्द)

In English (Question & Model Answer)

लोभ चाहे जिस वस्तु का हो, जब वह बहुत बढ़ जाता है तब उस वस्तु की प्राप्ति, सात्रिध्य या उपयोग से जी नहीं भरता। मनुष्य चाहता है कि वह बार-बार मिले या बराबर मिलती रहे। धन का लोभ जब रोग होकर चित्त में घर कर लेता है, तब प्राप्ति होने पर भी, और प्राप्ति की इच्छा बराबर बनी रहती है। जिससे मनुष्य सदा आतुर और प्राप्ति के आनन्द से विमुख रहता है। उसका अन्तःकरण सदा अभावग्रस्त रहता है। उसके लिए जो है, वह भी नहीं है। असन्तोष या अभाव कल्पना से उत्पन्न दुःख है। अतः जिस किसी में यह काल्पनिक अभाव या असन्तोष रहेगा, उसका सुख से नाता सब दिन के लिए टूट जाता है।

[Note for English Medium Aspirants]: As per official MPPSC Examination Rules, Paper 5 (General Hindi & Grammar / सामान्य हिन्दी एवं व्याकरण) must be attempted exclusively in Hindi (Devanagari script). The authentic Hindi model answer is provided below.

संक्षेपण (Précis Writing):

उचित शीर्षक: लोभ का दुष्परिणाम एवं असंतोष का संकट

संक्षेपण:
जब किसी वस्तु के प्रति लोभ अत्यधिक बढ़ जाता है, तो उसकी प्राप्ति के बाद भी मनुष्य की तृष्णा शांत नहीं होती। धन का लोभ चित्त का ऐसा असाध्य रोग है जो व्यक्ति को निरंतर अभावग्रस्त और अतृप्त बनाए रखता है, जिससे वह वर्तमान सुख के वास्तविक आनंद से सदा वंचित रहता है। काल्पनिक अभाव और असंतोष से उत्पन्न यह दुःख मनुष्य के जीवन से स्थाई सुख और शांति को हमेशा के लिए छीन लेता है।

(मूल शब्द: ~110 शब्द | संक्षेपण शब्द: ~52 शब्द)

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