Give the equivalent Hindi administrative term for: Adverse entry
Show AnswerGeneral Hindi & Grammar
'ताँत बजी और राग बूझा' इस कहावत का अर्थ लिखिए और वाक्य में प्रयोग कीजिए।
Show AnswerGive the equivalent English administrative term for: अधिवास
Show Answer'गीता पढ़ि लिहिस हइ' वाक्य में किस काल का बोध होता है?
Show Answerअनुमति देने का लिए हम सक्षम हैं।
Show Answerछंद की परिभाषा लिखिए।
Show Answerश्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे।
सब शोक अपना भूलकर करतल-युगल मलने लगे॥
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।
करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठकर खड़े॥
इन पंक्तियों में निहित रस और उसका स्थायीभाव लिखिए।
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्न का उत्तर दीजिए :
"नाटक प्राचीनकाल से ही कला जगत् में सर्वाधिक मनोरम और आकर्षक कला-माध्यम माना जाता रहा है। साहित्य के अन्तर्गत नाटक सबसे अधिक सुन्दर और आनन्ददायी विधा है जिसका भव्य आयोजन करके गुणी और मर्मज्ञ आनन्द का अनुभव करते हैं। यह मान्यता यद्यपि अत्यन्त प्राचीन है किन्तु आज भी इसकी सत्यता को चुनौती देना संभव नहीं है। नाटक के आयोजन में जो सुकुमारता और कला-सूक्ष्मता है वह आज के युग में भी सर्वश्रेष्ठ कला बनाए हुए है। नाटक का शिल्पविधान और उसकी रचना की बारीकियाँ उसे एक अप्रतिम आकर्षक का विषय बना देती हैं। सबसे प्रमुख बात तो यह है कि नाटक का शिल्पविधान एक सामूहिक विधान है जिसमें नाटककार के साथ-साथ निर्देशक तथा विभिन्न अभिनेताओं का भरपूर सहयोग प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, नाटक के इस भव्य आयोजन में हजार-हजार दर्शक समूह भी अपना महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करता है जिससे नाटक की मंच प्रस्तुति निर्बाध रूप से सम्पन्न होती है। इन सबके समवेत प्रयास तथा इन सबकी समवेत प्रतिभा के योग से ही नाटक की प्रस्तुति सम्भव होती है। यह सही है कि कला की सबसे जीवन्त और सार्थक भूमिका नाटक ही निभाता है क्योंकि वह व्यापक रूप से जनचेतना का अंग और बहुत हद तक उसका प्रतिरूप है।"
प्रश्न: नाटक सर्वश्रेष्ठ कला क्यों है?
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्न का उत्तर दीजिए :
"समालोचक के रूप में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने किसी नूतन शैली की उद्भावना नहीं की। पूर्व और पश्चिम के आलोचना-शास्त्रों से समन्वित कोई आलोचना सिद्धान्त नहीं लिखा, पर सामयिक पुस्तकों के भाषा-दोषों को उभार-उभार कर बतलाने का यह परिणाम हुआ कि हिन्दी लेखक परिष्कृत भाषा लिखने की ओर अधिक से अधिक प्रवृत्त हुए। भाषा की स्थिरता पर सजग प्रहरी के समान बराबर दृष्टि जमाए रहते थे। वे 'कला कला के लिए' सिद्धांत को मानने वालों में नहीं थे। जिन्होंने एक जगह लिखा है - 'मनोरंजन मात्र के लिए प्रस्तुत किये गए साहित्य में भी चरित्र गठन को हानि नहीं पहुँचनी चाहिए।' आलस्य, अनुद्योग और विलासिता को उद्बोधित करने वाला साहित्य उन्हें बिल्कुल नहीं रुचता था। इसीलिए हिन्दी में वे सात्विक साहित्यिक आदर्शवाद के प्रतिपादक माने जाते हैं, जिसका पल्लवित रूप प्रेमचंद में बहुत स्पष्टता से दिखाई देता है। आदर्शवाद के आग्रह के कारण उनके युग का साहित्य उपदेशात्मक अधिक हो गया है, जिसकी प्रतिक्रिया छायावाद-युग में दिखाई देती है।"
प्रश्न: इस गद्यांश का केन्द्रीय भाव क्या है?
एक जने के दो मोड़ा हते। .... तब वा के बड्डो भइया खेत में हतो।
यह किस क्षेत्र के अंतर्गत बोली जाने वाली बोली का रूप है?
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्न का उत्तर दीजिए :
"समालोचक के रूप में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने किसी नूतन शैली की उद्भावना नहीं की। पूर्व और पश्चिम के आलोचना-शास्त्रों से समन्वित कोई आलोचना सिद्धान्त नहीं लिखा, पर सामयिक पुस्तकों के भाषा-दोषों को उभार-उभार कर बतलाने का यह परिणाम हुआ कि हिन्दी लेखक परिष्कृत भाषा लिखने की ओर अधिक से अधिक प्रवृत्त हुए। भाषा की स्थिरता पर सजग प्रहरी के समान बराबर दृष्टि जमाए रहते थे। वे 'कला कला के लिए' सिद्धांत को मानने वालों में नहीं थे। जिन्होंने एक जगह लिखा है - 'मनोरंजन मात्र के लिए प्रस्तुत किये गए साहित्य में भी चरित्र गठन को हानि नहीं पहुँचनी चाहिए।' आलस्य, अनुद्योग और विलासिता को उद्बोधित करने वाला साहित्य उन्हें बिल्कुल नहीं रुचता था। इसीलिए हिन्दी में वे सात्विक साहित्यिक आदर्शवाद के प्रतिपादक माने जाते हैं, जिसका पल्लवित रूप प्रेमचंद में बहुत स्पष्टता से दिखाई देता है। आदर्शवाद के आग्रह के कारण उनके युग का साहित्य उपदेशात्मक अधिक हो गया है, जिसकी प्रतिक्रिया छायावाद-युग में दिखाई देती है।"
प्रश्न: द्विवेदी जी के विचार में साहित्य का उद्देश्य क्या है?
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर नीचे लिखे प्रश्न का उत्तर दीजिए :
"नाटक प्राचीनकाल से ही कला जगत् में सर्वाधिक मनोरम और आकर्षक कला-माध्यम माना जाता रहा है। साहित्य के अन्तर्गत नाटक सबसे अधिक सुन्दर और आनन्ददायी विधा है जिसका भव्य आयोजन करके गुणी और मर्मज्ञ आनन्द का अनुभव करते हैं। यह मान्यता यद्यपि अत्यन्त प्राचीन है किन्तु आज भी इसकी सत्यता को चुनौती देना संभव नहीं है। नाटक के आयोजन में जो सुकुमारता और कला-सूक्ष्मता है वह आज के युग में भी सर्वश्रेष्ठ कला बनाए हुए है। नाटक का शिल्पविधान और उसकी रचना की बारीकियाँ उसे एक अप्रतिम आकर्षक का विषय बना देती हैं। सबसे प्रमुख बात तो यह है कि नाटक का शिल्पविधान एक सामूहिक विधान है जिसमें नाटककार के साथ-साथ निर्देशक तथा विभिन्न अभिनेताओं का भरपूर सहयोग प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, नाटक के इस भव्य आयोजन में हजार-हजार दर्शक समूह भी अपना महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करता है जिससे नाटक की मंच प्रस्तुति निर्बाध रूप से सम्पन्न होती है। इन सबके समवेत प्रयास तथा इन सबकी समवेत प्रतिभा के योग से ही नाटक की प्रस्तुति सम्भव होती है। यह सही है कि कला की सबसे जीवन्त और सार्थक भूमिका नाटक ही निभाता है क्योंकि वह व्यापक रूप से जनचेतना का अंग और बहुत हद तक उसका प्रतिरूप है।"
प्रश्न: किन के समवेत प्रयास से नाटक की प्रस्तुति संभव होती है?
अखिल भुवन चर-अचर जग हरिमुख में लखि मातु। चकित भयो, गद्गद् वचन, विकसित दृग, पुलकातु॥ इन पंक्तियों में कौन-सा रस है और उसका स्थायी भाव क्या है?
Show Answerअयादि संधि को परिभाषित करते हुए उसके कोई दो उदाहरण लिखिए।
Show Answerशब्द-युग्म किसे कहते हैं? अनल-अनिल तथा कृपण-कृपाण शब्द युग्मों के अर्थ लिखिए।
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